फुल कोर्ट की मीटिंग्स केवल दिखावे के लिए आयोजित होती हैं; पिछले 10 वर्षों में सिर्फ 16 मीटिंग्स हुईं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

जस्टिस दिवाकर ने कहा कि फुल कोर्ट की कार्यवाही में अलग-अलग जजों की सहमति या असहमति दर्ज नहीं की जाती है।
Allahabad High Court
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इलाहाबाद हाईकोर्ट के कामकाज के तरीके पर एक चौंकाने वाली टिप्पणी करते हुए, मौजूदा जस्टिस विनोद दिवाकर ने कहा है कि हाई कोर्ट की 'फुल कोर्ट' मीटिंग्स कई बार ठीक उसी तरह पहले से तय या 'स्टेज-मैनेज्ड' होती हैं, जैसे सरकार किसी विश्वास मत (confidence vote) के दौरान 'व्हिप' जारी करके बहुमत हासिल करती है।

जस्टिस दिवाकर ने कहा कि 'फुल कोर्ट' (सभी जजों की बैठक) की कार्यवाही में अलग-अलग जजों की सहमति या असहमति को रिकॉर्ड नहीं किया जाता है।

कोर्ट ने कहा, "ऐसा माहौल बनाया गया कि इस कोर्ट की पिछली दो 'फुल कोर्ट' बैठकें पहले से तय योजना के तहत (stage-managed) आयोजित की गई थीं, जैसे सरकार अविश्वास प्रस्ताव के दौरान अपने सदस्यों पर दबाव बनाती है। यह एक जज के पद की गरिमा का अपमान है। जब कोई सामूहिक संस्था अपने सदस्यों की राय दर्ज किए बिना कोई फैसला लेती है, तो उस विचार-विमर्श का कोई सबूत रिकॉर्ड पर नहीं मिलता, जिसके लिए वह मंच बनाया गया था।"

कोर्ट ने यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश की ज़िला अदालतों में "प्रक्रियात्मक ठहराव" (procedural stagnation) के पैटर्न पर विचार करते हुए की। ये टिप्पणियां उन याचिकाओं पर दिए गए फैसले का हिस्सा हैं जिनमें ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही के निपटारे में अत्यधिक देरी का मुद्दा उठाया गया था।

जस्टिस दिवाकर ने कहा कि हाई कोर्ट के स्तर पर इस समस्या पर कोई प्रभावी ध्यान नहीं दिया गया है।

उन्होंने बताया कि पिछले दस वर्षों में, चीफ जस्टिस द्वारा केवल 16 'फुल कोर्ट' बैठकें बुलाई गई हैं।

बेंच ने कहा, "हाई कोर्ट के नियमों के अनुसार, सामान्य नीतिगत मामलों और कोर्ट की शक्तियों व दर्जे को प्रभावित करने वाले मामलों के साथ-साथ सरकार को सौंपी जाने वाली न्याय प्रशासन की सामान्य वार्षिक रिपोर्ट पर विचार-विमर्श के लिए कम से कम हर तीन महीने में 'फुल कोर्ट' के सामने ये मामले रखे जाने चाहिए। हालांकि, पिछले दस वर्षों में कोर्ट की शक्तियों और दर्जे को प्रभावित करने वाला कोई भी सामान्य नीतिगत मामला कभी भी 'फुल कोर्ट' की बैठकों के सामने नहीं रखा गया है।"

जस्टिस दिवाकर ने हाई कोर्ट में चीफ जस्टिस के कामकाज पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक से, न्याय प्रशासन पर वार्षिक रिपोर्ट न तो 'फुल कोर्ट' के सामने रखी गई है और न ही सरकार को भेजी गई है, जैसा कि नियमों के तहत ज़रूरी है।

जज ने कहा, "केवल यही तथ्य हाई कोर्ट में कामकाज, कार्यप्रणाली और प्रशासनिक संस्कृति की मौजूदा स्थिति को बताने के लिए काफी है।"

कोर्ट ने आगे कहा कि विभिन्न महत्वपूर्ण समितियों या प्रशासनिक पक्ष पर चीफ जस्टिस द्वारा गठित किसी भी समिति की कार्यवाही का विवरण (minutes) कभी भी 'फुल कोर्ट' को नहीं बताया गया है।

