

2 नवंबर को दिल्ली में कुछ अनोखे नज़ारे देखने को मिले, जब दिल्ली पुलिस के 100 से ज़्यादा जवान अपनी ही संस्था के मुख्यालय के बाहर जमा हुए और दिल्ली पुलिस के ही ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन किया।
इन विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस (ACP) मनस्वी वशिष्ठ ने किया, जिनका कुछ दिन पहले ही तबादला कर दिया गया था। यह तबादला दिल्ली जिला अदालतों की हड़ताल के बाद हुआ था। पुलिस मुख्यालय में वशिष्ठ के विरोध प्रदर्शन के कुछ ही घंटों के भीतर, गृह मंत्रालय (MHA) ने उन्हें सस्पेंड कर दिया।
3 नवंबर को, कई वकील दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचे और मुख्य न्यायाधीश से आग्रह किया कि वे वशिष्ठ और अन्य पुलिसकर्मियों द्वारा वकीलों को दी गई कथित धमकियों का स्वतः संज्ञान (suo motu cognisance) लें।
हालांकि हाई कोर्ट ने खुद से कोई कार्यवाही शुरू करने से इनकार कर दिया, लेकिन उन्होंने वकीलों को एक याचिका दायर करने के लिए कहा और भरोसा दिलाया कि इस मामले को "देखा जाएगा"।
आरोपों और जवाबी आरोपों का यह सिलसिला अब एक बड़े संस्थागत टकराव में बदल गया है। आइए देखते हैं कि यह विवाद कैसे बढ़ा और आगे क्या हो सकता है।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई
'इंडियन एक्सप्रेस' की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस विवाद की शुरुआत 23 अक्टूबर को उत्तर-पूर्वी दिल्ली के रोहताश नगर में हुई। वहां एक सैलून के बाहर खड़ी मोटरसाइकिल को लेकर बहस हो गई थी। विवाद इतना बढ़ गया कि आरोप है कि वकीलों का एक समूह वापस सैलून पहुंचा, वहां तोड़फोड़ की और सैलून की मालकिन शीतल ठाकुर के साथ मारपीट की, जो उस समय आठ महीने की गर्भवती थीं।
उसी दिन, जब दोनों पक्ष पुलिस स्टेशन पहुंचे, तो वहां हाथापाई हो गई, जिसमें वकील ललित बंसल के सिर पर चोट लग गई।
वकीलों का कहना है कि पुलिस ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि मारपीट करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, उनका आरोप है कि उन लोगों को छोड़ दिया गया।
24 अक्टूबर को, ललित बंसल के साथ वकीलों का एक समूह पुलिस स्टेशन पहुंचा, जहां कथित तौर पर वकीलों और पुलिसकर्मियों के बीच फिर से टकराव हुआ।
वकीलों का आरोप है कि जब उन्होंने पुलिस द्वारा मामले को संभालने के तरीके पर सवाल उठाया, तो ACP वशिष्ठ ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकालकर उन्हें धमकाया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि वशिष्ठ ने वकील ललित बंसल सहित अन्य वकीलों पर हमला करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।
वहीं, वशिष्ठ ने वकीलों के एक समूह पर आरोप लगाया कि वे पुलिस स्टेशन में घुस आए, अधिकारियों के साथ गाली-गलौज और बदसलूकी की, और उन्हें अपना काम करने से रोका। वकीलों के एक समूह के खिलाफ FIR भी दर्ज की गई। इस घटना के बाद दिल्ली की जिला अदालतों में वकीलों ने विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिए और अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए।
28 अक्टूबर को वशिष्ठ और शाहदरा स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) का तबादला कर दिया गया।
बाद में, सोशल मीडिया पर कई वीडियो सामने आए, जिनमें वकीलों का एक समूह उस कमरे में दाखिल होता दिख रहा है, जहाँ ACP वशिष्ठ और SHO बैठे थे। वीडियो में वशिष्ठ एक बंदूक के साथ बैठे दिखाई दे रहे हैं। वकीलों के कमरे में आने के बाद, वशिष्ठ अपने एक जूनियर अधिकारी से कहते हैं कि वह उनके पास मौजूद बंदूक को ले जाए, क्योंकि उन्होंने बड़ी बंदूक मंगवाई थी। जूनियर अधिकारी बंदूक वापस ले लेता है। इसके बाद वीडियो में वकील SHO पर चिल्लाते हुए दिखाई देते हैं। एक वकील SHO का हाथ भी पकड़ लेता है।
ACP मनस्वी वशिष्ठ के खिलाफ आरोप
वकीलों का आरोप है कि 24 अक्टूबर को जब वे रोहताश नगर में वकील ललित बंसल पर हुए हमले के मामले में पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाने शाहदरा पुलिस स्टेशन गए, तो ACP मनस्वी वशिष्ठ ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर दिखाकर उन्हें धमकाया।
वकीलों का आरोप है कि वशिष्ठ और SHO ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि आरोपियों को गिरफ्तार किया जाएगा, लेकिन बाद में उन्हें वहां से जाने दिया गया। वहीं, वशिष्ठ ने 15-20 वकीलों पर आरोप लगाया कि वे पुलिस स्टेशन में घुस आए, पुलिसकर्मियों के साथ बदसलूकी की और सरकारी काम में बाधा डाली।
ACP मनस्वी वशिष्ठ और दिल्ली पुलिस के जवान क्यों सड़कों पर उतरे?
