हाथरस घटना: पीड़िता की अंत्येष्टि के मामले मे पुलिस अधिकारी, जिलाधिकारी पर जांच के लिये पूर्व न्यायिक अधिकारी की SC मे याचिका

याचिकाकर्ता का अनुरोध अगर पीड़ित की मृत देह के साथ कथित रूप से अमर्यादित और अमानवीय व्यवहार के आरोप सही पाये जाते हैं तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए।
हाथरस घटना: पीड़िता की अंत्येष्टि के मामले मे पुलिस अधिकारी, जिलाधिकारी पर जांच के लिये पूर्व न्यायिक अधिकारी की SC मे याचिका
Hathras

उत्तर प्रदेश के हाथरस की हाल की घटनाओं से व्यथित एक सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर दलित पीड़ित महिला की जबरल अंत्येष्टि के लिये जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों और जिलाधिकारी के खिलाफ जांच का अनुरोध किया है।

याचिका में राज्य पुलिस से इतर किसी एजेन्सी से जांच कराने का अनुरोध किया गया है। साथ ही यह भी अनुरोध किया गया है कि अगर पीड़ित की मृत देह के साथ कथित रूप से अमर्यादित और अमानवीय व्यवहार के आरोप सही पाये जाते हैं तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए।

याचिकाकर्ता चंद्र भान सिंह सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी हैं जिन्होंने 25 साल से भी अधिक समय तक न्याय व्यवस्था की सेवा की है।

हाथरस के गांव में 14 सितंबर को 19 वर्षीय दलित लड़की से कथित रूप से सामूहिक बलात्कार और बर्बरता की गयी थी। इस लड़की की 29 सितंबर को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में मृत्यु हो गयी थी। पीड़ित का पार्थिव शरीर जब उसके पैतृक गांव ले जाया जा रहा था तो उप्र पुलिस और प्रशासन ने परिवार की सहमति या उनकी उपस्थिति के बगैर ही रात के अंधरे में उसके शव की कथित रूप से जबरन अंत्येष्टि कर दी।

याचिका में पीड़िता की मृत देह के प्रति पुलिस और स्थानीय प्राधिकारियों के रवैये की तीखी आलोचना की गयी हें

इस घटना पर राष्ट्रव्यापी आक्रोष व्यक्त होने पर राज्य पुलिस ने मीडिया, नेताओं, कार्यकर्ताओं और विरोध प्रदर्शन करने वालों को पीड़ित के परिवार से मिलने से रोकने के लिये समूचे गांव की घेराबंदी कर दी।

याचिका में कहा गया है, ‘‘प्रशासन ने पूरे इलाके में गुपचुप तरीके से अवरोध लगा दिये।’’

सिंह ने दावा किया है कि संविधान के अनुच्छेद 25 में प्रदत्त अपनी परंपरा के अनुसार पीड़ित के देह का अंतिम संस्कार करने के परिवार के अधिकार का हनन हुआ है।

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 का भी सहारा लिया गया है और यह सवाल उठाया गया है कि क्या एक व्यक्ति को प्राप्त जीवन के अधिकार में उसकी मृत्यु के मामले में गरिमा का अधिकार भी शामिल है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि हिन्दु शास्त्रों के अनुसार मृतक का अंतिम संस्कार करने से रोकने वाले ‘पापी’ होते हैं और उच्चतम न्यायालय ने भी अपनी व्यवस्था में कहा है कि अनुच्छेद 21 में प्रदत्त अधिकार व्यक्ति की मृत देह को भी प्राप्त है।

याचिका के अनुसार इस तथ्य के मद्देनजर जिन अधिकारियों ने पीड़ित की देह के परंपरागत तरीके से अंतिम संस्कार में कथित रूप से व्यवधान डाला है उनके खिलाफ भी जांच के बाद कार्यवाही की जानी चाहिए।

यह याचिका अधिवक्ता स्मारहर सिंह के माध्यम से दायर की गयी है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भोर होने से पहले ही इस पीड़िता महिला का, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसका कथित रूप से सामूहिक बलात्कार और अंग भंग किया गया, का अंतिम संस्कार किये जाने की घटना का हाल ही में स्वत: संज्ञान लिया है।

यह मामला 12 अक्टूबर को उच्च न्यायालय में सूचीबद्ध है । पीड़ित के परिवार के सदस्यों को भी उस दिन न्यायालय में पेश होने के निर्देश दिये गये हैं ताकि सारे तथ्यों के बारे में और जानकारी प्राप्त की जा सके।

स्वत: संज्ञान का मामला दर्ज किये जाने के बाद पीड़ित के परिवार के सदस्यों के प्रस्तावित नार्को टेस्ट के खिलाफ भी याचिकायें दायर की गयी हैं।

कार्यकर्ता साकेत गोखले ने पत्र याचिका दायर की है जिसमे कहा गया है कि प्रस्तावित नार्को परीक्षण का मतल परिवार का दमन करना और अदालत में गवाही देने के खिलाफ धमकाना है। इसलिए उन्होंने इस पत्र में उप्र के प्राधिकारियों द्वारा प्रस्तावित नार्को टेस्ट पर 12 अक्टूबर को न्यायालय के समक्ष परिवार के सदस्यों के बयान दर्ज होने तक रोक लगाने का अनुरोध किया है।

उन्होंने संबंधित अधिकारियों के तबादले या निलंबन के राज्य सरकार के कदम की वजह से आशंका व्यक्त की है कि अंत्येष्टि के दिन प्रभारी अधिकारी हो सकता है कि उच्च न्यायालय के समक्ष हाजिर नहीं हों।

उच्चतम न्यायालय में भी इस मामले की सीबीआई या शीर्ष अदालत या उच्च न्यायालय के पीठासीन या सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में विशेष जांच दल से जांच कराने का अनुरोध किया गया है।

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