अगर बात अखिल भारतीय प्रभाव की है, तो हम कैसे फैसला कर सकते है? झारखंड एचसी ने NLAT 2020 के चुनौती वाले आदेश को सुरक्षित रखा

"क्या होगा यदि प्रत्येक राज्य के छात्र संबंधित उच्च न्यायालयों के समक्ष याचिका दायर करते हैं? क्या होगा यदि एक उच्च न्यायालय परीक्षा को स्थगित कर देता है और दूसरा उच्च न्यायालय इसे खारिज करता है?"
अगर बात अखिल भारतीय प्रभाव की है, तो हम कैसे फैसला कर सकते है? झारखंड एचसी ने NLAT 2020 के चुनौती वाले आदेश को सुरक्षित रखा
NLSIU

झारखंड उच्च न्यायालय ने अपनी अलग परीक्षा, नेशनल लॉ एडमिशन टेस्ट (एनएलएटी) आयोजित करने के लिए नेशनल लॉ स्कूल ऑफ़ इंडिया यूनिवर्सिटी (एनएलएसआईयू) बैंगलोर के कदम को चुनौती देने वाली याचिका में आज अपना आदेश सुरक्षित रख लिया।

इस मामले की सुनवाई आज जस्टिस राजेश शंकर की एकल पीठ ने की।

शुरुआत में, न्यायमूर्ति शंकर ने इस बात पर ज़ोर दिया कि क्या झारखंड उच्च न्यायालय द्वारा इस मामले पर विचार किया जाना चाहिए,

"झारखंड उच्च न्यायालय के समक्ष याचिका क्यों दायर की गयी? क्या होगा यदि प्रत्येक राज्य के छात्र संबंधित उच्च न्यायालयों के समक्ष याचिका दायर करते हैं? क्या होगा यदि एक उच्च न्यायालय परीक्षा को स्थगित करता है और दूसरा उच्च न्यायालय इसे खारिज करता है?"

उन्होने आगे कहा,

"एनएलएसआईयू और कंसोर्टियम कार्यालय कर्नाटक में स्थित हैं। झारखंड उच्च न्यायालय इस मामले की सुनवाई कैसे कर सकता है? ... यदि किसी मामले में अखिल भारतीय प्रभाव है, तो हम इस पर कैसे फैसला कर सकते हैं?"

इस बिंदु पर, अदालत को सूचित किया गया कि एनएलएटी को चुनौती देने वाली याचिकाएँ उच्चतम न्यायालय और मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के समक्ष भी लंबित थीं। एनएलएसआईयू की ओर से उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता साजन पूवय्या ने अदालत को बताया कि इन याचिकायों में से किसी में भी नोटिस जारी नहीं किए गए हैं।

"ऐसा नहीं है कि झारखंड उच्च न्यायालय के पास अधिकार क्षेत्र नहीं है, लेकिन यह न्यायालय गैर संयोजकों के आधार पर अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग नहीं कर सकता है।"

जस्टिस शंकर ने जवाब दिया,

"फोरम गैर संयोजक इस मामले में अपनी क्रियाशीलता दिखाएंगे... यह एक कठिन स्थिति है जब विभिन्न उच्च न्यायालयों में याचिका दायर की जाती है। ”

याचिकाकर्ता की ओर से उपस्थित हुए अधिवक्ता शुभम गौतम ने बताया कि यह याचिका पहली बार झारखंड उच्च न्यायालय में दायर की गई थी।

"यह देश में दायर पहली रिट याचिका है", उन्होंने कहा।

उन्होंने चिंता जताई,

“क्या परीक्षा होने से पहले सुप्रीम कोर्ट और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में इन मामलों को सूचीबद्ध नहीं किया गया है? यह अधिसूचना सीएलएटी परीक्षा पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का घोर उल्लंघन है।"

उन्होंने आगे तर्क दिया,

"जबकि एनएलएसआईयू ने छात्रों को परीक्षण केंद्रों में उपस्थित होने के लिए विकल्प प्रदान किया है, इसने अपनी अधिसूचना में कहा है कि एनएलआईएसयू तकनीकी दोष, इंटरनेट डिस्कनेक्शन आदि के लिए जिम्मेदार नहीं होगा। झारखंड में ऐसा कोई केंद्र नहीं है।”

हालांकि, बाद में यह बताया गया कि एनएलएसआईयू ने धनबाद, झारखंड में एक केंद्र की व्यवस्था की थी।

