

बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार को जबरन वसूली के एक मामले में मुंबई के एक व्यवसायी की 2017 में हुई गिरफ्तारी को गैर-कानूनी करार दिया और महाराष्ट्र सरकार को उसे मुआवजे के तौर पर 5 लाख रुपये देने का आदेश दिया [बिपीन सतीश चंद्र अग्रवाल बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य]।
न्यायमूर्ति ए.एस. गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खाता की पीठ ने आज़ाद मैदान पुलिस को कड़ी फटकार लगाई, क्योंकि उसने एक निजी डेवलपर के साथ मिलीभगत करके बिपिन सतीश चंद्र अग्रवाल को जबरन वसूली के मामले में फंसाने का काम किया था।
अग्रवाल अपनी बुजुर्ग सास की ओर से 'पावर ऑफ अटॉर्नी' धारक के रूप में, 'सेठ एंड सोनल डेवलपर्स' के साथ एक सोसाइटी के पुनर्विकास (रीडेवलपमेंट) की शर्तों पर बातचीत करने गए थे। बातचीत के दौरान जब डेवलपर्स ने उन्हें एडवांस पेमेंट के तौर पर 2 लाख रुपये दिए, तो पुलिस ने तुरंत आकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया, हथकड़ी लगा दी और जबरन वसूली (extortion) का मामला दर्ज कर लिया।
इसके बाद उन्होंने अदालत में एक याचिका दायर की, जिसमें अपनी गिरफ्तारी को अवैध घोषित करने, मामले में शामिल पुलिसकर्मियों के खिलाफ विभागीय जांच कराने और राज्य से मुआवजे की मांग की। उन्होंने अदालत में खुद पेश होकर अपनी आपबीती सुनाई।
22 अक्टूबर के अपने फैसले में, बेंच ने उनके द्वारा बताई गई घटनाओं पर गहरा दुख और नाराजगी जताई।
अदालत ने कहा, "याचिकाकर्ता की बात विस्तार से सुनने के बाद, हमें यह सोचकर बहुत गहरा दुख हुआ कि उन्हें किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ा होगा।"
अदालत ने पाया कि सब-इंस्पेक्टर महेश लमखाड़े ने अपने आधिकारिक अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 384 के तहत जबरन वसूली के मामले में अग्रवाल को झूठा फंसाया था।
अदालत ने कहा, "यह साफ तौर पर पुलिस के साथ मिलीभगत करके डेवलपर द्वारा कानूनी प्रक्रिया के घोर दुरुपयोग का मामला है। यह एक ऐसा मामला है जहां एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर ने अपने आधिकारिक पद का फायदा उठाया और अपने नियंत्रण में मौजूद पुलिस तंत्र का इस्तेमाल डेवलपर के हितों को साधने के लिए किया। उन्होंने ऐसा इसलिए किया ताकि याचिकाकर्ता को नुकसान पहुंचाया जा सके, क्योंकि वह उनके दबाव में आकर उस सौदे को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुए थे।"
अदालत को इस मामले में कई गंभीर गड़बड़ियां मिलीं। गिरफ्तारी के बाद FIR दर्ज की गई थी, गिरफ्तारी मेमो (arrest memos) पर तारीखों को ओवरराइट (काट-छांट कर दोबारा लिखना) किया गया था, और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 41A (पुलिस के सामने पेश होने के लिए दिया जाने वाला नोटिस) के तहत नोटिस तब दिया गया, जब अग्रवाल को पहले ही हिरासत में लिया जा चुका था।
अग्रवाल का पिछला रिकॉर्ड एकदम साफ होने के बावजूद, पुलिस रिकॉर्ड में उन्हें गलत तरीके से एक 'आदतन अपराधी' (habitual offender) के रूप में दिखाया गया, जिसके फरार होने की संभावना बताई गई थी।
अदालत ने कहा, "पुलिस ने बिना किसी सबूत के और शिकायत की सच्चाई की जांच किए बिना ही, याचिकाकर्ता को एक गैंगस्टर, हिस्ट्री-शीटर या जबरन वसूली करने वाले के रूप में पेश करने की कोशिश की है।"
बेंच ने दोहराया कि कोई पुलिस अधिकारी केवल पूछताछ करने के लिए किसी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं कर सकता; उसे यह बताना होगा कि हिरासत में लेना क्यों जरूरी है।
अदालत ने 64वें मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट को भी फटकार लगाई, जिन्होंने बिना सोचे-समझे अग्रवाल को 26 दिनों के लिए पुलिस और न्यायिक हिरासत में भेज दिया था।
अदालत ने कहा, "64वीं अदालत के मजिस्ट्रेट भी याचिकाकर्ता को गलत तरीके से हिरासत में रखने के लिए जिम्मेदार हैं। रिमांड को जारी रखने के लिए कोई कारण नहीं बताया गया... हमें लगता है कि मजिस्ट्रेट ने अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया और मामले को बहुत हल्के में लिया।"
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को दो सप्ताह के भीतर मुआवजे के तौर पर 5 लाख रुपये देने का निर्देश दिया। साथ ही, यह भी कहा कि इस रकम की वसूली उन कर्मचारियों के वेतन से की जा सकती है जिनकी गलती थी।
बेंच ने PSI लमखाड़े के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने और उन्हें तुरंत सस्पेंड करने का भी निर्देश दिया।
अदालत ने यह फैसला हाई कोर्ट की प्रशासनिक समिति के सामने भी रखा है, ताकि उन मजिस्ट्रेटों के खिलाफ कार्रवाई की जा सके जिन्होंने बार-बार रिमांड के आदेश दिए। इन आदेशों की वजह से अग्रवाल को बिना किसी ठोस कारण या मामले की सही जांच के, ट्रायल शुरू होने से पहले ही लंबी हिरासत में रहना पड़ा।
राज्य की ओर से एडिशनल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर JP याग्निक पेश हुए।
महेश लमखाड़े की ओर से वकील अन्वय पवार और युवराज तड़के पेश हुए।
[आदेश पढ़ें]
और अधिक पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें
Bombay High Court awards ₹5 lakh compensation to man for illegal arrest in extortion case