ओडिशा हाईकोर्ट ने ऑटिस्टिक बेटे की देखभाल के लिए इस्तीफ़ा देने वाले जज को बहाल किया

कोर्ट ने यह भी पाया कि जज ने सक्षम अधिकारी द्वारा औपचारिक रूप से स्वीकार किए जाने से पहले ही अपना इस्तीफ़ा वापस ले लिया था, और उन्हें बिना बकाया वेतन के बहाल करने का निर्देश दिया।
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ओडिशा हाईकोर्ट ने हाल ही में एक न्यायिक अधिकारी को फिर से नौकरी पर बहाल किया है, जिन्होंने अपने ऑटिस्टिक बेटे की मेडिकल ज़रूरतों और पोस्टिंग वाली जगह पर इलाज की पर्याप्त सुविधाओं की कमी का हवाला देते हुए नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया था।

जस्टिस मानस रंजन पाठक और जस्टिस सिबो शंकर मिश्रा की डिवीज़न बेंच ने कहा कि उनका इस्तीफ़ा लागू नहीं हो सकता था क्योंकि उन्होंने इसे तब वापस ले लिया था, जब गवर्नर (नियुक्ति करने वाले सक्षम अधिकारी) ने इसे औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया था।

10 सितंबर के फ़ैसले में, कोर्ट ने यह भी कहा कि जज का इस्तीफ़ा अपनी मर्ज़ी से नहीं दिया गया था। कोर्ट ने पाया कि इस्तीफ़ा उनके बेटे की मेडिकल स्थिति और ज़रूरतों के कारण बनी मजबूरियों की वजह से दिया गया था।

कोर्ट ने आगे कहा, "असल ज़िंदगी की स्थितियाँ जटिल होती हैं और हर कोई अपनी लड़ाइयाँ अपने-अपने अनोखे तरीक़ों से लड़ता है। उनके आस-पास के नेक इरादे वाले लोगों की बातों से उनके मन में जो विचार और दुविधाएँ आईं, और साथ ही निकट भविष्य में सम्मान और अच्छी सैलरी वाली वैसी नौकरी न मिल पाने की आशंका—जिससे उनके गुज़ारे और बच्चे की देखभाल करने की क्षमता पर असर पड़ सकता था—इन सब वजहों से इस्तीफ़ा वापस लेने का फ़ैसला वही था जो कोई भी समझदार और विवेकशील व्यक्ति करता।"

Justice Manash Ranjan Pathak and Justice Sibo Sankar Mishra (Orissa High Court)
Justice Manash Ranjan Pathak and Justice Sibo Sankar Mishra (Orissa High Court)

यह मामला एक एडिशनल सिविल जज (जूनियर डिवीज़न)-सह-सब-डिवीज़नल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (जज) से जुड़ा है, जिनकी पोस्टिंग जुलाई 2022 में ढेंकनाल ज़िले के हिंडोल में हुई थी।

उनके बेटे को ऑटिज़्म और स्वास्थ्य से जुड़ी अन्य समस्याएं थीं, जिनके लिए लंबे समय तक इलाज, रिहैबिलिटेशन और लगातार थेरेपी की ज़रूरत थी। कोर्ट ने पाया कि हिंडोल, ढेंकनाल और आस-पास के इलाकों में इलाज की पर्याप्त सुविधाएं और ट्रेंड थेरेपिस्ट उपलब्ध नहीं थे।

जज ने पहले भुवनेश्वर में पोस्टिंग की मांग की थी ताकि वह अपने बेटे का इलाज जारी रख सकें। 5 सितंबर 2022 को दी गई उनकी अर्ज़ी पर अक्टूबर 2022 में हाईकोर्ट की स्टैंडिंग कमिटी ने विचार किया था। हालांकि, बाद में इसे टाल दिया गया और इस पर कभी अंतिम रूप से विचार नहीं किया गया या उन्हें इसकी जानकारी नहीं दी गई।

इसके बाद, 29 नवंबर 2022 को उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया। उन्होंने कहा कि वह हिंडोल में अपने बेटे को ज़रूरी इलाज और थेरेपी नहीं दे पा रही थीं।

