

दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार के अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे रामलीला और इसी तरह के सांस्कृतिक या धार्मिक कार्यक्रमों के लिए सार्वजनिक मैदान आवंटित करने के लिए हर साल व्यापक दिशानिर्देश तैयार करें [रे ऑफ़ न्यू बिगिनिंग फ़ाउंडेशन बनाम दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड और अन्य]।
जस्टिस अमित महाजन ने 8 अक्टूबर को यह आदेश दिया कि ऐसी जगहों के अलॉटमेंट के लिए "पहले आओ, पहले पाओ" (first come, first serve) की पॉलिसी संवैधानिक रूप से अनुचित है और इससे आवेदकों के लिए असमान अवसर पैदा हो सकते हैं।
कोर्ट ने तर्क दिया कि पहली नज़र में "पहले आओ, पहले पाओ" का नियम निष्पक्ष लग सकता है, लेकिन यह जानकारी पाने की एक असमान होड़ पैदा करता है; क्योंकि इसमें दूसरे प्रतिस्पर्धी आवेदकों को पता चलने से पहले ही किसी सार्वजनिक जगह की उपलब्धता का पता लगाने के लिए बढ़ावा मिलता है।
कोर्ट ने कहा, "इससे एक संरचनात्मक दुविधा पैदा होती है, यानी प्रशासनिक जानकारी तक विशेष पहुंच रखने वाला व्यक्ति ऐसा लाभ उठा सकता है जो दूसरों को नहीं मिल पाता।"
इसलिए, कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे पहले तय कार्यक्रम से कम से कम 90 दिन पहले सालाना साइट-अलॉटमेंट (जगह आवंटन) के नोटिस जारी करें। कोर्ट ने कहा कि नोटिस में उपलब्ध मैदान, आवेदन की समय-सीमा, पात्रता की शर्तें, मूल्यांकन के मानदंड और शिकायत निवारण की प्रक्रिया के बारे में जानकारी होनी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि जब एक ही जगह के लिए कई योग्य आवेदक हों, तो अधिकारियों को पहले से तय और प्रकाशित स्कोरिंग मैट्रिक्स या अन्य प्रकाशित मानदंडों का इस्तेमाल करके तुलनात्मक मूल्यांकन करना चाहिए।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुराने आयोजकों को उनके नियमों के पालन के रिकॉर्ड के आधार पर थोड़ी प्राथमिकता मिल सकती है, लेकिन उन्हें जगह आवंटन का स्वतः अधिकार नहीं मिल सकता। अगर मुकाबले में दूसरे योग्य आवेदक हों, तो ऐसी प्राथमिकता लगातार दो साल से ज़्यादा नहीं दी जानी चाहिए।
कोर्ट ने आदेश दिया, "सालाना समय-सारणी इस तरह बनाई जानी चाहिए कि कार्यक्रम शुरू होने से काफी पहले अंतिम आवंटन और सामान्य शिकायत प्रक्रिया पूरी हो जाए।"
यह आदेश 'रेज ऑफ न्यू बिगिनिंग फाउंडेशन' की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया। फाउंडेशन ने दिल्ली के एक मैदान में रामलीला आयोजित करने के अपने आवेदन को खारिज किए जाने को चुनौती दी थी।
फाउंडेशन ने 2023 और 2024 में वहां कार्यक्रम आयोजित किया था। उसका कहना था कि दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) की नीति में पुराने आयोजकों को प्राथमिकता दी जाती है। हालांकि, दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (DUSIB) ने 'पहले आओ-पहले पाओ' की नीति का हवाला देते हुए वह मैदान किसी दूसरे संगठन को आवंटित कर दिया, जिसने पहले आवेदन किया था।
मामले पर विचार करने के बाद, कोर्ट ने 'पहले आओ-पहले पाओ' की नीति को गलत माना। हालांकि, कोर्ट ने मौजूदा आवंटन को रद्द करने या 2026 के कार्यक्रमों के लिए मैदान याचिकाकर्ता को सौंपने से इनकार कर दिया, क्योंकि कार्यक्रम शुरू होने वाले थे।
याचिकाकर्ता की ओर से वकील विकास त्रिपाठी, मांडवी पांडे, चंदन, कुणाल शाही, हेमा कुमारी, अविनाश मिश्रा, रौशन कुमार, शिवांश दुबे, शिवानी, प्रथम सिंह, आदित्य वर्मा और अभिषेक कुमार पेश हुए।
DUSIB का प्रतिनिधित्व वकील अनुज चतुर्वेदी, यशिता जैन और अशोक कुमार भास्कर ने किया।
DDA का प्रतिनिधित्व स्टैंडिंग काउंसिल मनिका त्रिपाठी ने किया।
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First come first serve policy to allot grounds for Ramleela unfair: Delhi High Court