

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने हाल ही में कहा है कि वादी कर्नाटक प्रशासनिक न्यायाधिकरण (KAT) के समक्ष कन्नड़ भाषा में आवेदन सहित अन्य दस्तावेज दाखिल कर सकते हैं [सूर्यकांत बनाम KPSC]।
जस्टिस अशोक एस. किनागी और जस्टिस सुब्रमण्य रंगा राव की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। उन्होंने जून 2025 के KAT (कर्नाटक प्रशासनिक न्यायाधिकरण) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सूर्यकांत नाम के एक व्यक्ति द्वारा कन्नड़ भाषा में दायर आवेदन को खारिज कर दिया गया था।
अदालत ने माना कि 'कर्नाटक प्रशासनिक न्यायाधिकरण कार्य-प्रणाली नियम, 1990' (Karnataka Administrative Tribunal Rules of Practice, 1990) के नियम 9(iii) के तहत, आवेदन 'प्लीडिंग्स' (दस्तावेजी दलीलों) के दायरे में आते हैं। इन नियमों में स्पष्ट रूप से यह अनुमति दी गई है कि 'प्लीडिंग्स' और अन्य दस्तावेज अंग्रेजी या कन्नड़, किसी भी भाषा में दाखिल किए जा सकते हैं।
खंडपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि न्यायाधिकरण के समक्ष कन्नड़ भाषा में आवेदन दाखिल करने पर कोई रोक नहीं है।
7 अक्टूबर के फैसले में बताया गया, "पक्षकारों के लिए कन्नड़ भाषा में आवेदन दाखिल करने पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। 1990 के नियमों के नियम 9(iii) के अनुसार, पक्षकार कन्नड़ में आवेदन दाखिल कर सकते हैं। वहीं, 1986 के नियमों के तहत खंडपीठ को यह अधिकार है कि वह अपनी मर्जी से कार्यवाही में कन्नड़ भाषा के इस्तेमाल की अनुमति दे सकती है, बशर्ते अंतिम आदेश अंग्रेजी भाषा में हो।"
याचिकाकर्ता ने KAT (कर्नाटक प्रशासनिक न्यायाधिकरण) में एक अर्जी देकर अपनी मूल याचिका कन्नड़ भाषा में दाखिल करने की अनुमति मांगी थी। लेकिन, न्यायाधिकरण ने 'कर्नाटक प्रशासनिक न्यायाधिकरण (प्रक्रिया) नियम, 1986' के नियम 3 का हवाला देते हुए इस अनुरोध को खारिज कर दिया। इस नियम के अनुसार, न्यायाधिकरण की भाषा अंग्रेजी होनी चाहिए।
इस फैसले से असंतुष्ट होकर सूर्यकांत ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने तर्क दिया कि 1986 के नियमों का नियम 3 दस्तावेजों को कन्नड़ में दाखिल करने की अनुमति देता है। साथ ही, यह पीठ (बेंच) को कार्यवाही के दौरान कन्नड़ भाषा के इस्तेमाल की इजाजत देने का अधिकार भी देता है, बशर्ते कि अंतिम आदेश अंग्रेजी में ही जारी किया जाए।
राज्य सरकार ने इस याचिका का विरोध करते हुए कहा कि न्यायाधिकरण के समक्ष सभी दलीलें (pleadings) अंग्रेजी में ही पेश की जानी चाहिएं।
उच्च न्यायालय ने 1986 के नियमों के नियम 3 और 1990 के नियमों के नियम 9(iii) की जांच की।
पीठ ने पाया कि नियम 3 पक्षों को कन्नड़ में दस्तावेज दाखिल करने की छूट देता है और न्यायाधिकरण को कार्यवाही के दौरान कन्नड़ के इस्तेमाल की अनुमति देने का अधिकार देता है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि अंतिम आदेश अंग्रेजी में ही होना चाहिए।
अदालत ने 1990 के नियमों के नियम 9(iii) का भी जिक्र किया, जिसके अनुसार न्यायाधिकरण के समक्ष पेश की जाने वाली सभी दलीलें, हलफनामे, ज्ञापन, दस्तावेजों की सूची और अन्य दस्तावेज अंग्रेजी या कन्नड़ भाषा में टाइप किए हुए होने चाहिए।
अदालत ने कहा, "इस प्रकार, याचिकाकर्ता ने 1990 के नियमों के नियम 9 के खंड (iii) के अनुसार, अपनी याचिका कन्नड़ भाषा में दाखिल करके बिल्कुल सही किया है।"
पीठ ने माना कि याचिकाकर्ता की अर्जी खारिज करते समय न्यायाधिकरण ने 1990 के नियमों के संबंधित प्रावधान पर ध्यान नहीं दिया।
अदालत ने टिप्पणी की, "न्यायाधिकरण ने इस बुनियादी पहलू पर ठीक से विचार नहीं किया और विवादित आदेश पारित करने में गलती की।"
इसके बाद, उच्च न्यायालय ने याचिका स्वीकार कर ली, न्यायाधिकरण के आदेश को रद्द कर दिया, याचिकाकर्ता की अंतरिम अर्जी (जिसमें कन्नड़ में दलीलें दाखिल करने की अनुमति मांगी गई थी) को मंजूर कर लिया और मूल याचिका को बहाल कर दिया।
न्यायाधिकरण को निर्देश दिया गया कि वह कानून के अनुसार मूल याचिका का निपटारा करे।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शंकर कट्टीमनी पेश हुए।
[फैसला पढ़ें]
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Litigants can file applications in Kannada before Administrative Tribunal: Karnataka High Court