MP हाईकोर्ट ने हत्या के मामले में 'गौ रक्षकों' को दोषी ठहराने के बाद जज तबस्सुम खान को पुलिस सुरक्षा देने का आदेश दिया

अदालत ने कहा न्यायिक अधिकारी को दी जाने वाली धमकियां सीधे तौर पर न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर करती है। साथ ही अदालत ने इस मामले मे उठाए गए कदमो के बारे मे DGP और गृह विभाग से व्यक्तिगत हलफनामे भी मांगे
Madhya Pradesh High Court, Jabalpur Bench
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मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 1 जुलाई को एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज तबस्सुम खान को मिल रही धमकियों का स्वतः संज्ञान लिया। जज खान ने मवेशियों की तस्करी के आरोप में एक ट्रक ड्राइवर की पीट-पीटकर हत्या (लिंचिंग) करने के मामले में सात लोगों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी।

जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह की डिवीज़न बेंच ने यह भी आदेश दिया कि जज को तुरंत पुलिस सुरक्षा दी जाए।

कोर्ट ने कहा, "अंतरिम उपाय के तौर पर, हम निर्देश देते हैं कि हमारी न्यायिक अधिकारी, यानी श्रीमती तबस्सुम खान (जो सिवनीमालवा में एडिशनल जज और नर्मदापुरम, MP में एडिशनल सेशन जज हैं) को नर्मदापुरम के पुलिस अधीक्षक (SP) द्वारा सुरक्षा प्रदान की जाए।"

Justice Vivek Agarwal and Justice Avanindra Kumar Singh
Justice Vivek Agarwal and Justice Avanindra Kumar Singh

यह आदेश जज खान को निशाना बनाकर चलाए जा रहे लगातार कैंपेन के बीच आया है। उन्होंने 2022 में ट्रक ड्राइवर नज़ीर अहमद की पीट-पीटकर हत्या (लिंचिंग) के मामले में सात लोगों को दोषी ठहराया था और उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी। नज़ीर अहमद पर मवेशियों की तस्करी का आरोप लगाकर भीड़ ने हमला किया था।

12 जून के फ़ैसले के बाद, जज खान को जान से मारने की धमकियां मिलीं, सांप्रदायिक गालियां दी गईं, उनके ख़िलाफ़ गलत जानकारी फैलाई गई और सोशल मीडिया पर उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए क्योंकि उनकी धार्मिक पहचान अलग थी।

इसके बाद मध्य प्रदेश पुलिस ने धमकियों और ऑनलाइन दुर्व्यवहार को लेकर अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ FIR दर्ज की।

हाईकोर्ट ने मध्य प्रदेश में न्यायिक अधिकारियों से जुड़े 2016 के एक स्वतः संज्ञान (suo motu) मामले की सुनवाई के दौरान इस मामले पर ध्यान दिया।

कोर्ट ने कहा, "हाईकोर्ट के वकील और मीडिया रिपोर्टों से हमारे ध्यान में यह बात आई है कि नर्मदापुरम में एक न्यायिक अधिकारी को समाज के कुछ लोगों द्वारा लगातार धमकियां दी जा रही हैं, क्योंकि उन्होंने एक पक्ष के ख़िलाफ़ आदेश पारित किया था। यह एक गंभीर मामला है।"

कोर्ट ने माना कि जज खान को मिल रही धमकियां सीधे तौर पर न्यायिक अधिकारियों की आज़ादी से जुड़ी हैं।

"हमारी राय है कि ऐसी गतिविधियां हमारे न्यायिक अधिकारियों की न्यायिक आज़ादी और निडर होकर काम करने की क्षमता में सीधे तौर पर बाधा डालती हैं।"

कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि न्यायिक आदेशों को केवल अपील या पुनरीक्षण (revision) जैसे कानूनी तरीकों से ही चुनौती दी जा सकती है।

कोर्ट ने कहा, "हमारे न्यायिक अधिकारी को सिर्फ़ इसलिए धमकाया नहीं जा सकता कि उन्होंने कोई खास आदेश पारित किया है और वह आदेश समाज के किसी खास वर्ग को पसंद नहीं आया।"

सुनवाई के दौरान, राज्य ने कोर्ट को बताया कि जज खान को पहले ही पुलिस सुरक्षा दी जा चुकी है। हालांकि, बेंच ने नर्मदापुरम के पुलिस अधीक्षक (SP) को एक हलफ़नामा दायर करने का निर्देश दिया, जिसमें उन लोगों के ख़िलाफ़ की गई कार्रवाई का विवरण हो जिन्होंने कथित तौर पर न्यायिक अधिकारी को धमकाया था।

कोर्ट ने राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) और अतिरिक्त मुख्य सचिव/प्रधान सचिव (गृह) से भी उन लोगों के ख़िलाफ़ उठाए गए कदमों पर व्यक्तिगत हलफ़नामे मांगे जो डराने-धमकाने के लिए ज़िम्मेदार थे।

मामले की अगली सुनवाई 9 जुलाई को होगी।

याचिकाकर्ता की ओर से वकील ब्रजेश नाथ मिश्रा पेश हुए।

राज्य का प्रतिनिधित्व अतिरिक्त महाधिवक्ता जान्हवी पंडित और उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी ने किया।

हस्तक्षेपकर्ता की ओर से वकील रोहन हरने पेश हुए।

[आदेश पढ़ें]

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MP High Court orders police protection for judge Tabassum Khan after threats over convicting cow vigilantes for murder

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