CBI ने दिल्ली हाईकोर्ट से कहा अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया आबकारी नीति मामले मे देरी करने के लिए बचकाने तरीके अपना रहे है

जस्टिस मनोज जैन ने केजरीवाल और सिसोदिया को CBI की ओर से उनके डिस्चार्ज (आरोप मुक्त किए जाने) को चुनौती देने पर जवाब देने का आखिरी मौका दिया।
Arvind Kejriwal and Manish Sisodia
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सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) ने सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट को बताया कि आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक आबकारी नीति मामले में कार्यवाही में देरी करने के लिए "बचकाने" तरीके अपना रहे हैं।

CBI की तरफ़ से सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता पेश हुए। उन्होंने जस्टिस मनोज जैन के सामने अपनी बात रखी, जब केजरीवाल और दूसरों के वकीलों ने इस मामले में उन्हें आरोप-मुक्त करने के CBI के चैलेंज पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए चार हफ़्ते का समय मांगा।

SG मेहता ने कहा कि जवाब दाखिल करने के लिए चार हफ़्ते मांगना सही नहीं है, क्योंकि कोर्ट ने 16 जुलाई के आदेश में केजरीवाल, सिसोदिया और दुर्गेश पाठक को अपना जवाब दाखिल करने का एक आखिरी मौका दिया था।

SG ने कहा, "वे कह रहे हैं कि उन्हें बहुत अच्छा आदेश मिला है। मैं कह रहा हूं कि यह उस कागज़ के भी लायक नहीं है जिस पर यह लिखा है... चार हफ़्ते की मांग सही नहीं है। माई लॉर्ड जानते हैं कि यह सही नहीं है। यह मामले को टालने का बचकाना तरीका है।"

हालांकि, केजरीवाल की तरफ़ से पेश हुए सीनियर एडवोकेट एन हरिहरन ने कहा कि CBI की लिखित दलीलें 103 पेज की थीं और उनमें कई अतिरिक्त आधार उठाए गए थे।

सिसोदिया की तरफ़ से पेश हुईं सीनियर एडवोकेट रेबेका जॉन ने कहा कि CBI ने अपनी रिविज़न याचिका में जो आधार उठाए थे, वे सामान्य थे और बाद में उनका दायरा बढ़ा दिया गया।

संक्षेप में दलीलें सुनने के बाद, जस्टिस जैन ने केजरीवाल और दूसरों को चार हफ़्ते में अपना जवाब दाखिल करने का एक आखिरी मौका दिया।

उन्होंने कहा कि मामले में दलीलें 5 और 6 अक्टूबर को सुनी जाएंगी और इसके बाद कोई और मोहलत नहीं दी जाएगी।

बेंच ने ज़ोर देकर कहा, "हम इसे 5 और 6 अक्टूबर को सुनेंगे। मैं साफ़ कर रहा हूं कि हम अभियोजन पक्ष की दलीलें सुनना शुरू करेंगे।"

इस बीच, दुर्गेश पाठक की तरफ़ से पेश हुए सीनियर एडवोकेट विक्रम चौधरी ने कहा कि उन्होंने CBI के मामले की स्वीकार्यता (maintainability) पर शुरुआती आपत्तियां उठाते हुए आवेदन दाखिल किए हैं और कोर्ट को मामले के गुण-दोष पर दलीलें सुनने से पहले स्वीकार्यता के मुद्दे पर फ़ैसला करना चाहिए।

हालांकि, कोर्ट ने कहा कि वह मामले में "टुकड़ों-टुकड़ों" में आगे नहीं बढ़ेगी, बल्कि पूरे मामले पर एक साथ फ़ैसला करेगी।

कोर्ट ने कहा, "मैं कह रहा हूं कि यह टुकड़ों-टुकड़ों में नहीं होगा। दलीलें एक ही बार में सुनी जाएंगी।"

Justice Manoj Jain
Justice Manoj Jain

इस साल 27 फरवरी को एक ट्रायल कोर्ट ने केजरीवाल और 22 अन्य आरोपियों को इस मामले से बरी कर दिया था। CBI ने इस आदेश को चुनौती दी और यह मामला सबसे पहले जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के सामने आया।

