

कर्नाटक हाई कोर्ट ने मंगलवार को राज्य के वित्त विभाग पर ₹2,000 का जुर्माना लगाया। यह जुर्माना विभाग द्वारा बार-बार जवाब दाखिल न करने के कारण लगाया गया; यह मामला बीजेपी विधायक की उस याचिका से जुड़ा था जिसमें मुख्यमंत्री के इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट प्रोग्राम (CMIDP) के तहत फंड के भेदभावपूर्ण आवंटन का आरोप लगाया गया था।
जस्टिस अनु शिवरामन और जस्टिस केएस भरत कुमार की डिवीज़न बेंच ने राज्य को आदेश दिया कि वे एडवोकेट्स क्लर्क्स एसोसिएशन को खर्च का भुगतान करें और अपनी आपत्तियों के बयान के साथ रसीद भी पेश करें।
कोर्ट ने कहा, "बार-बार समय दिए जाने के बावजूद आपत्तियां दाखिल न करने के लिए प्रतिवादी-राज्य के पास कोई उचित कारण नहीं है।"
कोर्ट ने आगे कहा कि जब किसी PIL पर संज्ञान लिया जाता है और राज्य को अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया जाता है, तो सरकार का हलफनामा रिकॉर्ड पर रखा जाना चाहिए।
बेंच ने चेतावनी दी कि अगर सरकार ऐसा करने में विफल रहती है, तो कोर्ट याचिकाकर्ता के पक्ष में आदेश पारित करेगा।
बेंच ने टिप्पणी की, "जब कोर्ट संज्ञान लेता है और आपसे जवाब दाखिल करने के लिए कहता है, तो आपका हलफनामा रिकॉर्ड पर होना चाहिए। अन्यथा, हम इन PILs को स्वीकार करना शुरू कर देंगे। तब आपको पता चलेगा।"
यह याचिका जामखंडी से बीजेपी विधायक जगदीश शिवय्या गुडागुंती ने दायर की थी। उन्होंने आरोप लगाया है कि सत्ताधारी पार्टी के विधायकों वाले निर्वाचन क्षेत्रों को विपक्ष के विधायकों वाले क्षेत्रों की तुलना में ज़्यादा फंड मिला है।
याचिका के अनुसार, 2025-26 के राज्य बजट में घोषित ₹8,000 करोड़ की CMIDP योजना के तहत, विपक्षी निर्वाचन क्षेत्रों को ₹25 करोड़ प्रति क्षेत्र आवंटित किए गए, जबकि सत्ताधारी पार्टी के विधायकों वाले निर्वाचन क्षेत्रों को ₹50 करोड़ प्रति क्षेत्र आवंटित किए गए।
जब मंगलवार को इस मामले पर विचार किया गया, तो बेंच ने देखा कि 29 अक्टूबर, 2025 के आदेश के ज़रिए उसने राज्य को जवाबी हलफनामा/आपत्तियों का बयान दाखिल करने का निर्देश दिया था।
इसके बाद कई बार मामले की सुनवाई होने के बावजूद, जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं किया गया।
कोर्ट ने गौर किया कि इस साल 17 फरवरी को प्रतिवादियों को निर्देश लेने और अपनी आपत्तियों का बयान दाखिल करने का आखिरी मौका दिया गया था।
बेंच ने कहा, "इसके बाद चार बार मामले की सुनवाई होने के बावजूद, रिकॉर्ड पर कोई आपत्ति नहीं है।"
सरकारी वकील ने जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए दो हफ़्ते का समय मांगा।
हालांकि, बेंच ने सवाल किया कि जवाब दाखिल करने के स्पष्ट निर्देश के बावजूद राज्य ऐसा करने में क्यों नाकाम रहा।
बेंच ने पूछा, "जब इस कोर्ट का हलफनामा दाखिल करने का निर्देश है, तो इसे दाखिल क्यों नहीं किया जा रहा है?"
नतीजतन, कोर्ट ने अपने निर्देशों का पालन न करने में बार-बार हुई चूक के लिए ₹2,000 का जुर्माना लगाया।
इसने राज्य को अपनी आपत्तियां रिकॉर्ड पर रखने के लिए आखिरी मौके के तौर पर दो हफ़्ते का समय भी दिया।
बेंच ने यह भी चेतावनी दी कि जिन मामलों में पार्टियां आपत्तियां दाखिल किए बिना चार से ज़्यादा मौकों का इस्तेमाल करती हैं, वहां जुर्माना लगाया जाएगा और यह रकम देरी के लिए ज़िम्मेदार व्यक्ति से वसूली जा सकती है।
बेंच ने कहा, "जिन मामलों में चार से ज़्यादा मौके लिए जाते हैं और कोई आपत्ति दाखिल नहीं की जाती, हम ऐसा ही करेंगे। यह रकम उस व्यक्ति से वसूली जानी चाहिए जो इसे दाखिल न करने के लिए ज़िम्मेदार है।"
याचिकाकर्ता की ओर से वकील अनीश जोस एंटनी पेश हुए।
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