

सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) की जयपुर बेंच ने रेलवे अधिकारियों की आलोचना की है। इन अधिकारियों ने पूर्व सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दिए गए उस वचन को दरकिनार करने की कोशिश की थी, जो आरक्षित श्रेणी के कर्मचारियों को अनारक्षित रिक्त पदों पर पदोन्नत (प्रमोशन) करने के संबंध में दिया गया था। [पंचम सिंह बनाम भारत संघ]।
न्यायिक सदस्य रंजना शाही और प्रशासनिक सदस्य लोक रंजन की एक पीठ ने पाया कि रेलवे के कुछ हिस्से जानबूझकर अदालती फैसलों और सॉलिसिटर जनरल द्वारा दिए गए आश्वासन की अपने तरीके से व्याख्या करने की कोशिश कर रहे हैं।
CAT (केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण) ने कहा, "हालांकि, प्रतिवादी विभाग के भीतर कुछ लोग जानबूझकर ऐसे तरीके खोज रहे हैं जिनसे ऊपर बताए गए फैसलों और खुद उनके सॉलिसिटर जनरल द्वारा दिए गए विशेष आश्वासन की व्याख्या, परिभाषा या अर्थ को तोड़ा-मरोड़ा जा सके।"
यह टिप्पणी रेलवे कर्मचारियों द्वारा दायर तीन आवेदनों पर सुनवाई के दौरान की गई। इन आवेदनों में अनारक्षित रिक्तियों (unreserved vacancies) के खिलाफ आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों की पदोन्नति (promotion) को चुनौती दी गई थी।
विवाद इस बात पर था कि क्या वे कर्मचारी, जो आरक्षण के जरिए सेवा में आए थे या जिन्हें आरक्षित रिक्तियों के खिलाफ पदोन्नति मिली थी, वे बाद में अपनी योग्यता (merit) के आधार पर अनारक्षित पदों पर पदोन्नति का दावा कर सकते हैं या नहीं।
ट्रिब्यूनल ने गौर किया कि सितंबर 2016 में, तत्कालीन सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वासन दिया था कि सरकार 2010 में जारी दो सर्कुलरों के आधार पर, अनारक्षित रिक्तियों के खिलाफ आरक्षित श्रेणी के कर्मचारियों को और पदोन्नति नहीं देगी।
यह आश्वासन 'समता आंदोलन समिति बनाम संजय कोठारी' मामले में अवमानना (contempt) की कार्यवाही के दौरान दिया गया था। यह मामला पदोन्नति में आरक्षण से जुड़े कानूनी विवाद से उपजा था।
29 सितंबर 2016 को हुई सुनवाई के बाद, कुमार ने सरकार को पत्र लिखकर इस आश्वासन के बारे में स्पष्ट किया और चेतावनी दी कि इसका उल्लंघन करने पर अवमानना की कार्यवाही शुरू हो सकती है।
ट्रिब्यूनल ने उनके उस पत्र का उल्लेख किया, जिसमें कुमार ने कहा था:
"सरकार इन दो सर्कुलरों में से किसी का भी सहारा लेकर या उनके आधार पर पदोन्नति का कोई और आदेश जारी नहीं करेगी।"
पत्र में आगे चेतावनी दी गई थी कि इस आश्वासन का कोई भी उल्लंघन "स्पष्ट रूप से अवमानना" माना जाएगा।
इसके बाद, रेलवे बोर्ड ने 30 सितंबर 2016 को निर्देश जारी किए और अपने पिछले सर्कुलर को फिलहाल रोक (abeyance) दिया।
हालांकि, CAT ने पाया कि इस आश्वासन के बावजूद, रेलवे के कुछ अधिकारी आरक्षित श्रेणी के कर्मचारियों को अनारक्षित पदों पर पदोन्नत करने की कोशिश करते रहे।
ट्रिब्यूनल ने ध्यान दिलाया कि सॉलिसिटर जनरल के आश्वासन के कारण ही सुप्रीम कोर्ट ने आगे कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं किया था।
CAT ने रेलवे के उस तर्क को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि पदोन्नति सुप्रीम कोर्ट में चल रही कार्यवाही के नतीजों के अधीन रहेगी। इसमें कहा गया कि ऐसी योग्यता उन पदोन्नतियों (promotions) को सही नहीं ठहरा सकती, जो इस वचन (undertaking) के दायरे में आती हैं।
ट्रिब्यूनल ने कहा, "माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष सॉलिसिटर जनरल का यह वचन है कि SLP (विशेष अनुमति याचिकाएं) लंबित रहने की अंतरिम अवधि के दौरान, अनारक्षित रिक्तियों (unreserved vacancies) पर आरक्षित श्रेणी के व्यक्तियों को पदोन्नति नहीं दी जाएगी।"
ट्रिब्यूनल द्वारा कानूनी स्थिति पर विचार करने के बाद, यह निष्कर्ष निकाला गया कि आरक्षित श्रेणी के वे कर्मचारी, जो पहले ही आरक्षण का लाभ ले चुके हैं, वे बाद में अपनी योग्यता (merit) के आधार पर अनारक्षित रोस्टर बिंदुओं (unreserved roster points) पर पदोन्नति का दावा नहीं कर सकते।
इसके अनुसार, CAT (केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण) ने 16 फरवरी, 2023 के पदोन्नति नोटिफिकेशन को रद्द कर दिया और रेलवे को निर्देश दिया कि वह पात्रता और उपयुक्तता की नई सूची तैयार करे।
आवेदकों की ओर से अधिवक्ता शोभित तिवारी पेश हुए।
प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ता एम.के. शर्मा, के.सी. मीना, आर.डी. मीना, एन.सी. गोयल, वी.डी. शर्मा और अरुण शर्मा ने पक्ष रखा।
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CAT slams Railway officials for twisting former Solicitor General's undertaking to Supreme Court