अंबानी और अडानी से जुड़े मीडिया समूह सुप्रीम कोर्ट में डेटा संरक्षण कानून को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं में शामिल हैं

मीडिया हाउसों के वकील ने अदालत को बताया कि पत्रकारिता से जुड़ी छूट का न होना प्रेस की 'प्री-सेंसरशिप' (पूर्व-सेंसरशिप) के समान है, और इसके समाचार रिपोर्टिंग पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
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मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) से जवाब मांगा है। यह जवाब 'डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन' (DNPA) द्वारा दायर एक याचिका पर मांगा गया है। DNPA में भारत के 21 प्रमुख डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स शामिल हैं, जिनमें अंबानी समूह और अडानी समूह की कंपनियां भी हैं। इस याचिका में 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023' के प्रावधानों को चुनौती दी गई है [डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य]।

मीडिया समूहों की याचिका में कहा गया है कि यह कानून और 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन रूल्स, 2025' पत्रकारों के लिए जनहित के मामलों की जांच करना और उन पर रिपोर्ट करना मुश्किल बना सकते हैं।

DNPA कई बड़े मीडिया संगठनों का प्रतिनिधित्व करता है, जिनमें नेटवर्क18 (जो मुकेश अंबानी के रिलायंस समूह का हिस्सा है) और NDTV (जिसका स्वामित्व अडानी समूह के पास है) शामिल हैं।

इसके सदस्यों में द इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स इंटरनेट, द हिंदू, इंडिया टुडे, ज़ी मीडिया, ABP प्राइवेट लिमिटेड, मलयाला मनोरमा, मातृभूमि, अमर उजाला, ईनाडू टेलीविजन प्राइवेट लिमिटेड और अन्य शामिल हैं।

पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत, और जस्टिस जॉयमाल्य बागची तथा जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सरकार का पक्ष सुने बिना इस कानून पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया।

CJI कांत ने कहा, "दूसरे पक्ष को सुने बिना कोई रोक नहीं लगाई जाएगी। लेकिन, रोक लगाने की अर्जी पर नोटिस जारी किया जा रहा है।"

इस मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी।

Chief Justice of India Surya Kant and Justices Joymalya Bagchi and V Mohana
Chief Justice of India Surya Kant and Justices Joymalya Bagchi and V Mohana

याचिका के अनुसार, पत्रकारिता गतिविधियों के लिए कोई विशेष छूट न होने की स्थिति में, पत्रकारों और समाचार प्रकाशकों को अपनी नियमित रिपोर्टिंग के दौरान व्यक्तिगत डेटा से जुड़े नोटिस, सहमति और डेटा हटाने (इरेज़र) जैसी बाध्यताओं का सामना करना पड़ सकता है, भले ही वह जानकारी जनहित में जुटाई और प्रकाशित की गई हो।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ऐसी छूट न मिलने पर, पत्रकारों को सरकारी अधिकारियों, अपराध, व्यापार और शासन से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते समय कई तरह की पाबंदियों का सामना करना पड़ सकता है।

याचिका में कहा गया है,

"DPDP अधिनियम की धारा 36, जिसे DPDP नियमों के नियम 23 और सातवीं अनुसूची के साथ पढ़ा जाए, केंद्र सरकार को किसी भी 'डेटा फिड्यूशियरी' (डेटा रखने वाली संस्था) या मध्यस्थ से कोई भी जानकारी मांगने का असीमित और बिना किसी मानक वाला अधिकार देती है। इसमें न तो कोई न्यायिक निगरानी है, न ही यह साबित करने की जरूरत है कि यह जानकारी कितनी जरूरी या उचित है, और न ही इससे प्रभावित होने वाले 'डेटा प्रिंसिपल' (जिसका डेटा है) को कोई नोटिस देने का प्रावधान है।"

याचिकाकर्ताओं ने यह चिंता भी जताई कि इस कानून के कारण उन गोपनीय स्रोतों की पहचान उजागर हो सकती है, जो पत्रकारों को जानकारी देते हैं।