9 मार्च को जस्टिस शर्मा ने इस मामले में नोटिस जारी किया और मामले की जांच करने वाले CBI अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही के ट्रायल कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी। जस्टिस शर्मा ने यह भी पाया कि ट्रायल कोर्ट ने अपने आदेश में जो बातें कही थीं, उनमें से कुछ गलत थीं। उन्होंने ट्रायल कोर्ट को PMLA कार्यवाही को टालने का भी निर्देश दिया, जो CBI के मामले पर आधारित थी।

इसके बाद केजरीवाल और अन्य आरोपियों - सिसोदिया, पाठक, विजय नायर, अरुण पिल्लई और चनप्रीत सिंह रयात - ने जस्टिस शर्मा के मामले से अलग होने के लिए अर्जी दाखिल की।

उन्होंने आरोप लगाया कि उनके बच्चे केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल में वकील हैं, इसलिए मामले की सुनवाई में हितों का टकराव (conflict of interest) हो सकता है। उन्होंने उन पर वैचारिक पूर्वाग्रह का भी आरोप लगाया और कहा कि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वकीलों की शाखा 'अधिवक्ता परिषद' के कार्यक्रमों में शामिल हुई थीं। जस्टिस शर्मा ने शुरू में इन तर्कों को खारिज कर दिया और फैसला किया कि वह मामले की सुनवाई जारी रखेंगी।

इसके बाद केजरीवाल, सिसोदिया और पाठक ने जस्टिस शर्मा के सामने कार्यवाही का बहिष्कार करने का फैसला किया। बाद में, जस्टिस शर्मा ने अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों के लिए केजरीवाल और अन्य लोगों के खिलाफ अदालत की अवमानना ​​की कार्यवाही शुरू करने का फैसला किया। इसे देखते हुए, उन्होंने यह भी फैसला किया कि वह आबकारी नीति मामले की सुनवाई नहीं करेंगी।

गौरतलब है कि केजरीवाल, सिसोदिया और पाठक ने हाल ही में CBI की याचिका को खारिज करने की मांग करते हुए अर्जी दाखिल की थी। उन्होंने तर्क दिया कि यह याचिका ट्रायल कोर्ट के फैसले के 4 घंटे के भीतर "अभूतपूर्व जल्दबाजी" और "बहुत ही गैर-गंभीर तरीके" से दायर की गई थी।

उनकी अर्जियों के अनुसार, रिवीजन याचिका में ट्रायल कोर्ट के फैसले में किसी भी खास गैर-कानूनी बात या गड़बड़ी का जिक्र नहीं किया गया है।

सिसोदिया ने अपनी अर्ज़ी में कहा, "CBI की यह आम याचिका (omnibus petition) हर आरोपी के ख़िलाफ़ अलग-अलग यह बताने में भी नाकाम रही है कि डिस्चार्ज का आदेश बिना किसी सबूत के कैसे दिया गया, या किसी खास आरोपी के मामले में अहम सबूतों को कैसे नज़रअंदाज़ किया गया, या किस आरोपी के लिए किस पैराग्राफ़ में दिया गया फ़ैसला मनमाने या ग़लत तरीके से न्यायिक विवेक का इस्तेमाल दिखाता है। CBI इस रिविज़न याचिका के साथ ऐसा कोई सबूत, सामग्री या दस्तावेज़ भी पेश नहीं कर पाई है जो डिस्चार्ज के आदेश में कोई गड़बड़ी या ग़लती दिखा सके।"

इसके अलावा, यह भी कहा गया है कि ऐसी "बिना ठोस आधार वाली, आम और अस्पष्ट याचिका" दायर करने से प्रतिवादियों (respondents) को नुकसान हो रहा है, क्योंकि वे यह समझ नहीं पा रहे हैं कि उन्हें किस मामले का सामना करना है।

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Arvind Kejriwal, Manish Sisodia using "childish" ways to delay Excise Policy case: CBI to Delhi HC

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