पूवय्या ने कहा कि एनएलएसआईयू ने अब इंटरनेट आवश्यकताओं को घटाकर 512 केबीपीएस इंटरनेट स्पीड कर दिया है। इसके अलावा, उन्होंने कहा कि एनएलएसआईयू ने उन छात्रों की जरूरतों को पूरा करने के लिए आईडीआईए के साथ विशेष व्यवस्था की है जिनके पास कंप्यूटर / इंटरनेट तक पहुंच नहीं है।

पूवय्या ने आगे अदालत को सूचित किया,

"हमने पैटर्न बदले बिना प्रश्नों की संख्या कम कर दी है। हम कानून की योग्यता पर छात्रों का परीक्षण नहीं कर रहे हैं ... 30,298 छात्रों ने पहले ही पंजीकरण कर लिया है। केवल कुछ ही छात्र एनएलएटी के खिलाफ शिकायतें उठा रहे हैं।"

न्यायालय ने अंततः व्यक्त किया कि वह यह जांचना चाहता है कि झारखंड के छात्रों को परीक्षा लिखने में कोई कठिनाई होगी या नहीं। इस पर, पूवय्या ने जवाब दिया,

"छात्रों को कठिनाइयों का सामना करने की स्थिति में व्यवस्था की जाएगी। यहां तक कि वकील उन छात्रों को अपने कार्यालय की पेशकश कर रहे हैं जो परीक्षा मे बैठना चाहते हैं।"

न्यायमूर्ति शंकर ने यह भी जानना चाहा कि क्या एनएलएटी का संचालन केवल इस वर्ष के लिए किया जाएगा। पूवय्या की प्रतिक्रिया है कि इस वर्ष एक अलग परीक्षा आयोजित करने का निर्णय लिया गया है। एनएलएसआईयू की कार्यकारी परिषद इस मुद्दे पर फैसला करने के लिए बाद में बैठक करेगी।

पक्षकारों को सुनने के बाद, न्यायालय ने कल मामले को पोस्ट करते ते हुए कहा,

" परीक्षा के अखिल भारतीय प्रभाव को देखते हुए, मुख्य मुद्दा उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का है, ..."

याचिका में प्रार्थना कि गयी कि एनएलएसआईयू द्वारा जारी अधिसूचना को रद्द किया जावे।

याचिकाकर्ताओं द्वारा शामिल किए गए तथ्य निम्नलिखित हैं:

  • एनएलएसआईयू का 2020-21 के लिए अपने 5-वर्षीय बीए एलएलबी कार्यक्रम में प्रवेश के लिए एक अलग परीक्षा करने का निर्णय अवैध और मनमाना है;

  • एनएलएसआईयू का 3 सितंबर को जारी किया गया नोटिफिकेशन, राष्ट्रीय कानून विश्वविद्यालयों के कंसोर्टियम के उप-कानूनों के खंड 15.7 का उल्लंघन है;

  • क्लैट कंसोर्टियम से निकाले बिना एक अलग परीक्षा आयोजित करने का एनएलएसआईयू का निर्णय अवैध, मनमाना और सनकी है;

  • राष्ट्रीय कानून विश्वविद्यालयों के सीएलएटी कंसोर्टियम का स्थायी सदस्य होने के नाते एनएलएसआईयू का एक अलग परीक्षा आयोजित करने का निर्णय गैरकानूनी और मनमाना है;

  • कॉमन लॉ एडमिशन टेस्ट (सीएलएटी) जिसमें एक न्यायपूर्ण और निष्पक्ष तरीके से परीक्षा होती है, से एनएलएसआईयू की वापसी याचिकाकर्ताओं के अधिकारों का उल्लंघन करती है;

  • सीएलएटी के लिए पंजीकरण फॉर्म भरने के बाद एनएलएसआईयू का एक अलग प्रवेश परीक्षा आयोजित करने का निर्णय वचन विबंधन के सिद्धांत का उल्लंघन है;

  • परीक्षा की घोषित तिथि से 10 दिन पहले NLSIU द्वारा परीक्षा की एक नई तारीख और एक नया परीक्षा पैटर्न घोषित करना गैरकानूनी, मनमाना और सनकी है

  • निष्पक्ष और न्यायपूर्ण परीक्षा के संचालन के लिए एनएलएसआईयू की कार्रवाई सर्वोच्च न्यायालय की स्थापित मिसाल के खिलाफ है

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If matter has pan-India ramifications, how can we adjudicate it? Jharkhand HC reserves orders in challenge to NLAT 2020

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