Allahabad High Court, POCSO Act  
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पत्नी ने पति को फंसाने के लिए कहानी गढ़ी: 6 साल की बेटी के रेप के दोषी डॉक्टर को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरी किया

अदालत ने कहा कि डॉक्टर और उनके भाई, जो इस मामले में आरोपी भी थे, उन पर लगे सभी आरोपों से सम्मानपूर्वक बरी हो गए हैं।

Bar & Bench

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक डॉक्टर को बरी कर दिया है, जिसे 2018 में अपनी 6 साल की बेटी के साथ रेप करने के आरोप में पिछले साल उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई थी।

जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की बेंच ने डॉक्टर के भाई को भी बरी कर दिया, जिसे पहले ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में दोषी ठहराया था।

कोर्ट ने पाया कि बच्ची को उसकी माँ ने सिखा-पढ़ाकर तैयार किया था, जो अपने पति से अलग रह रही थी।

कोर्ट ने कहा कि उसने अपने पति को ऐसे अपराधों में फँसाने के लिए पूरी कहानी गढ़ी थी, जिनसे उसे उम्रकैद की सज़ा हो सकती थी।

कोर्ट ने पिछले साल फरवरी में वाराणसी की अदालत द्वारा सुनाई गई सज़ा के आदेश को रद्द करते हुए कहा, "इस मामले में अपील करने वालों पर लगाए गए सभी आरोपों से उन्हें सम्मानपूर्वक बरी किया जाता है।"

13 अगस्त को सुनाए गए फ़ैसले में कोर्ट ने आदेश दिया कि डॉक्टर को तुरंत जेल से रिहा किया जाए। उसका भाई पहले ही ज़मानत पर बाहर था।

Justice Siddhartha Varma and Justice Jai Krishan Upadhyay

यह मामला मार्च 2018 का है, जब नाबालिग लड़की की माँ (जो खुद एक डॉक्टर हैं) ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि हल्द्वानी में साथ रहने के दौरान उनके पति ने उनकी 6 साल की बेटी का यौन शोषण किया।

उन्होंने बताया कि जब वह अप्रैल 2018 में अपनी बेटी को वापस वाराणसी लाईं, तब बेटी ने इस शोषण के बारे में बताया। आरोपी डॉक्टर और उसके भाई के खिलाफ़ भारतीय दंड संहिता (IPC) और बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम (POCSO) के तहत बलात्कार और गंभीर यौन हमले (पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट) का मामला दर्ज किया गया था।

पिछले साल ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी। उन्होंने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने पाया कि बच्ची 23 मार्च को अपने पिता के साथ हल्द्वानी गई थी और उसकी माँ ने इसके लिए सहमति दी थी। कोर्ट ने कहा कि बेटी वहाँ 10 दिनों तक रही थी।

बेंच ने आगे कहा, "बच्ची ने पिता के साथ जो समय बिताया, वह बहुत खुशी भरा था। वह लगभग हर दिन अपने पिता के मोबाइल फोन से अपनी माँ से बात करती थी। हमने यह भी पाया कि वहाँ रहने के दौरान बच्ची के पास अपना अलग मोबाइल फोन था, जो उसे उसके पिता ने दिया था। उसने कुछ तस्वीरें भी खींची थीं, जिन्हें रिकॉर्ड पर रखा गया था।"

सबूतों को देखने के बाद, कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि माँ ने अपनी हरकतों से बच्ची को पति-पत्नी के झगड़े में घसीट लिया।

कोर्ट ने खास तौर पर एक ईमेल पर ध्यान दिया, जो इस बात की पुष्टि करता था कि यौन हमले (पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट) का कथित दावा समय के साथ मनगढ़ंत तरीके से तैयार किया गया था।

उस ईमेल में, माँ ने अपने अलग रह रहे पति को 'पीडोफाइल' (बच्चों का यौन शोषण करने वाला) कहा था और आरोप लगाया था कि वह हल्द्वानी में घर को "शराबी और बलात्कारी" लोगों के अड्डे की तरह चला रहा था। उन्होंने यह भी कहा था कि उनकी बेटी "बैड टच" के बारे में जानती है और अब अपने पिता को अजनबी मानती है।

