

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है, जिसमें SCC ऑनलाइन और मनुपात्रा जैसी ऑनलाइन कानूनी शोध और शैक्षिक डेटाबेस सेवाओं पर 18% वस्तु एवं सेवा कर (GST) लगाए जाने को चुनौती दी गई थी [अनिकेत गुप्ता बनाम भारत संघ और 4 अन्य]।
मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की पीठ ने SAC 998431 के तहत वर्गीकरण की संवैधानिक वैधता की जांच करने से इनकार कर दिया। पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से यह सवाल पूछा कि उन्हें 2017 से लागू टैक्स दर के बारे में "अचानक कैसे पता चला", और देरी के आधार पर याचिका को खारिज कर दिया।
याचिका को खारिज करते हुए पीठ ने कहा, "याचिकाकर्ता 2020 में नामांकित हुआ था और दावा करता है कि वह पिछले छह वर्षों से वकालत कर रहा है। ऐसे में, टैक्स को अनुचित मानने के बारे में उसे 'अचानक पता चलना' और उसके कहने पर जनहित याचिका (PIL) दायर करना, स्वीकार्य नहीं है।"
अधिवक्ता अनिकेत गुप्ता द्वारा दायर याचिका में तर्क दिया गया है कि SCC ऑनलाइन, मनुपात्रा, लेक्सिसनेक्सिस, लाइव लॉ और बार एंड बेंच जैसे डिजिटल कानूनी शोध डेटाबेस को 'सर्विसेज अकाउंटिंग कोड' (SAC) 998431 के तहत वर्गीकृत किया गया है। इसमें ऑनलाइन गेम और डिजिटल मनोरंजन भी शामिल हैं, और इन पर बिना किसी रियायती दर के 18% GST लगता है।
याचिका में एक अतार्किक असमानता की ओर ध्यान दिलाया गया है: प्रिंटेड लॉ रिपोर्ट पूरी तरह से GST से मुक्त हैं, उसी श्रेणी में आने वाली ई-बुक्स पर 5% टैक्स लगता है, और शैक्षणिक संस्थानों को दिए जाने वाले ऑनलाइन जर्नल टैक्स से मुक्त हैं।
इसके विपरीत, ऑनलाइन डेटाबेस के माध्यम से उपलब्ध कराए जाने वाले समान कंटेंट पर 18% टैक्स लगता है, जो डिजिटल एक्सेस को एक तरह से दंडित करता है।
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि कानूनी शोध उपकरण कोई विलासिता की वस्तु नहीं, बल्कि एक अनिवार्य पेशेवर जरूरत हैं।
याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि SCC ऑनलाइन के एक साल के सिंगल-यूजर सब्सक्रिप्शन की कीमत ₹39,530 (जिसमें ₹6,030 टैक्स शामिल है) तक हो सकती है। यह राशि 'बार काउंसिल ऑफ इंडिया' के दिशानिर्देशों के तहत एक जूनियर वकील को मिलने वाले दो महीने के वजीफे (स्टाइपेंड) के बराबर है।
यह भी तर्क दिया गया कि जो वकील रजिस्टर्ड नहीं हैं या जो कानूनी सहायता (लीगल एड) से जुड़े वकील हैं, वे 'इनपुट टैक्स क्रेडिट' का दावा नहीं कर सकते। इस वजह से 18% टैक्स उनके लिए एक ऐसा खर्च बन जाता है जिसे वापस नहीं पाया जा सकता, जिससे न्याय तक किफायती पहुंच में बाधा आती है।
इस चुनौती के समय (टाइमिंग) के बारे में बताते हुए, याचिका में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों - 'पूजा रमेश सिंह' और 'विजय घनश्याम गाडिया' (जुलाई और सितंबर 2026) - का हवाला दिया गया। इन फैसलों में AI द्वारा मनगढ़ंत तरीके से बनाए गए कानूनी संदर्भों (AI-hallucinated citations) के खिलाफ "जीरो-टॉलरेंस" (बिल्कुल बर्दाश्त न करने) का नियम तय किया गया था, और यह माना गया कि बिना जांचे-परखे तथ्य पेश करना पेशेवर कदाचार (professional misconduct) है।
याचिका में कहा गया है कि भरोसेमंद कमर्शियल डेटाबेस अब एक अनिवार्य सुरक्षा उपाय बन गए हैं, जिनकी मदद से वकील पुराने फैसलों (precedents) की पुष्टि करते हैं और अदालत के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं।
हालांकि, हाई कोर्ट ने इस वर्गीकरण के गुण-दोष या इसके मनमाने स्वरूप पर विचार करने से इनकार कर दिया और याचिका को शुरुआती चरण (एडमिशन स्टेज) में ही खारिज कर दिया।
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Allahabad High Court dismisses plea challenging 18% GST on online legal databases