बॉम्बे हाईकोर्ट ने 'रसगुल्ला' जोक को लेकर अभिनेताओं शेखर सुमन और भारती सिंह के खिलाफ दर्ज हेट स्पीच FIR रद्द कर दी

अदालत ने पाया कि इस संवाद में धारा 295A के तहत धार्मिक भावनाओं को आहत करने का कोई इरादा नहीं था, और इसलिए इसे किसी आपराधिक मुकदमे का आधार नहीं बनाया जा सकता।
Shekhar Suman (L), Bharti Singh (R)
Shekhar Suman (L), Bharti Singh (R)
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने अभिनेता और टीवी होस्ट शेखर सुमन तथा कॉमेडियन भारती सिंह के खिलाफ, सोनी टीवी के शो 'कॉमेडी सर्कस का जादू' में किए गए एक मज़ाक को लेकर 2010 में दर्ज हेट-स्पीच के मामले को रद्द कर दिया है।

जस्टिस अमित बोरकर ने फैसला सुनाया कि उनके कॉमेडी एक्ट से भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 295A के तहत धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का कथित अपराध साबित नहीं होता, क्योंकि धार्मिक भावनाओं को आहत करने का कोई गलत इरादा नहीं था।

कोर्ट ने दोहराया कि किसी कलाकार या प्रोग्राम के जज के खिलाफ आपराधिक कानून का इस्तेमाल हल्के-फुल्के तरीके से सिर्फ इसलिए नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि किसी को कोई परफॉर्मेंस संदर्भ से हटकर देखने पर अपमानजनक लगी हो।

कोर्ट ने पाया कि कोई अपराध साबित होने के लिए, धार्मिक भावनाओं को जान-बूझकर निशाना बनाने और गलत इरादे का होना ज़रूरी है, जो इस मामले में नदारद था।

कोर्ट ने कहा, "जिन शब्दों को आपत्तिजनक बताया जा रहा है, वे हैं - 'या अल्लाह! रसगुल्ला! दही भल्ला!' याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये शब्द सिर्फ़ तुकबंदी और हास्य प्रभाव के लिए इस्तेमाल किए गए हैं। उनकी दलील है कि 'दही भल्ला' और 'रसगुल्ला' आम खाने की चीज़ें हैं, जिन्हें सभी समुदायों के लोग जानते हैं और खाते हैं, और इन शब्दों में कोई धार्मिक रंग नहीं है। इस दलील को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। आम सामाजिक इस्तेमाल में ये शब्द अपने आप में तटस्थ हैं। किसी हास्य प्रस्तुति में खाने की चीज़ों का ज़िक्र कर देना ही धर्म का अपमान नहीं माना जा सकता। इसके लिए कुछ और भी ज़रूरी है। ऐसा कोई सबूत होना चाहिए जिससे यह साबित हो सके कि इन शब्दों को किसी को ठेस पहुँचाने के हथियार के तौर पर चुना गया था।"

कोर्ट ने यह फ़ैसला सुमन और सिंह द्वारा 2012 में दायर उन याचिकाओं पर सुनाया, जिनमें 2010 में दर्ज एक FIR को चुनौती दी गई थी। यह FIR रज़ा एकेडमी के अध्यक्ष मोहम्मद इमरान ददानी रसाबी की शिकायत के आधार पर दर्ज की गई थी।

Justice Amit Borkar
Justice Amit Borkar
किसी हास्य-प्रस्तुति में खाद्य पदार्थों का मात्र उल्लेख धर्म का अपमान नहीं माना जा सकता।
बंबई उच्च न्यायालय

शिकायत में 20 नवंबर, 2010 को प्रसारित 'कॉमेडी सर्कस का जादू' के एक एपिसोड पर आपत्ति जताई गई थी।

सुमन सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविज़न के इस शो में जज थे। सिंह इस एपिसोड में एक कलाकार के तौर पर नज़र आए थे; इस एपिसोड की थीम अलग-अलग पेशों का मज़ाकिया चित्रण करना था।

आरोप लगाया गया था कि इस एपिसोड में कुछ ऐसे शब्द या भाव इस्तेमाल किए गए थे जिनसे मुसलमानों की भावनाएँ आहत हुईं, जिनमें "या अल्लाह! रसगुल्ला! दही भल्ला!" जैसे शब्द शामिल थे।

अदालत ने सिंह और सुमन की इस दलील को मान लिया कि यह कार्यक्रम एक हल्का-फुल्का पारिवारिक मनोरंजन शो था, और इन शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ़ तुकबंदी वाले उद्गारों के तौर पर किया गया था, जिनका मकसद किसी भी धर्म का अपमान करना नहीं था।

अदालत ने आगे कहा, "एक कॉमेडी शो में जज की भूमिका उस वक्ता जैसी नहीं होती जो किसी धार्मिक समूह के खिलाफ़ कोई घोषणा कर रहा हो। ऐसे मंच पर प्रदर्शन करने वाला कलाकार भी एपिसोड की स्क्रिप्ट के हिसाब से ही अभिनय करता है। रिकॉर्ड से यह ज़ाहिर नहीं होता कि याचिकाकर्ता जजों ने खुद ये शब्द लिखे थे। उन्हें सौंपी गई भूमिका इतनी दूर की है कि उन्हें शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए अपराधों के दायरे में नहीं लाया जा सकता।"

जस्टिस बोरकर ने यह भी गौर किया कि FIR और उसके बाद की सभी कार्यवाही रद्द करने से पहले, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 196 के तहत कोई पूर्व मंज़ूरी नहीं ली गई थी; यह मंज़ूरी मानहानि या हेट स्पीच (नफ़रत फैलाने वाले भाषण) को दंडित करने वाले कानूनों के दुरुपयोग को रोकने के लिए एक अनिवार्य सुरक्षा उपाय है।

सुमन और सिंह की तरफ़ से वरिष्ठ वकील नितिन प्रधान, वकील पी.डी. देसाई के साथ पेश हुए।

राज्य सरकार की तरफ़ से अतिरिक्त लोक अभियोजक मेघा बजोरिया पेश हुईं।

[आदेश पढ़ें]

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Bombay HC quashes hate‑speech FIR against actors Shekhar Suman, Bharti Singh over 'Rasgulla' joke

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