हालाँकि, कोर्ट ने गौर किया कि बाद में आरोपियों के खिलाफ़ दर्ज कराई गई आपराधिक शिकायत में यौन हमले (पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट) का कोई ज़िक्र नहीं था।

कोर्ट ने कहा, "हमें लगता है कि ईमेल में लगाए गए 'बैड टच' और दूसरे आरोपों के लिए ज़्यादा से ज़्यादा POCSO एक्ट की धारा 7 के तहत सज़ा हो सकती थी। इस धारा के तहत यौन हमले (जिसमें यौन मंशा भी शामिल हो) के लिए 3 से 5 साल की जेल और जुर्माने का प्रावधान है। इसलिए, समय बीतने के साथ पीड़िता के प्राइवेट पार्ट में टेस्ट ट्यूब डालने की कहानी गढ़ी गई। इसमें लगभग दो महीने लग गए और FIR दर्ज होने से पहले ही पीड़िता के पिता ने तलाक की अर्ज़ी दाखिल कर दी थी।"

कोर्ट ने यह भी कहा कि नाबालिग और उसकी माँ के बयानों में विरोधाभास था। कोर्ट ने गौर किया कि जहाँ नाबालिग ने दावा किया था कि उसके पिता ने उसकी माँ का फ़ोन नंबर ब्लॉक कर दिया था, वहीं उसने यह भी कहा कि वह हल्द्वानी से अपनी माँ से रोज़ बात करती थी।

कोर्ट ने आगे कहा कि केस दर्ज करने में हुई देरी इसलिए हुई क्योंकि माँ अपने अलग हो चुके पति को ऐसे आपराधिक मामलों में फँसाने की योजना बना रही थी, जिनसे उसे उम्रकैद की सज़ा हो सकती थी।

कोर्ट ने आगे कहा, "हमें यह भी पता चला कि पीड़िता 2017 से ही अपनी माँ के साथ रह रही थी, जब वह सिर्फ़ 5 साल की थी। वह कोर्ट में गवाही देने आने तक, यानी दस साल की उम्र तक, अपनी माँ के साथ ही रही। निस्संदेह, वह उन तकलीफ़ों से गुज़र रही थी जो उसकी माँ अपने पति के साथ खराब वैवाहिक संबंधों के कारण झेल रही थी। और निश्चित रूप से, इसी वजह से उसने वही बातें सीखीं या रटीं जो उसकी माँ ने उसे सिखाने के लिए कही थीं।"

कोर्ट ने पाया कि बच्ची और उसके पिता के बीच भी अच्छे संबंध थे, क्योंकि कोर्ट के सामने पेश की गई तस्वीरों में वह अपने पिता को गले लगाती और प्यार भरी नज़रों से उन्हें देखती हुई दिखाई दे रही थी।

यह निष्कर्ष निकालते हुए कि यौन हमले के बारे में बच्ची के बयानों पर भरोसा नहीं किया जा सकता, कोर्ट ने डॉक्टर के भाई समेत सभी आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि भाई को बिना किसी वजह के इस मामले में फँसाया गया था, क्योंकि उसके खिलाफ़ कोई सबूत नहीं था।

इस बीच, कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि ऐसे मामलों में बच्चे की गवाही पर बहुत समझदारी से विचार किया जाना चाहिए।

बेंच ने कहा, "हम यह भी कहना चाहेंगे कि जिन मामलों में POCSO एक्ट का इस्तेमाल माता-पिता में से किसी पर आरोप लगाने के लिए किया जा रहा हो, वहां बच्चे के गवाह के तौर पर दिए गए बयान पर बहुत सावधानी से विचार किया जाना चाहिए।"

आरोपी की ओर से सीनियर एडवोकेट IK चतुर्वेदी और उनके साथ एडवोकेट सौरभ चतुर्वेदी, राजीव द्विवेदी, राज व्यास और नवनीत पांडे पेश हुए।

शिकायतकर्ता की ओर से एडवोकेट धर्मेंद्र कुमार चौबे पेश हुए।

राज्य की ओर से एडिशनल गवर्नमेंट एडवोकेट CB धर दुबे और मुनि राज मेहरोत्रा ​​पेश हुए।

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