काॅलेजजियम में कुछ विश्वास रखें - वरिष्ठ अधिवक्ता एस.पी. शर्मा के साथ वार्तालाप

काॅलेजजियम में कुछ विश्वास रखें - वरिष्ठ अधिवक्ता एस.पी. शर्मा के साथ वार्तालाप
SP Sharma

आदित्य एकेः वह एक वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में कैसे थे?

एस.पी. शर्माः ओह! अद्भुत । मैं हमेषा उनकी सलाह मानता हूं । मैं हर दिन सुबह सुठकर अपने दिन की शुरूआत उन्हें नमस्कार करके करता हूं । मुझे आवश्यकता पडने पर वह मुझे विनम्र भाव से सलाह देते थे ।

आदित्य एकेः आपके लिए वकालत का व्यवसाय शुरू करना काफी मुश्किल रहा होगा जैसा कि आपके परिवार में कोई कानूनी बैकग्राउण्ड से नहीं था ।

एसपी शर्माः यह बहुत ही मुश्किल समय था। दरअसल आप जानते हैं मेरी जेब में पैसे नहीं थे और दो साल तक मेरे पास कोई मुकदमा नहीं था । मुझे पता था कि इस पेशे में जमने के लिए बहुत समय लगता है । कुछ लोग कहते हैं अब डाॅक्टरों में भी परिपक्वता लाने की अवधि लम्बी है । मुझे लगता है कि यह हमारे पेशे में बहुत अधिक है, क्योंकि हमारे पास कोई विज्ञापन प्रणाली नहीं है । यह माउथ टू माउथ प्रचार है । मुवक्किल पीछे की पंक्ति में बैठते हैं और देखते हैं कि आप अपने प्रकरण पर क्या बहस कर रहे हैं ।

कभी-कभी हालांकि काफी बार उन्होंने दूसरे वकीलों को भी काम दिया है, जब वे आपको किसी मुकदमे में बहस करते हुए देखते हैं तो वो आपके पास आएंगे । तो आपको बहुत-बहुत कर्मशील होना होगा, आपको अपनी आंखें और कान खुले रखकर अदालत में बैठना होगा । और इससे आपका कानूनी पेशा वास्तव में आपको जीवन में ऊंचाईयों तक ले जा सकता है । आप केवल किताबें पढने से ही ऊंचाईयों तक नहीं पहुंच सकते । मैंने कई अधिवक्ता देखे हैं जो बुद्धिमान हैं लेकिन चतुर चालाक नहीं हैं ।

यदि आप बैठकर अपने मुवक्किल से चर्चा कर रह हैं और चाय और पकौडी खा रहें हैं, इससे तुम्हें क्या सीख मिलती है, आज तक मैं उन थडियों (चाय की दुकानों) में कभी नहीं गया । कुछ लोग कहते हैं कि यह भी मुवक्किल एकत्रित करने का एक तरीका है, लेकिन मुझे नहीं लगता है कि यह सही तरीका है ।

आदित्य एकेः जयपुर बार के बारे में आपका रूझान है?

एस.पी. शर्मा: हमारे यहां पहले बहुत ही परम्परावादी प्रणाली थी, जहां आप वर्षाें तक अपने वरिष्ठ के अधीन काम करते थे । अन्यथा अन्य अदालतों में कोई भी जूनियर किसी वरिष्ठ के साथ कम से कम 5-6 साल तक काम करता है और फिर आत्म निर्भर हो जाता है ।

वर्ष 2000 में यह प्रचलन बदल गया । अब युवा वकील सीनियर अधिवक्ता के साथ जुडते हैं, लगभग छः महीने या एक वर्ष के लिए और फिर वे अपना स्वतंत्र वकालत शुरू कर देते हैं और इसका मुख्य कारण यह है कि हर कोई कमाने की जल्दी में है। आज के समय में एक युवा नौजवान व्यक्ति की मांग और दबाब हमारे समय से बहुत अधिक है ।

