दिल्ली विरोध-प्रदर्शन: सुप्रीम कोर्ट ने BNSS की धारा 163 को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया

हालाँकि,अदालत अलग-अलग prohibitory orders को दी चुनौती और BNSS धारा 172 को दी गई चुनौती की जांच करेगी;यह धारा पुलिस को उन लोगो को हिरासत में लेने का अधिकार देती है जो पुलिस के कामकाज मे बाधा डालते है
Delhi Police
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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। इस धारा के तहत, कार्यकारी मजिस्ट्रेटों को यह अधिकार है कि वे खतरा टालने या शांति बनाए रखने के लिए सार्वजनिक सभाओं पर रोक लगाने वाले आदेश जारी कर सकें।

हालांकि, कोर्ट ने हाल ही में दिल्ली में हुए विरोध-प्रदर्शनों के संबंध में, उक्त प्रावधान के तहत जारी किए गए विभिन्न निषेधाज्ञा आदेशों की समीक्षा करने पर सहमति जताई है।

कोर्ट BNSS की धारा 172 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर भी विचार करेगा। इस धारा के तहत, लोगों के लिए पुलिस अधिकारियों द्वारा जारी किए गए कानूनी निर्देशों का पालन करना अनिवार्य है। साथ ही, यह धारा पुलिस को उन लोगों को हिरासत में लेने का अधिकार देती है जो इन निर्देशों का उल्लंघन करते हैं या पुलिस के कामकाज में बाधा डालते हैं।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की एक पीठ ने कल इस प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस आयुक्त और अन्य संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है।

CJI Surya Kant and Justice Joymalya Bagchi
CJI Surya Kant and Justice Joymalya Bagchi

सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दिल्ली में हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान लगाई गई पाबंदियों के संदर्भ में, BNSS के प्रावधानों के तहत शक्तियों के इस्तेमाल पर सवाल उठाए थे।

BNSS की धारा 163 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी।

BNSS की धारा 163 ने पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 144 की जगह ली है। यह धारा मजिस्ट्रेटों को ऐसे तत्काल आदेश जारी करने का अधिकार देती है, जिनका उद्देश्य मानव जीवन के लिए खतरे, सार्वजनिक सुरक्षा, सार्वजनिक शांति में खलल या अन्य विशिष्ट खतरों को रोकना होता है। ऐसे आदेशों के जरिए लोगों के इकट्ठा होने, जुलूस निकालने और अन्य गतिविधियों पर रोक लगाई जा सकती है।

हालांकि, कोर्ट ने कहा कि वह BNSS की धारा 163 की वैधता पर विचार नहीं करेगा, क्योंकि वह पहले ही CrPC के इसी तरह के प्रावधान (धारा 144) को सही ठहरा चुका है।

कोर्ट ने कहा, "BNSS की धारा 163 की वैधता को लेकर मौखिक दलीलें दी गईं। लेकिन, चूंकि CrPC की धारा 144 (जो इसके समान ही है) को 'बाबूलाल पराटे बनाम महाराष्ट्र राज्य' (1961) 3 SCR 423 मामले में सही ठहराया जा चुका है, इसलिए हम इस पर दोबारा विचार करने के इच्छुक नहीं हैं।"

इसके बाद, कोर्ट ने BNSS की धारा 172 को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया। यह याचिका समृद्धि दास नाम की एक व्यक्ति ने दायर की है।

मामले की सुनवाई 19 नवंबर तक टालते हुए कोर्ट ने कहा, "केवल BNSS की धारा 172 की संवैधानिक वैधता के सीमित मुद्दे पर नोटिस जारी किया जाए, जिसका जवाब 19.11.2026 तक देना होगा।"

एक संबंधित मामले में, कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह दिल्ली में BNSS की धारा 163 के तहत जारी किए गए निषेधाज्ञा आदेशों (prohibitory orders) को रिकॉर्ड पर रखे। BNSS की धारा 163 के तहत जारी विशिष्ट आदेशों को चुनौती देने वाली इन याचिकाओं पर भी अब 19 नवंबर को सुनवाई होगी।

कोर्ट उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था, जो हाल ही में दिल्ली में हुए विरोध-प्रदर्शनों से जुड़ी हैं। ये विरोध-प्रदर्शन मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ किए गए थे। इन याचिकाओं में पुलिस की कथित ज्यादतियों, लोगों की आवाजाही पर पाबंदियों और पुलिस की शक्तियों के इस्तेमाल से जुड़े कई मुद्दे उठाए गए हैं।

कल जारी आदेशों में, कोर्ट ने 'SIR' (एसआईआर) प्रक्रिया से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के लिए 27 अक्टूबर की तारीख तय की है। इनमें कांग्रेस नेता राहुल गांधी और अन्य विपक्षी राजनीतिक नेताओं द्वारा दायर की गई याचिकाएं भी शामिल हैं।

दिल्ली में हुए विरोध-प्रदर्शनों, पुलिस की कार्रवाई, जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन स्थल के रूप में डीनोटिफाई (अधिसूचना रद्द) करने और इससे जुड़े अन्य मुद्दों पर दायर याचिकाओं के एक समूह की सुनवाई 3 नवंबर को होगी।

दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों को कवर करने वाली महिला पत्रकारों के यौन उत्पीड़न से जुड़ी एक याचिका पर 5 नवंबर को सुनवाई होगी।

बेंच ने नोडल वकील को यह भी निर्देश दिया है कि वे 28 अक्टूबर तक एक जैसे (ओवरलैप करने वाले) मुद्दों वाली याचिकाओं को अलग-अलग श्रेणियों में बांट दें, ताकि हर मामले में अलग-अलग और विस्तृत जवाब (काउंटर-एफिडेविट) दाखिल किए जा सकें।

[आदेश पढ़ें]

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Delhi protests: Supreme Court declines to entertain challenge to Section 163 BNSS

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