जज ने कहा कि इससे ऐसा लगता है कि उनका कामकाज खुद हाई कोर्ट से स्वतंत्र है।

कोर्ट ने कहा, "नतीजतन, हाई कोर्ट में ऐसे मुद्दों को उठाने के लिए कोई संस्थागत मंच नहीं है, सिवाय इसके कि उन्हें न्यायिक आदेशों के ज़रिए उठाया जाए। वरना, जजों को ऐसे माहौल में निराशाजनक पेशेवर ज़िंदगी बितानी पड़ेगी जो न तो न्यायिक कामकाज के लिए अनुकूल है और न ही इस महान संस्थान की गरिमा के अनुरूप है।"

कोर्ट ने कहा कि चीफ जस्टिस और कमेटियों को मिले इस अनियंत्रित अधिकार के कारण ज़िला न्यायपालिका में स्टाफ़ की भारी कमी हो गई है; यहाँ 28,552 स्वीकृत पदों के मुकाबले 7,834 पद खाली पड़े हैं।

राज्य में अभी 4,625 स्वीकृत पदों के मुकाबले सिर्फ़ 2,603 ​​न्यायिक अधिकारी हैं। इनमें से 900 न्यायिक पद सितंबर में मंज़ूर किए गए थे।

कोर्ट ने कहा, "सितंबर 2026 तक, हाई कोर्ट रजिस्ट्री और ज़िला न्यायपालिका में कुल 10,352 पद खाली हैं, जिनमें न्यायिक अधिकारी कैडर में 1,122, ज़िला न्यायपालिका स्टाफ़ में 7,834 और हाई कोर्ट रजिस्ट्री में 1,396 पद शामिल हैं।"

कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि दिसंबर 2023 में विज्ञापित उच्च न्यायिक सेवा के 83 पदों के लिए लिखित परीक्षा अगस्त 2026 में आयोजित की गई थी, लेकिन नतीजे का अभी भी इंतज़ार है। सितंबर 2022 से उच्च न्यायिक सेवा में कोई नियुक्ति नहीं हुई है।

फ़ैसले में कहा गया है, "सिविल जज (जूनियर डिवीज़न) के 303 पदों के लिए आखिरी नोटिफ़िकेशन 10.12.2022 को जारी किया गया था और नतीजा 30.08.2023 को घोषित किया गया था। 30.08.2023 के बाद से सिविल जज (जूनियर डिवीज़न) के लिए कोई भर्ती नहीं हुई है।"

जस्टिस दिवाकर ने कहा कि यह स्थिति हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया के बिल्कुल उलट है, जिसे संस्थागत प्राथमिकता दी जाती है। जज ने कहा कि ये बातें दिखाती हैं कि प्रशासनिक अधिकार के इस्तेमाल को नियंत्रित करने वाले किसी व्यवस्थित ढांचे के न होने के गंभीर नतीजे होते हैं; इनमें हाई कोर्ट और ज़िला अदालतों में न्याय-प्रशासन पर पड़ने वाला असर भी शामिल है।

अदालत ने निर्देश दिया कि हाई कोर्ट के कामकाज पर टिप्पणी करने वाले उसके फ़ैसले को चीफ़ जस्टिस के सामने रखा जाए, ताकि वे इसकी समीक्षा कर सकें और आगे जो भी कदम उन्हें सही और उचित लगें, वे उठा सकें।

इसके अलावा, अदालत ने निर्देश दिया कि फ़ैसले की एक कॉपी केंद्रीय कानून मंत्रालय के न्याय विभाग के सचिव को भी भेजी जाए, जो इसे विचार के लिए कानून और न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के सामने रख सकते हैं।

अदालत ने कहा कि उसके द्वारा उठाए गए मुद्दों के नोट की एक कॉपी भारत सरकार के कैबिनेट सचिव को भी भेजी जा सकती है।

[फ़ैसला पढ़ें]

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Full court meetings are stage-managed; only 16 meetings in last 10 years: Allahabad High Court

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