

दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) ने गुरुवार को दिल्ली हाईकोर्ट को बताया कि सुप्रीम कोर्ट मेट्रो स्टेशन का हिंदी नाम बदलकर सर्वोच न्यायालय करने से एक बड़ा असर पड़ेगा, जिससे दिल्ली मेट्रो पर इसी तरह की राहत की मांग करने वाले कई केस आ सकते हैं और इसके चलते उस पर पैसे का बोझ पड़ेगा।
अभी, सुप्रीम कोर्ट मेट्रो स्टेशन को देवनागरी स्क्रिप्ट में भी सुप्रीम कोर्ट लिखा जाता है। उमेश शर्मा नाम के एक आदमी ने हाई कोर्ट में एक पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) पिटीशन फाइल की है ताकि मेट्रो स्टेशन का हिंदी नाम बदलकर सर्वोच्च न्यायालय किया जा सके।
चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की डिवीजन बेंच ने 11 फरवरी को पूछा था कि जब दिल्ली यूनिवर्सिटी मेट्रो स्टेशन का नाम विश्वविद्यालय है और सेंट्रल सेक्रेटेरिएट मेट्रो स्टेशन का हिंदी नाम केंद्रीय सचिवालय है, तो स्टेशन का नाम हिंदी में सर्वोच्च न्यायालय क्यों नहीं रखा जा सकता।
आज, मेट्रो की तरफ से पेश हुए वकील ने कहा कि दिल्ली यूनिवर्सिटी मेट्रो स्टेशन का नाम इंग्लिश में भी विश्वविद्यालय है और स्टेशनों का नाम बदलने में लगभग ₹40-45 लाख पब्लिक का पैसा खर्च हो सकता है।
वकील ने आगे कहा कि मेट्रो स्टेशनों का नाम रखना एक पॉलिसी डिसीजन है।
हालांकि, कोर्ट ने कहा कि कई बार नाम बदलने की आशंका ऑफिशियल लैंग्वेज एक्ट के आदेश को नज़रअंदाज़ करने का बचाव नहीं हो सकती।
बेंच ने कहा, “हमें एक्ट का सम्मान करना होगा। ये आपके पास एक्ट को लागू करने से मना करने के लिए मौजूद बचाव नहीं हैं।”
आखिरकार, कोर्ट ने DMRC को मामले पर अपना जवाब फाइल करने का आदेश दिया और मामले को 24 अप्रैल को आगे की सुनवाई के लिए लिस्ट कर दिया।
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