

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद को तलब किया है। यह कार्रवाई हिरासत में हुई मौत के मामलों में मुआवज़े के भुगतान के लिए गाइडलाइंस बनाने के आदेश का पालन न करने के कारण की गई है।
जस्टिस सौरभ लवानिया ने कहा कि प्रसाद 'कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट्स एक्ट, 1971' की धारा 12 के तहत सज़ा के हकदार हैं। इसलिए, कोर्ट ने उन्हें 31 जुलाई को आगे की कार्यवाही (जिसमें आरोप तय करना भी शामिल है) के लिए कोर्ट में मौजूद रहने का निर्देश दिया।
24 जुलाई को जारी आदेश में कोर्ट ने कहा, "ऊपर बताई गई बातों को ध्यान में रखते हुए, संबंधित अधिकारी को निर्देश दिया जाता है कि वे 31.07.2026 को इस कोर्ट के सामने पेश हों।"
कोर्ट कोर्ट की अवमानना से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि राज्य ने 20 फरवरी को डिवीज़न बेंच के आदेश का पालन नहीं किया है।
यह याचिका एक महिला ने दायर की थी, जिसके नाबालिग बेटे की मौत 20 फरवरी, 2024 को ज़िला जेल में हो गई थी। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि राज्य ने उसे हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक़ ₹10 लाख का मुआवज़ा अभी तक नहीं दिया है।
नाबालिग पर 2016 के एक मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत बलात्कार के आरोप थे। फरवरी 2022 में ज़मानत मिलने से पहले उसने लगभग तीन साल और दस महीने जेल में बिताए थे।
हालांकि, ट्रायल कोर्ट में पेश न हो पाने के कारण उसे 7 फरवरी, 2024 को गिरफ़्तार कर लिया गया। 20 फरवरी, 2024 को उसने जेल के अंदर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।
आरोप लगाया गया था कि जेल में पुलिस ने नाबालिग को प्रताड़ित किया क्योंकि वह ₹4,500 के मासिक भुगतान सहित अवैध मांगों को पूरा नहीं कर पाया था। राज्य ने इन आरोपों से इनकार किया और तर्क दिया कि उसकी मौत में अधिकारियों की कोई भूमिका नहीं थी।
हालांकि, कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि जेल के अंदर होने वाली अप्राकृतिक मौतों के लिए राज्य पूरी तरह से ज़िम्मेदार है। कोर्ट ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि भारतीय क़ानून में ग़ैर-क़ानूनी हिरासत या हिरासत में मौत के लिए मुआवज़ा देने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
याचिकाकर्ता की ओर से वकील रमा कांत दीक्षित और उदय कुमार पेश हुए।
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