और फिर आप सुस्थित अधिवक्ताओं के बेटे और बेटियों को देखते हैं । उनके पीछे एक अनुभव है और उनकी कमाई एक ऐसे नौजवान की तुलना में बहुत अधिक है जिनके पास कानूनी बैकग्राउण्ड नहीं है । इसलिए उनके लिए जो बिना किसी बैकग्राउण्ड के होड करना मुश्किल है और इसलिए वे आत्मनिर्भर होना चाहते हैं ।

वरिष्ठ अधिवक्ता अपने जूनियर्स को अच्छा भुगतान नहीं कर रहे हैं । यह एक शिकायत है जो मुझे हर जगह मिलती है । चाहे वह दिल्ली, कलकत्ता, बिहार या राजस्थान हो । और कुछ वरिष्ठ अधिवक्ता कुछ भी वेतन नहीं देते हैं । यहां तक कि मेरे वरिष्ठ ने शुरू में मुझे डेढ साल तक वेतन नहीं किया । उन्होंने सोचा कि वेतन देने से जूनियर को आराम मिलेगा और वह काम नहीं करेगा । लेकिन ऐसा नहीं था कि वह वेतन नहीं दे सकते । बस उनकी एक अलग ही मनोदृष्टि होती है ।

आदित्य एकेः और क्या आपके पास कोई अलग दृष्टिकोण है?

एस.पी. शर्मा: मैं उन सभी परेशानियों के बारे में जानता हूं, जिनका मेरे जूनियर्स सामना करते हैं । मैं उन्हें अच्छी तरह से वेतन देता हूं ताकि उनका पूरा ध्यान अपने पेशे पर हो ना कि कमाई पर । कमाई स्वाभाविक रूप से होती है क्योंकि आप अपने पेषे से अधिक परिचित हो जाते हैं । एक बार जब मुझे पता चलता है कि एक सहयोगी काफी परिपक्व हो गया है तो मैं उसे छोडकर जाने के लिए कहता हूं ।

आदित्य एकेः आपको वरिष्ठ के रूप में कब नामित किया गया था?

एस.पी. शर्मा: मैं वर्ष 2011 में वरिष्ठ के रूप में नामित हो गया था। मैं उस समय राजस्थान में सबसे कम उम्र का वरिष्ठ था और यह मेरे आवेदन पर नहीं था ।

उस समय, न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा मुख्य न्यायाधीश थे और श्री जी.एस. बाफना हमारे महाधिवक्ता थे । वह खुद एक नामित वरिष्ठ नहीं थे, क्योंकि वर्ष 1992 से राजस्थान में एक भी नियुक्ति नहीं हुई थी ।

इसलिए, मैं एक प्रकरण में बहस कर रहा था तथा श्री बाफना महाधिवक्ता के खिलाफ खड़े था और उस समय मैंने मुख्य न्यायाधीश के सामने यह कहा कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे उच्च न्यायालय में पर्याप्त वरिष्ठ अधिवक्ता नहीं हैं । मैंने यह भी कहा कि हमारे महाधिवक्ता को नामित नहीं किया गया था और इसके बारे में कुछ किया जाना चाहिए ।

और फिर श्री बाफना आये और न्यायाधीश मिश्रा ने उनसे कहा कि मैं कुछ कहना चाहता हूं । उन्होंने कहा, ‘मुझे लगता है कि श्री शर्मा अपने स्वयं के लिए भी यह कह रहे हैं।’ (हंसते हुए)

मुझे विश्वास था कि उन्होंने इस वृतान्त को जरूर याद रखा था, क्योंकि उनके आग्रह पर एक पूर्ण अदालत की बैठक में न्यायाधीशों में से एक ने मुझे भी नामित किया जाना चाहिए का प्रस्ताव रखा । इसलिए उन्होंने मुझे आगे बढाया और मुझसे कहा कि मुझे इसे स्वीकार करना चाहिए तथा मैंने इसलिए इसे स्वीकार किया ।

आदित्य एकेः इससे पहले उच्च न्यायालय ने वरिष्ठ अधिवक्ता क्यों नामित नहीं हुए?

