

मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स (GST) अधिकारियों के दावों को बिना जांचे-परखे नहीं माना जा सकता; उन्हें साबित करने के लिए वेरिफ़ाई किए जा सकने वाले रिकॉर्ड की ज़रूरत होती है [भीमा एंटरप्राइजेज़ बनाम प्रिंसिपल चीफ़ कमिश्नर GST]।
जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने यह टिप्पणी एक ऐसी याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें टैक्स अधिकारियों द्वारा जारी सर्च वारंट को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि उसमें डॉक्यूमेंट आइडेंटिफिकेशन नंबर (DIN) नहीं था।
सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ इनडायरेक्ट टैक्स एंड कस्टम्स के एक सर्कुलर में कहा गया था कि इसके अधिकारी किसी भी जांच के दौरान सर्च ऑथराइजेशन, समन, अरेस्ट मेमो, इंस्पेक्शन नोटिस और लेटर बिना कंप्यूटर-जनरेटेड DIN के जारी नहीं करेंगे।
कोर्ट ने फैसला सुनाया कि जो अधिकारी ज़रूरी DIN जेनरेट न कर पाने के लिए तकनीकी दिक्कतों का हवाला देते हैं, उन्हें अपने दावे को साबित करने के लिए सबूत पेश करने होंगे। ऐसे दावों के समर्थन में सबूत की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए, कोर्ट ने हिंदू धर्मग्रंथों के उन किरदारों का ज़िक्र किया जो ईमानदारी और सच्चाई के लिए जाने जाते थे।
कोर्ट ने कहा, "हरिश्चंद्र और युधिष्ठिर जैसी शख्सियतें अब विलुप्त हो चुकी हैं। किसी भी दावे की सच्चाई की जांच की जा सकनी चाहिए। सिर्फ़ स्वयंसिद्ध बातें ही सबूत की मांग को नकार सकती हैं। किसी अधिकारी के किसी भी रुख को स्वयंसिद्ध सत्य नहीं माना जा सकता।"
कोर्ट ने आगे कहा कि अगर कोई अधिकारी सर्कुलर में बताई गई छूट का इस्तेमाल करता है, तो उसे उस खास तकनीकी समस्या और DIN जेनरेट करने की नाकाम कोशिश का रिकॉर्ड रखना होगा।
कोर्ट ने आगे कहा, "अगर संबंधित अधिकारी तकनीकी कारणों से सफल नहीं हो पाता है, तो उसे अपने तुरंत ऊपर के अधिकारी को ईमेल भेजकर यह बताना होगा कि DIN जेनरेट करने की उसकी कोशिश बेकार गई। अगर तुरंत ऊपर के अधिकारी को ऐसी जानकारी नहीं दी जाती है, तो कोर्ट विभाग के पक्ष को बिना जांचे-परखे नहीं मानेगा।"
कोर्ट एक ज्वेलरी बनाने और थोक में बेचने वाली कंपनी की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। कंपनी ने अगस्त 2023 में हुई तलाशी और टैक्स व पेनल्टी के तौर पर ₹32.62 लाख की ज़बरदस्ती वसूली के आरोप को चुनौती दी थी।
अधिकारियों ने भीमा एंटरप्राइजेज से 3,808.386 ग्राम वज़न के सोने के गहने (कीमत ₹2.23 करोड़) और 5,478.940 ग्राम वज़न की सोने की ईंटें/बिस्कुट (कीमत ₹3.21 करोड़) ज़ब्त किए थे। विभाग का आरोप था कि फर्म के रिकॉर्ड में गहनों का स्टॉक ज़रूरत से ज़्यादा और सोने की ईंटों/बिस्कुट का स्टॉक कम पाया गया।
फर्म ने तलाशी वाले दिन ₹13.37 लाख और अगले दिन ₹19.24 लाख का भुगतान किया। विभाग ने इन भुगतानों को अपनी मर्ज़ी से किया गया भुगतान बताया, जबकि फर्म ने ज़बरदस्ती वसूली का आरोप लगाया।
फर्म ने वारंट में DIN न होने को भी चुनौती दी। वारंट में इसके लिए तकनीकी दिक्कतों का हवाला दिया गया था।
हालांकि, कोर्ट को समस्या बताने वाला कोई समकालीन रिकॉर्ड नहीं मिला। कोर्ट ने पाया कि अधिकारियों ने सिर्फ़ यह लिखा था कि तकनीकी खराबी के कारण DIN जेनरेट नहीं हो सका।
कोर्ट ने कहा, "यह एक सुविधाजनक बहाना है। सर्कुलर में लिखी बात को तोते की तरह दोहराने से अधिकारी के काम को न्यायिक समीक्षा से छूट नहीं मिलेगी। संबंधित अधिकारी को किस तकनीकी दिक्कत का सामना करना पड़ा, इसका ब्यौरा उसी समय फ़ाइल में दर्ज किया जाना चाहिए था।"
कोर्ट ने आगे कहा कि बाद में जेनरेट किए गए DIN को वेरिफ़िकेशन के लिए टैक्सपेयर के साथ शेयर किया जाना चाहिए।
इस मामले में अधिकारी ऐसा करने में नाकाम रहे। कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना उनकी ज़िम्मेदारी थी क्योंकि DIN लाने का मकसद ही पारदर्शिता सुनिश्चित करना था।
कोर्ट ने गौर किया कि वारंट सेंट्रल गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स एक्ट की धारा 67(2) के तहत जारी किया गया था, जो तलाशी और ज़ब्ती से संबंधित है। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि उस कम्युनिकेशन में इसे 'इंस्पेक्शन वारंट' बताया गया था।
कोर्ट ने कहा कि इंस्पेक्शन, तलाशी और ज़ब्ती अलग-अलग अधिकार हैं और GST INS-01 फ़ॉर्म में साफ़ तौर पर बताया जाना चाहिए कि कौन सा अधिकार दिया गया है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकारियों को टैक्सपेयर को ज़ब्त किए गए सामान को बॉन्ड और सिक्योरिटी देकर प्रोविज़नल तौर पर छुड़ाने के विकल्प के बारे में बताना ज़रूरी है।
इस तरह कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ₹32.62 लाख का पेमेंट अपनी मर्ज़ी से नहीं किया गया था।
हालांकि, कोर्ट ने तलाशी के लिए दिए गए अधिकार को तुरंत रद्द करने या रिफ़ंड का आदेश देने से इनकार कर दिया, क्योंकि फ़र्म ने पहले अपने सोने को छुड़ाने के लिए इसी पेमेंट का सहारा लिया था।
इसे "उल्टा चोर कोतवाल को डांटे" (pot calling the kettle black) जैसा मामला बताते हुए कोर्ट ने नए सिरे से असेसमेंट का आदेश दिया।
कोर्ट ने कहा, "याचिकाकर्ता को संबंधित रकम रिफ़ंड की जानी चाहिए या नहीं, यह असेसमेंट की कार्यवाही के नतीजे पर निर्भर करेगा।"
याचिकाकर्ता की ओर से वकील आर. कार्तिक रंगनाथन पेश हुए।
GST अधिकारियों की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ए.आर.एल. सुंदरेशन पेश हुए, जिनकी मदद वकील एन. दिलीप कुमार ने की।
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Harishchandras and Yudhishthiras are extinct: Madras HC raps GST officials