केरल हाईकोर्ट: कंज्यूमर कोर्ट ग्रेच्युटी से जुड़े विवादों पर फैसला नहीं कर सकते

कोर्ट ने बताया कि कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट, 2019 के तहत एम्प्लॉयर 'सर्विस प्रोवाइडर' नहीं है और न ही एम्प्लॉई 'कंज्यूमर' है।
Kerala High Court
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केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा है कि कोई कर्मचारी अपने एम्प्लॉयर से ग्रेच्युटी की बकाया रकम वसूलने के लिए कंज्यूमर डिस्प्यूट रिड्रेसल फोरम (उपभोक्ता विवाद निवारण मंच) का रुख नहीं कर सकता [तिरुर सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम मोइदीन एम]।

जस्टिस ज़ियाद रहमान AA ने बताया कि कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट, 2019 के तहत एम्प्लॉयर (नियोक्ता) 'सर्विस प्रोवाइडर' (सेवा प्रदाता) नहीं होता और न ही एम्प्लॉई (कर्मचारी) 'कंज्यूमर' (उपभोक्ता) होता है। एम्प्लॉयर और एम्प्लॉई के बीच का रिश्ता, कंज्यूमर और सर्विस प्रोवाइडर के रिश्ते से बिल्कुल अलग होता है। इसलिए, कोर्ट ने कहा कि कंज्यूमर कोर्ट को एम्प्लॉयर और एम्प्लॉई के बीच ग्रेच्युटी से जुड़े विवादों पर फैसला करने का अधिकार नहीं है।

फैसले में कहा गया, "जहां तक ​​एम्प्लॉयर की बात है, उसे सर्विस प्रोवाइडर नहीं माना जा सकता और एम्प्लॉई को ऐसा व्यक्ति नहीं माना जा सकता जिसने एम्प्लॉयर से सेवाएं ली हों।"

Justice Ziyad Rahman
Justice Ziyad Rahman

कोर्ट ने कहा कि नौकरी के रिश्ते में, कर्मचारी ही नियोक्ता (employer) को सैलरी के बदले सेवा देता है और नियोक्ता को उस सेवा से फ़ायदा होता है, न कि इसका उल्टा।

इसलिए, कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी की सेवा की शर्तों से जुड़े विवाद, जिसमें रिटायरमेंट पर मिलने वाले कानूनी फ़ायदे जैसे ग्रेच्युटी भी शामिल हैं, उन्हें कंज्यूमर विवाद नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने यह बात मल्लापुरम ज़िला कंज्यूमर विवाद निवारण आयोग (DCDRC) के एक आदेश को रद्द करते हुए कही। आयोग ने एक को-ऑपरेटिव बैंक को रिटायर हो चुके कर्मचारी को ग्रेच्युटी का बकाया पैसा, मुआवज़ा और कानूनी खर्च देने का निर्देश दिया था।

यह मामला तिरूर सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक के एक रिटायर कर्मचारी द्वारा DCDRC में दायर शिकायत से शुरू हुआ था, जिसमें उन्होंने अपनी बकाया ग्रेच्युटी के तौर पर ₹2.20 लाख के भुगतान की मांग की थी।

कर्मचारी 38 साल की सेवा के बाद मार्च 2016 में रिटायर हुए थे।

बैंक ने ग्रेच्युटी के तौर पर ₹10 लाख का भुगतान किया था, लेकिन कर्मचारी का दावा था कि 'पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972' के तहत उन्हें ₹12.20 लाख मिलने चाहिए थे।

उन्होंने बाकी बची रकम के लिए कंज्यूमर शिकायत दायर की।

कंज्यूमर कमीशन ने शिकायत को मंज़ूरी दी और साथ ही ₹25,000 का मुआवज़ा और ₹10,000 का कानूनी खर्च देने का आदेश दिया।

इसके बाद, बैंक ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने गौर किया कि 'जगमित्तर सैन भगत और अन्य बनाम डायरेक्टर, हेल्थ सर्विसेज़, हरियाणा और अन्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह तय किया था कि सेवा की शर्तों और रिटायरमेंट के फ़ायदों से जुड़े विवादों का फ़ैसला 'कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट' के तहत नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने आगे कहा कि 'कॉन्ट्रैक्ट ऑफ़ सर्विस' (सेवा का अनुबंध) और 'कॉन्ट्रैक्ट फ़ॉर सर्विस' (सेवा के लिए अनुबंध) के बीच फ़र्क होता है। कंज्यूमर कानून दूसरे वाले (कॉन्ट्रैक्ट फ़ॉर सर्विस) पर लागू होता है, जबकि नौकरी का रिश्ता पहले वाले (कॉन्ट्रैक्ट ऑफ़ सर्विस) के दायरे में आता है।

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि ग्रेच्युटी 'कॉन्ट्रैक्ट ऑफ़ सर्विस' से मिलने वाला एक सेवा फ़ायदा है, इसलिए कंज्यूमर कमीशन के पास इस मामले में शिकायत पर विचार करने का अधिकार क्षेत्र (jurisdiction) नहीं था।

बैंक की ओर से वकील अर्जुन राघवन और टीआर हरिकुमार पेश हुए। सेवानिवृत्त कर्मचारी की ओर से अधिवक्ता तारिक अनवर, केएस सलमा जेन्नाथ, के शमसुद्दीन, अरुण चंद, रसल जनार्दन ए और मोयिन केपी उपस्थित हुए।

[निर्णय पढ़ें]

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