20 दिसंबर को फुल कोर्ट ने इस्तीफ़ा स्वीकार करने और मंज़ूरी के लिए इसे राज्य सरकार को भेजने का फ़ैसला किया।

हालांकि, अगले ही दिन यानी 21 दिसंबर को जज ने अपना इस्तीफ़ा वापस ले लिया। उन्होंने अपने बेटे का इलाज करने वाले डॉक्टर से सलाह ली थी, जिन्होंने बताया था कि उसे लंबे समय तक इलाज और थेरेपी की ज़रूरत होगी।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि बेटे की ज़रूरी देखभाल और इलाज के लिए उन्हें नौकरी जारी रखने की ज़रूरत है। उसी दिन हाईकोर्ट को उनकी इस्तीफ़ा वापसी की अर्ज़ी मिल गई।

कोर्ट ने पाया कि 31 दिसंबर को गवर्नर द्वारा फुल कोर्ट की 20 दिसंबर की सिफ़ारिश को मंज़ूरी देने से पहले, इस्तीफ़ा वापस लेने की जानकारी राज्य सरकार और गवर्नर को नहीं दी गई थी।

इसके बाद राज्य सरकार ने 2 जनवरी 2023 को एक नोटिफ़िकेशन जारी किया, जिसमें उनका इस्तीफ़ा स्वीकार किया गया और उन्हें 3 जनवरी से नौकरी से रिलीज़ कर दिया गया।

तथ्यों पर गौर करते हुए, कोर्ट ने कहा कि फुल कोर्ट की सिफ़ारिश का मतलब सक्षम नियुक्ति प्राधिकारी द्वारा मंज़ूरी नहीं था।

लागू सेवा नियमों के तहत, इस्तीफ़ा तभी प्रभावी होता है जब सक्षम प्राधिकारी उसे औपचारिक रूप से स्वीकार करे। चूंकि जज ने ऐसी मंज़ूरी से पहले ही 21 दिसंबर को इस्तीफ़ा वापस ले लिया था, इसलिए स्वीकार करने के लिए कोई वैध इस्तीफ़ा नहीं बचा था।

कोर्ट ने कहा, "स्वीकृति के लिए सक्षम अधिकारी के पास इस्तीफ़े का कोई वैध पत्र नहीं था, इसलिए स्वीकृति पत्र अमान्य है और इसे नौकरी खत्म करने का आधार नहीं माना जा सकता... यह उनकी गलती नहीं है कि इस्तीफ़े के आवेदन पर जितनी तेज़ी से कार्रवाई की गई, उतनी तेज़ी से समय पर वापस लेने के उनके आवेदन पर संबंधित अधिकारी ने कार्रवाई नहीं की।"

कोर्ट ने यह भी माना कि जिन हालात में इस्तीफ़ा दिया गया था, उन्हें देखते हुए इसे अपनी मर्ज़ी से दिया गया इस्तीफ़ा नहीं माना जा सकता।

इसलिए, कोर्ट ने राज्य सरकार के 2 जनवरी, 2023 के नोटिफ़िकेशन को रद्द कर दिया और अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे जज को तुरंत एडिशनल सिविल जज (जूनियर डिवीज़न)-सह-SDJM के पद पर बहाल करें।

हालांकि, कोर्ट ने साफ़ किया कि उन्हें पिछली सैलरी (बैक वेजेज़) तो नहीं मिलेगी, लेकिन 3 जनवरी, 2023 से उनकी सर्विस की निरंतरता (continuity of service) और सर्विस से जुड़े अन्य लाभ उन्हें मिलेंगे।

याचिकाकर्ता जज की ओर से वकील मनोज कुमार खुंटिया पेश हुए।

ओडिशा राज्य की ओर से एडिशनल गवर्नमेंट एडवोकेट (AGA) देबराज मोहंती पेश हुए।

ओडिशा हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से सीनियर एडवोकेट गौतम मिश्रा और वकील संग्राम जेना पेश हुए।

[फ़ैसला पढ़ें]

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