Police torture  
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महिला वकीलों ने देर रात पुलिस द्वारा अपहरण और हिरासत में प्रताड़ित किए जाने का आरोप लगाते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया

वकीलों कीर्ति और कनिका आहूजा ने आरोप लगाया कि रियल एस्टेट डेवलपर्स के कहने पर पुणे पुलिस के अधिकारियों ने उनके साथ मारपीट की और हिरासत में प्रताड़ित किया।

Bar & Bench

बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार को दो महिला वकीलों की ओर से दायर एक रिट याचिका पर नोटिस जारी किया। इस याचिका में पुणे पुलिस के सीनियर अधिकारियों पर आधी रात को अपहरण, मारपीट, डकैती और कस्टडी में टॉर्चर करने का आरोप लगाया गया है। [कीर्ति आहूजा और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य]

यह याचिका वकील कीर्ति आहूजा और कनिका आहूजा ने दायर की है। उन्होंने पुलिस की कथित मनमानी के मामले में स्वतंत्र न्यायिक जांच या सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) से जांच की मांग की है।

महाराष्ट्र सरकार और CBI के अलावा, याचिका में पुणे पुलिस कमिश्नर अमितेश कुमार और एडिशनल कमिश्नर तेजस्वी सतपुते समेत वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी पक्षकार बनाया गया है।

जस्टिस सारंग वी. कोटवाल और जस्टिस रंजीतसिंह आर. भोंसले की बेंच ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया और मामले की सुनवाई 2 हफ़्ते बाद के लिए तय की।

Justice SV Kotwal, Justice RR Bhonsale

याचिका के अनुसार, 17 जून 2026 को रात करीब 1:40 बजे पुणे में कीर्ति आहूजा के घर पर लगभग 200 पुलिसकर्मी जबरन घुस आए। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि पुलिस बल प्राइवेट SUV और पुलिस वैन में गैस कटर और लाठियां लेकर पहुंचा था। आरोप है कि ज़्यादातर पुलिसकर्मियों ने बिना नेमप्लेट वाले सादे कपड़े पहने हुए थे। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मेहमानों, किराएदारों, एक बुजुर्ग महिला और एक नवजात शिशु सहित 24 लोगों को बिना सर्च वारंट के गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में लिया गया।

कनिका आहूजा ने आरोप लगाया कि पुरुष अधिकारियों ने उनके साथ मारपीट की, उनके कपड़े फाड़ दिए और उनकी छाती व पीठ पर चोटें पहुंचाईं। वकीलों का दावा है कि यह रेड बड़े रियल एस्टेट डेवलपर्स के खिलाफ चल रहे करोड़ों रुपये के सिविल केस को खराब करने के मकसद से की गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने बिजली की लाइनें काट दीं, CCTV बंद कर दिए और कीमती सामान, नकदी व केस से जुड़े असली कानूनी दस्तावेज़ लूट लिए।

इसके अलावा, वकीलों ने पुलिस रिकॉर्ड में गंभीर गड़बड़ियों की ओर इशारा किया। पुलिस का दावा था कि उनका ऑपरेशन एक FIR के आधार पर किया गया था। हालांकि, स्टेशन रिकॉर्ड से पता चला कि कथित FIR उनके शुरुआती हिरासत में लिए जाने के कई घंटे बाद, सुबह 4:12 बजे दर्ज की गई थी।

वकीलों ने यह भी दावा किया कि महाराष्ट्र के DGP को की गई उनकी प्रशासनिक शिकायत को लापरवाही से उन्हीं आरोपी अधिकारियों के पास वापस भेज दिया गया।

इसे देखते हुए, याचिका में हाईकोर्ट के मौजूदा या रिटायर्ड जज से न्यायिक जांच कराने और दोषी अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने की मांग की गई है।

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Women lawyers move Bombay HC alleging late night abduction, custodial torture by police