एस.पी. शर्मा: किसी को प्रक्रिया शुरू करनी है और पूर्ण न्यायालयों के लिए एजेंडा हमेशा मुख्य न्यायाधीश द्वारा हस्ताक्षरित और अंत में रखा जाता है । इसलिए, संबंधित मुख्य न्यायाधीशों ने ऐसा नहीं किया, जो कि उन्हें करना चाहिए था । मेरे साथ नामित वरिष्ठ 30-35 से अधिक वर्षाें से वकालात कर रहे थे ।

आदित्य एकेः यह एक धारणा है कि न्यायिक नियुक्तियों की बात करते समय पारदर्शिता की कमी है ।

एस.पी. शर्मा: देखिए, किसी न्यायाधीश की नियुक्ति की प्रक्रिया किसी अन्य नियुक्ति से बिल्कुल अलग है । यह एक तरह की नियुक्ति नहीं है, यह एक नामांकरण है । यह पद एक संवैधानिक पद है । आप इसे किसी अन्य सरकारी पद से बराबरी नहीं कर सकते । न्यायाधीशों को नामित करने वाले व्यक्ति स्वयं न्यायाधीश होते हैं । उन्हें पता है कि न्यायाधीश होने के क्या नियम हैं ।

दिन-प्रतिदिन, वे अधिक्ताओं को उनके सामने बहस करते हुए पाते हैं । इसलिए, यदि वकीलों में से चयन किया जाना है तो न्यायाधीशों के पास वह अधिकार होने चाहिए । आप उनसे यह नहीं पूछ सकते कि उन्होंने ‘ए’ को क्यों चुना है और उन्होंने ‘बी’ को क्यों नहीं चुना, क्योंकि यह उनकी धारणा पर निर्भर करता है और धारणा लिखी नहीं जा सकती । यदि यह एक नौकरी थी - जैसे राष्ट्रीय न्यायिक सेवा - तो लोग आवेदन करते सकते हैं और न्यायाधीश बन सकते हैं । लेकिन आप ऐसा नहीं कर रहे हैं ।

पारदर्शिता निश्चित रूप से न्यायाधीशों के बीच है । वे एक दूसरे के साथ चर्चा करते हैं और इसे किसी और को बताने की आवश्यकता नहीं है । आपने वरिष्ठतम न्यायाधीशों में से पांच को जिम्मेदारी दी है उन पर विश्वाश है । जब यह आपे मामले, आपके भवन, आपके विवादों की बात आती है तो आप न्यायाधीशों का फैसला मानते हैं । लेकिन जब चयन की बात आती है तो आप इसे स्वीकारने को तैयार नहीं होते हैं ।

अब जबकि एक फैसला है कि काॅलेजियम को रहना चाहिए, आप इसके खिलाफ नहीं जा सकते। एक उच्चतम न्यायालय के सिटिंग न्यायाधीश का मानना है कि इसमें कोई पारदर्शिता नहीं है। क्या वे पूर्ण न्यायालय की बैठकों में जो चर्चा की जाती है उसे सार्वजनिक करना चाहते हैं उन बैठकों में आप केवल नियुक्तियों पर चर्चा नहीं करते हैं लेकिन कई अन्य चर्चाएं जैसे वरिष्ठ अधिवक्ताओं की नियुक्ति । यदि आपके पास पूर्ण पारदर्शिता है तो कल कोई व्यक्ति पूछ सकता है ‘मुझे वरिष्ठ क्यों नहीं बनाया गया’ वही न्यायाधीशों के मामले में ।

आदित्य एकेः राजस्थान में कानूनी शिक्षा को लेकर आपके क्या विचार हैं?

