

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें 20-21 अगस्त, 2026 की रात को BCI परिसर में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के खिलाफ विरोध कर रहे वकीलों पर हुए हमले की सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) से जांच कराने की मांग की गई थी [कुणाल यादव और अन्य बनाम मनन कुमार मिश्रा और अन्य]।
जस्टिस गिरीश कठपालिया ने कहा कि याचिका सुनवाई के लायक नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता वकीलों को सीधे कोर्ट के रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने के बजाय, पहले संबंधित अधिकार क्षेत्र वाले डिप्टी कमिश्नर ऑफ़ पुलिस (DCP) और उसके बाद संबंधित मजिस्ट्रेट से संपर्क करना चाहिए था।
कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की इस दलील पर "सम्मानपूर्वक असहमति" भी जताई कि चूंकि मिश्रा सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के मौजूदा सांसद (MP) हैं, इसलिए दिल्ली पुलिस निष्पक्ष रूप से कार्रवाई नहीं करेगी, जबकि CBI करेगी।
कोर्ट ने कहा, "इस आशंका को पुष्ट करने के लिए कोई आधार पेश नहीं किया गया है। किसी ठोस आधार के बिना, पूरी दिल्ली पुलिस फ़ोर्स की छवि को इस तरह खराब करना उचित नहीं है, खासकर तब जब याचिकाकर्ताओं का अपना मामला ही किसी संज्ञेय अपराध (cognizable offence) को साबित नहीं करता है। इसके अलावा, आशंका वाली दलील भी इसलिए खारिज होनी चाहिए क्योंकि CBI - जिसके खिलाफ़ केस दर्ज करने और जांच करने का आदेश (mandamus) मांगा गया है - वह भी एक सरकारी संस्था ही है।"
इसमें आगे कहा गया,
"किसी भी सरकारी संस्था को ऐसे आम, बड़े और बेबुनियाद आरोपों से बदनाम करने की कोशिश से बचना चाहिए। क्योंकि, इससे आम आदमी के मन में पूरे सिस्टम के प्रति नकारात्मक सोच और अविश्वास पैदा होता है।"
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, 20-21 अगस्त को BCI ऑफिस के बाहर करीब 10 वकील विरोध-प्रदर्शन कर रहे थे, तभी रात करीब 1:15 बजे 25-30 लोग (जिनमें से कुछ वकीलों की पोशाक में थे) परिसर में घुस आए और वकीलों के साथ मारपीट की। उनका दावा है कि यह घटना पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में हुई।
यह विरोध-प्रदर्शन BCI के उस आदेश को लेकर हुए विवाद के बाद शुरू हुआ था जिसमें NALSAR यूनिवर्सिटी के 2026 में पास होने वाले बैच के एनरोलमेंट पर रोक लगा दी गई थी; बाद में आलोचना के चलते इस आदेश को वापस ले लिया गया था।
याचिकाकर्ताओं ने CBI को FIR दर्ज करने और घटना की जांच करने का निर्देश देने की मांग की। उन्होंने तर्क दिया कि दिल्ली पुलिस पर निष्पक्ष कार्रवाई करने के लिए भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि मिश्रा सत्ताधारी पार्टी के मौजूदा सांसद थे।
हालांकि, कोर्ट ने माना कि रिकॉर्ड में मौजूद शिकायतों से कोई संज्ञेय अपराध (cognizable offence) नहीं बनता है। कोर्ट ने कहा कि जिस व्यवहार का आरोप लगाया गया है—जिसमें हमलावरों में से कोई भी हथियारबंद नहीं था—वह ज़्यादा से ज़्यादा 'चोट पहुंचाने' (causing hurt) का अपराध बनता है, जो एक गैर-संज्ञेय अपराध (non-cognizable offence) है और जिसकी सुनवाई केवल मजिस्ट्रेट ही कर सकते हैं।
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला, "ऊपर बताई गई बातों को देखते हुए, याचिका को सुनवाई योग्य न मानते हुए खारिज किया जाता है।"
याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील प्रशांत भूषण, अनुराग तिवारी और अनुष्का सिंह पेश हुए।
राज्य की ओर से वकील अमोल सिन्हा पेश हुए।
BCI की ओर से वकील सिमरन कुमारी, विराट राज मिश्रा और पूजा पेश हुईं।
दिल्ली पुलिस की ओर से सीनियर पैनल काउंसिल शोमेंदु मुखर्जी, सरकारी वकील अभिषेक बत्रा और वकील पुनीत धवन, मेघा शर्मा, अनिरुद्ध घोष और काबेरी शर्मा पेश हुए।
[आदेश पढ़ें]
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