याचिका में कहा गया है, "इस ढांचे में पत्रकारिता गतिविधियों के लिए छूट का न होना, और जनहित में की जाने वाली ईमानदार पत्रकारिता के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपायों का अभाव, स्रोतों की गोपनीयता, संपादकीय स्वतंत्रता और डिजिटल समाचार इकोसिस्टम के प्रभावी कामकाज को खतरे में डालता है।"

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जिन प्रावधानों को चुनौती दी गई है, वे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, जिनमें 'वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' भी शामिल है।

याचिका में कहा गया है, "इसका कुल असर यह होगा कि संपादकीय स्वतंत्रता और खोजी पत्रकारिता (इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म) पर एक तरह का दबाव या डर पैदा होगा, जिससे 'वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' पर एक अनुचित बोझ पड़ेगा।"

DNPA की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने अदालत से 'स्टे' (रोक) लगाने की अर्जी पर विचार करने का आग्रह किया। उन्होंने तर्क दिया कि पत्रकारिता गतिविधियों के लिए छूट न होने से, समाचार जुटाने और रिपोर्ट करने के पूरे तरीके में बुनियादी बदलाव आ सकता है।

दीवान ने कहा, "यह शायद 'लेगेसी मीडिया' (पारंपरिक मीडिया) की ओर से दायर की गई पहली व्यापक याचिका है। 'सिटिजन जर्नलिस्ट्स' (नागरिक पत्रकारों) को लेकर तो कुछ बहस हुई है, लेकिन हम पारंपरिक, स्थापित मीडिया हैं।"

उन्होंने तर्क दिया कि अगर पत्रकारों को किसी व्यक्ति के बारे में जानकारी प्रकाशित करने से पहले उस व्यक्ति से अनुमति लेनी पड़े, तो इससे न्यूज़रूम के कामकाज पर बुरा असर पड़ सकता है। दीवान ने 'सूचना का अधिकार' (RTI) अधिनियम की धारा 8(1)(j) में किए गए संशोधन पर भी चिंता जताई, जो सार्वजनिक प्राधिकरणों के पास मौजूद व्यक्तिगत जानकारी के खुलासे से संबंधित है। इसके अलावा, दीवान ने कोर्ट को बताया कि पत्रकारों को छूट न मिलना प्रेस की 'प्री-सेंसरशिप' (प्रकाशन से पहले सेंसरशिप) के बराबर है, जिसके समाचार रिपोर्टिंग पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

उन्होंने कहा, "हमने छूट के मुद्दे पर भी अपनी बात रखी है। अगर हमें हर काम के लिए अनुमति लेनी पड़े, तो न्यूज़रूम बंद हो जाएंगे। यह पूरी तरह से 'प्री-सेंसरशिप' की व्यवस्था है। अगर हम आपके बारे में कोई रिपोर्ट करते हैं, तो क्या हमें आपसे अनुमति लेनी होगी? ऐसा कैसे हो सकता है? फिर न्यूज़ (समाचार) क्या है? अगर हम कुछ गलत या गलत जानकारी वाली रिपोर्ट करते हैं, तो हम उसके नतीजे भुगतने के लिए तैयार हैं।"

उन्होंने आगे कहा कि इस कानून के शुरुआती ड्राफ्ट में पत्रकारिता को इससे बाहर रखा गया था, और सवाल उठाया कि अब यह छूट क्यों हटा दी गई है।

दीवान ने कहा, "जब कोर्ट इस कानून की बारीकी से जांच करेगा, तो पाएगा कि यह पत्रकारिता के लिए है ही नहीं। असल में, इसके शुरुआती ड्राफ्ट में पत्रकारिता को बाहर रखा गया था। हमें नहीं पता कि ऐसा क्यों हुआ। साफ है कि यह हमारे लिए नहीं है।"

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Ambani, Adani-linked media groups among petitioners challenging data protection law in Supreme Court

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