

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के खिलाफ दायर चुनाव याचिका को शुरुआती स्तर पर ही खारिज करने से छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के इनकार को सही ठहराया [भूपेश बघेल बनाम विजय बघेल]।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की।
यह चुनावी याचिका 2023 के छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों से जुड़ी है, जिसमें तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पाटन निर्वाचन क्षेत्र से 95,438 वोट पाकर विजय बघेल को हराया था, जिन्हें 75,715 वोट मिले थे।
विजय बघेल की चुनावी याचिका में आरोप लगाया गया है कि भूपेश बघेल ने 16 नवंबर, 2023 को - यानी वोटिंग से पहले 15 नवंबर, 2023 को शाम 5 बजे शुरू हुए 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951' की धारा 126 के तहत 48 घंटे की "साइलेंस पीरियड" (चुनावी प्रचार पर रोक की अवधि) के दौरान - एक रैली या रोड शो आयोजित किया था।
भूपेश बघेल ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 15 जून, 2026 के उस अंतरिम आदेश को चुनौती दी, जिसमें चुनावी याचिका को शुरुआती चरण में ही खारिज करने की उनकी अर्जी को नामंजूर कर दिया गया था।
भूपेश बघेल की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि उन पर लगा आरोप अधिनियम की धारा 126 से संबंधित है, जो चुनावी अपराध बनाती है, न कि धारा 123(7) से, जो भ्रष्ट आचरण से संबंधित है।
सिब्बल ने कहा, "15 नवंबर को चुनाव प्रचार बंद हो गया था। 17 नवंबर को मुझे किसी भी बैठक में शामिल होने की अनुमति नहीं थी। आरोप यह है कि 16 नवंबर को मैं एक बैठक में शामिल हुआ था। वह एक धार्मिक कार्यक्रम था।"
जस्टिस बागची ने कहा कि बघेल को यह साबित करना होगा कि चुनाव के नतीजे पर कोई खास असर नहीं पड़ा। सिब्बल ने जवाब दिया कि यह सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि भीड़ में सिर्फ़ 200 लोग थे, जबकि वे 20,000 वोटों के अंतर से जीते थे।
सिब्बल ने साफ़ किया, "मैं ऐसा नहीं कह रहा हूँ। यह तो प्रतिवादी (respondent) का अपना तर्क है," जब कोर्ट ने उनकी इस बात पर ध्यान दिया कि भीड़ बहुत छोटी थी।
जस्टिस मोहना ने बताया कि याचिका में ऐसी कोई मांग नहीं की गई थी कि याचिकाकर्ता को निर्वाचित घोषित किया जाए।
सिब्बल ने कोर्ट को एक्ट की धारा 100(1)(d)(iv) के बारे में बताया और माना कि एक्ट या नियमों के उल्लंघन के मामले में भी यह साबित करना होगा कि इससे चुनाव के नतीजे पर कोई खास असर पड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट में बघेल की याचिका का रास्ता थोड़ा घुमावदार रहा। उन्होंने सबसे पहले 8 मई, 2025 के हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें चुनाव याचिका को खारिज करने के लिए CPC के ऑर्डर VII नियम 11 के तहत उनकी अर्जी को नामंजूर कर दिया गया था।
उस याचिका को 22 जुलाई, 2025 को जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच के सामने वापस ले लिया गया था, और उन्हें हाई कोर्ट में याचिका की स्वीकार्यता (maintainability) को शुरुआती मुद्दे के तौर पर उठाने की अर्जी देने की छूट दी गई थी।
हाईकोर्ट ने 14 अक्टूबर, 2025 को शुरुआती मुद्दा तय किया, लेकिन 15 जून, 2026 को फिर से बघेल के खिलाफ़ फैसला सुनाया, जिसके बाद यह स्पेशल लीव पिटीशन दायर की गई।
कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए बघेल को चुनाव ट्रिब्यूनल के सामने अपनी सभी दलीलें और बातें रखने की छूट दी।
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Approach election tribunal: Supreme Court to Bhupesh Baghel in plea to reject election petition