बार को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकते: सेवानिवृत्त जजों को वापस लाने की योजना विफल होने पर CJI सूर्यकांत

सीजेआई ने कहा, "बार एसोसिएशनों के विरोध के कारण यह पहल शुरू नहीं हो सकी... उन्होंने प्रस्ताव पारित करना शुरू कर दिया।"
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भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत ने गुरुवार को कहा कि बार एसोसिएशनों के विरोध के कारण, सुप्रीम कोर्ट की उस कोशिश पर रोक लग गई, जिसके तहत सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को उच्च न्यायालयों में तदर्थ (एड हॉक) न्यायाधीश के रूप में वापस लाया जाना था।

CJI ने कहा, "तत्कालीन CJI बोबडे की अध्यक्षता वाली एक बेंच में, हमने सेवानिवृत्त जजों में से 'एडहॉक' (तदर्थ) जजों को नियुक्त करने की प्रथा को फिर से शुरू करने की कोशिश की थी। हमारा विचार था कि इस प्रथा को दोबारा चलन में लाया जाए। लेकिन बार एसोसिएशनों के विरोध के कारण यह पहल आगे नहीं बढ़ सकी... उन्होंने प्रस्ताव पारित करना शुरू कर दिया... कोई भी मुख्य न्यायाधीश बार (वकीलों के संगठन) को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकता।"

संविधान का अनुच्छेद 224A, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को यह अधिकार देता है कि वे उसी या किसी अन्य हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज से 'एडहॉक' जज के रूप में काम करने का अनुरोध कर सकें।

ये टिप्पणियां CJI कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच की ओर से तब आईं, जब वे राजस्थान में न्यायिक अधिकारियों की वरिष्ठता से जुड़े एक विवाद की सुनवाई कर रहे थे।

Chief Justice of India Surya Kant and Justices Joymalya Bagchi and V Mohana
Chief Justice of India Surya Kant and Justices Joymalya Bagchi and V Mohana

वरिष्ठ अधिवक्ता पी.एस. पटवालिया ने तर्क दिया कि सीधी भर्ती वाले जजों को, उनके नियंत्रण से बाहर की देरी के बावजूद, बाद में नियुक्त किए गए जजों से नीचे रखा गया है।

इसके बाद चर्चा पेंशन के मुद्दे और उस न्यायिक अनुभव के नुकसान तक फैल गई, जो तब होता है जब सेवानिवृत्त जज वापस सेवा में नहीं लौट पाते।

जस्टिस बागची ने कहा कि इस असफल पहल ने सेवानिवृत्त जजों को मझधार में छोड़ दिया है।

उन्होंने कहा, "दुखद बात यह है कि जिन जजों ने सेवानिवृत्ति के बाद अपनी सेवाएं देने की पेशकश की थी, उन्होंने कोई निजी काम नहीं लिया; उन्हें पूरी उम्मीद थी कि उनकी नियुक्ति हो जाएगी।"

उन्होंने अमेरिका में एक महिला जज से हुई अपनी मुलाकात का भी जिक्र किया, जिन्होंने 9/11 से जुड़े एक मामले की सुनवाई की थी।

"आप यकीन नहीं करेंगे, लेकिन उनकी उम्र 80 साल से ज्यादा थी। उन्हें आतंकवाद से जुड़े ऐसे मामलों की सुनवाई में इतनी महारत हासिल थी कि मुख्य न्यायाधीश ने उनसे सेवा देने का अनुरोध किया था। न्यायिक संसाधनों का मूल्य बहुत अनमोल होता है।"

इसके बाद CJI ने एक न्यायिक अधिकारी से हुई अपनी मुलाकात का किस्सा सुनाया, जिन्होंने कई साल की सेवा के बाद इस्तीफा दे दिया था और वापस वकालत करने लगे थे। उस अधिकारी ने उन्हें बताया कि नए पेंशन नियमों के तहत, सेवानिवृत्ति पर उन्हें महीने के 25,000 रुपये से ज्यादा मिलने की उम्मीद नहीं है।

CJI ने बताया कि उस अधिकारी ने उनसे पूछा, "आप ही बताइए, मैं अपना गुजारा कैसे करूंगा?"

पटवालिया ने आग्रह किया, "न्यायमूर्ति महोदय, आपको पेंशन के मुद्दे पर जरूर ध्यान देना चाहिए, कम से कम न्यायिक अधिकारियों के लिए तो जरूर।"

जस्टिस बागची ने इस मुद्दे को न्यायिक स्वतंत्रता से जोड़ा।

"उन्हें स्वतंत्र बनाए रखना, न्यायपालिका की स्वतंत्रता का ही एक हिस्सा होगा।"

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Can't risk annoying the Bar: CJI Surya Kant on why plan to bring back retired judges failed

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