एस.पी. शर्मा: न केवल राजस्थान बल्कि सम्पूर्ण भारत में कानूनी शिक्षा की स्थिति दयनीय है। मुवक्किल यह नहीं जानते कि किसी विशेष मामले में क्या करना है । यदि वे किसी आपराधिक प्रकरण में पकडे जाते हैं तो वह यह नहीं जानते कि उनके अधिकार या बचाव क्या हैं या यहां तक कि जुर्माना जो उन्हें भुगताना होता है । क्यों? क्योंकि, हमारी स्कूल शिक्षा में हमारे पास शिक्षा के रूप एक कानूनी विषय नहीं है। कम से कम आईपीसी के प्रावधानों, संविधान के तहत अधिकारों जैसे न्यूनतम मूलभूत कानून को एक विषय के रूप में पढाया जाना चाहिए। यदि आप एक अच्छा समाज चाहते हैं, यदि आप एक अच्छा नागरिक बनना चाहते हैं, तो उसे अपने अधिकारों और कर्तव्यों के लिए जागरूक होना चाहिए ।

लेकिन दुर्भाग्यवश एक अनुमान है कि हर कोई कानून जानता है । आप यह कैसे मान सकते हैं कि जिस समाज में लगभग 40 प्रतिशत लोग निरक्षर हैं, यह सरकार के लिए नीति का विषय है उन्हें इस पर गौर करना चाहिए ।

आदित्य एकेः कोई भी यादगार मामला जिसे आप स्मरण कर सकते हैं?

एस.पी. शर्मा: आरक्षण से संबंधित एक मामला सबसे यादगार मामलों में से एक था । प्रकरण यह था कि क्या पदोन्नति में आरक्षण होना चाहिए । उच्च न्यायालय से जो आदेश हमें मिला, उसके बाद अन्य सभी उच्च न्यायालयों द्वारा भी उसका अनुसरण किया गया । उत्तरप्रदेश, हिमाचल प्रदेश और पंजाब में पदोन्नति पर आरक्षण नहीं है, लेकिन राजस्थान में यह अभी भी जारी है । एक संशोधन के माध्यम से उन्होंने इसे पुनः प्रस्तावित किया और मैं ऐसे मामलों पर बहस कर रहा हूं ।

एक ऐसा मामला भी सामने आया जिसमें एक दम्पत्ति अलग हो गये जिसमें एक विधायक की बेटी थी जो मुस्लिम थी । हालांकि विधायक खुद को एक धर्मनिरपेक्ष आशय के रूप में बताता है, जब अपनी बेटी की ही बात आती है तो वह बहुत कठोरता से मुस्लिम बन गया । लडका हिन्दू था । वे दोनों डर गये कि वे दोनों मारे जा सकते हैं इसलिए मैंने उस मामले को उठाया ।

उस समय मेरे कई मुवक्किल पुलिस अधीक्षक (एसपी) थे। एक खास दिन न्यायालय में एक एसपी का मामला सूचीबद्ध था । इसलिए मैंने दम्पत्ति को अपने पास बुलाया और मैंने एसपी को भी बुलाया वह अपनी गाडी में आया । मैंने सुझाव दिया कि हम सभी एसपी की गाडी में न्यायालय जाएंगे, इसलिए मैंने दम्पत्ति को उनकी जिप्सी में बैठाया और उनको मुख्य न्यायाधीश के समक्ष पेश किया । एसपी को नहीं पता था कि वे कौन थे (हंसते हुए)।

और उस समय के मुख्य न्यायाधीश ने दोनों अधिवक्ताओं को एक दायित्व देने के लिए कहा कि वे दम्पत्ति की रक्षा करेंगे, उनकी देखभाल करेंगे और उन्हें आश्रय प्रदान करेंगे । वे अब बहुत खुश हैं और वे मेरे पास आते रहते हैं । इस तरह की बातें आजीवन स्मरणीय हैं ।

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