

बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने हाल ही में एक आरोपी की अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज कर दी। इस आरोपी के बैंक खाते में ₹7.17 करोड़ के 'डिजिटल अरेस्ट' साइबर फ्रॉड मामले में ₹4.03 करोड़ जमा किए गए थे [अनुज सक्सेना बनाम राज्य व अन्य]।
जस्टिस आरएम जोशी ने कहा कि ऐसे साइबर अपराधों की जांच करने और असली दोषियों की पहचान करने के लिए आरोपी से हिरासत में पूछताछ ज़रूरी है।
यह मामला महाराष्ट्र में दर्ज एक FIR से जुड़ा है, जिसमें एक डॉक्टर को 'डिजिटल अरेस्ट' स्कैम के तहत ₹7.17 करोड़ देने के लिए मजबूर किया गया था।
जांच में पता चला कि ठगी गई रकम में से ₹4.03 करोड़ सीधे आरोपी अनुज सक्सेना के खाते में जमा किए गए और बाद में निकाल लिए गए।
सक्सेना ने दावा किया कि वह एक चैरिटेबल संस्था चलाता है और उसने ₹20 लाख का वादा किया गया डोनेशन पाने के लिए अपनी बैंक डिटेल्स शेयर की थीं। उसने यह भी आरोप लगाया कि उसका फ़ोन हैक हो गया था।
हालांकि, कोर्ट को उसके हैकिंग वाले बचाव का समर्थन करने वाला कोई सबूत नहीं मिला।
जस्टिस जोशी ने सक्सेना की अग्रिम ज़मानत (anticipatory bail) की अर्ज़ी खारिज करते हुए 'डिजिटल अरेस्ट' धोखाधड़ी की गंभीरता पर ज़ोर दिया।
कोर्ट ने कहा, "यह अपराध गंभीर प्रकृति का है। कहने की ज़रूरत नहीं है कि 'डिजिटल अरेस्ट' के ज़रिए ठगी का शिकार होने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है।"
जज ने अकाउंट होल्डर्स की बिना पुष्टि वाली सफ़ाई को स्वीकार करने के खिलाफ़ चेतावनी दी।
बेंच ने कहा, "जिन लोगों के खातों में अपराध का पैसा जमा होता है, उनकी ओर से कोई भी बेतुकी या बाद में गढ़ी गई सफ़ाई ऐसे अपराधों को बढ़ावा देने के बराबर होगी।"
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ऐसे मामलों में अपराध की जांच करने और दोषियों व असली मुजरिमों का पता लगाने के लिए कस्टोडियल पूछताछ (हिरासत में पूछताछ) बेहद ज़रूरी है।
सक्सेना की ओर से वकील पीआर दुबे पेश हुए।
राज्य की ओर से एडिशनल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर आरपी गौर पेश हुए।
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Digital arrest scam: Bombay High Court denies bail to accused whose bank account received ₹4 crore