2 नवंबर को दिल्ली पुलिस के जवानों का विरोध प्रदर्शन, वशिष्ठ और शाहदरा के SHO के तबादले के कारण शुरू हुआ।
अलग-अलग आंकड़ों के अनुसार, 100 से ज्यादा पुलिसकर्मी दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर इकट्ठा हुए। उन्होंने आरोप लगाया कि अपनी ड्यूटी निभाते समय वकीलों द्वारा पुलिसकर्मियों को डराया-धमकाया जा रहा है और उन पर दबाव डाला जा रहा है।
प्रदर्शनकारियों ने पुलिसकर्मियों के साथ बदसलूकी और उन्हें धमकाने वाले वकीलों के खिलाफ कार्रवाई, पुलिस स्टेशनों और कोर्ट परिसरों में बेहतर सुरक्षा, और अपनी शिकायतों के समाधान के लिए एक औपचारिक व्यवस्था की मांग की। अंत में, उन्होंने अपनी पांच मांगें सौंपीं।
विरोध प्रदर्शन के दौरान वशिष्ठ ने ऐसा क्या कहा जिससे वकील भड़क गए?
2 नवंबर को दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान, वशिष्ठ ने वकीलों को निशाना बनाते हुए कई टिप्पणियां कीं।
एक वीडियो में उन्हें वकीलों को "काले कोट वाले गुंडे" और "काले कोट के बहुरूपिये" कहते हुए सुना जा सकता है।
उन्होंने यह भी मांग की कि जिला अदालतों में पुलिस की कम से कम दो कंपनियां तैनात की जानी चाहिए, ताकि पुलिसकर्मी गर्व के साथ अदालत में प्रवेश कर सकें और उनके साथ दुर्व्यवहार करने वाले किसी भी वकील के खिलाफ कार्रवाई की जा सके।
अब वकील क्या मांग कर रहे हैं?
वशिष्ठ की टिप्पणियां वायरल होते ही, राजधानी के कई बार एसोसिएशनों ने उपराज्यपाल और दिल्ली पुलिस आयुक्त को पत्र लिखकर उनके खिलाफ तुरंत कार्रवाई करने की मांग की।
रोहिणी कोर्ट बार एसोसिएशन ने कहा कि जब तक कार्रवाई नहीं होती, वे हड़ताल पर रहेंगे। हालांकि, गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा वशिष्ठ को निलंबित किए जाने के बाद उन्होंने हड़ताल का फैसला वापस ले लिया।
3 नवंबर को यह मामला दिल्ली हाई कोर्ट के संज्ञान में लाया गया। वकीलों के एक समूह ने ACP के खिलाफ स्वतः संज्ञान (suo motu) लेकर कार्रवाई करने की मांग की। वकीलों का आरोप था कि ये टिप्पणियां कानूनी समुदाय के लिए एक तरह की धमकी हैं।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नितिन वासुदेव साम्ब्रे और न्यायमूर्ति संजय शर्मा की खंडपीठ ने स्वतः संज्ञान लेने से इनकार कर दिया और वकीलों से एक औपचारिक याचिका दायर करने को कहा। कोर्ट ने भरोसा दिलाया कि अगर याचिका दायर की जाती है, तो इस मामले पर विचार किया जाएगा।
वकीलों और पुलिस के बीच टकराव का इतिहास
दिल्ली पुलिस और वकीलों के बीच तनाव कोई नई बात नहीं है।
जनवरी 1988 में, सेंट स्टीफंस कॉलेज में चोरी के एक मामले में एक वकील की गिरफ्तारी और उन्हें कथित तौर पर हथकड़ी लगाए जाने के विरोध में वकीलों ने प्रदर्शन किया था।
यह विरोध प्रदर्शन तीस हजारी कोर्ट में टकराव में बदल गया, जहां पुलिस की लाठीचार्ज में कई वकील घायल हो गए। वकीलों ने दो महीने तक हड़ताल की और तत्कालीन डीसीपी किरण बेदी के इस्तीफे की मांग की।
जब दिल्ली हाई कोर्ट ने मामले की जांच के लिए एक मौजूदा जज की अध्यक्षता में एक समिति बनाई, तब जाकर यह हड़ताल खत्म हुई। अपनी रिपोर्ट में, समिति ने कहा कि वकील को हथकड़ी लगाना गैर-कानूनी था और बेदी के तबादले की सिफारिश की।
एक और बड़ा टकराव 2 नवंबर 2019 को तीस हजारी कोर्ट में हुआ, जो एक वकील और पुलिसकर्मी के बीच पार्किंग को लेकर हुए विवाद के बाद शुरू हुआ था।
यह टकराव हिंसा में बदल गया, जिसमें साकेत और कड़कड़डूमा कोर्ट में भी वकीलों और पुलिस ने एक-दूसरे पर हमला किया। इस दौरान कई लोग घायल हो गए और गाड़ियों में आग लगा दी गई।
इस घटना के बाद वकीलों ने विरोध प्रदर्शन किया, और इसके जवाब में 5 नवंबर 2019 को दिल्ली पुलिस के सैकड़ों जवानों ने अपने मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन किया।
आगे क्या हो सकता है
हालांकि गृह मंत्रालय (MHA) ने वशिष्ठ को सस्पेंड कर दिया है, लेकिन यह विवाद जल्द खत्म होता नहीं दिख रहा है। वकीलों के संगठनों ने उनकी टिप्पणियों की निंदा की है, और दिल्ली हाई कोर्ट में याचिकाएं दायर किए जाने की संभावना है।
वशिष्ठ भी अपने निलंबन को चुनौती देते हुए कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
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ACP Manasvi Vashishta row: Why Delhi Police and advocates are at loggerheads