

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह एक बच्चे को वापस भारत लाने के लिए तत्काल कदम उठाए। बच्चे को उसकी रूसी माँ रूस ले गई थी, जबकि इससे पहले ही उसे कोर्ट की कस्टडी में रखा गया था [विक्टोरिया बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य]।
3 नवंबर को पारित एक आदेश में, जस्टिस दीपांकर दत्ता और शील नागू की खंडपीठ ने बच्चे की मां, रूसी नागरिक विक्टोरिया बसु के आचरण पर गंभीर आपत्ति जताई, जो कथित तौर पर अपने छोटे बेटे के साथ नेपाल के रास्ते भारत छोड़कर रूस चली गई थी।
पीठ ने कहा कि अदालत की गरिमा दांव पर है और मां को कार्यवाही के दौरान दिखाई गई उदारता का फायदा उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
कोर्ट ने मौखिक रूप से टिप्पणी की, "हम इसे छोड़ने वाले नहीं हैं। हमारी गरिमा दांव पर है। बच्चे को अपने संरक्षण में लेने के बाद, मां रूसी दूतावास की मदद से नेपाल के रास्ते चली गई। हमें लगता है कि रूसी संघ को इसके बारे में पता है। आपको (केंद्र) को इसके पीछे अपना पूरा जोर लगाना होगा।"
यह मामला विक्टोरिया बसु और उनके पति सैकत बसु (जिनसे वे अलग रह रही हैं) के बीच उनके 6 साल के बेटे की कस्टडी को लेकर हुए विवाद से जुड़ा है।
रूस की नागरिक विक्टोरिया, जो 2019 से भारत में रह रही थीं, ने 2023 में संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) रिट की मांग की, ताकि उनके बेटे को पेश किया जा सके और उन्हें बच्चे की कस्टडी मिल सके। उन्होंने आरोप लगाया कि अपने पति के साथ मतभेदों के कारण उन्हें अपने बेटे से मिलने नहीं दिया जा रहा था।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कई अंतरिम आदेश दिए, ताकि माता-पिता दोनों बच्चे से मिल सकें और बच्चे की कस्टडी साझा कर सकें। शुरुआत में, इस जोड़े को दिल्ली के बंगा भवन में अलग-अलग रहने की जगह दी गई और उनके मतभेदों को सुलझाने के लिए उन्हें मध्यस्थता (mediation) के लिए भी भेजा गया।
22 मई 2025 को, कोर्ट ने 'शेयर्ड कस्टडी' (साझा कस्टडी) की व्यवस्था तय की, जिसके तहत बच्चा हफ्ते में तीन दिन अपनी माँ के पास और बाकी चार दिन अपने पिता के पास रहेगा।
हालाँकि, 7 जुलाई 2025 को पिता ने कोर्ट को बताया कि माँ और बच्चा लापता हैं। दिल्ली पुलिस की जांच से पता चला कि विक्टोरिया दिल्ली से बिहार के नरकटियागंज गईं, फिर नेपाल में दाखिल हुईं और अंततः संयुक्त अरब अमीरात के शारजाह होते हुए रूस पहुँच गईं।
इन घटनाओं को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने 1 अगस्त 2025 को एक आदेश जारी कर स्पष्ट किया कि व्यावहारिक रूप से बच्चा कोर्ट की ही कस्टडी में है। कोर्ट ने कहा कि माता-पिता के बीच कस्टडी की व्यवस्था तय करते समय, उसने 'पेरेंस पैट्रिया' (parens patriae) के रूप में अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल किया है। यह एक कानूनी सिद्धांत है, जिसके तहत कोर्ट उन लोगों के संरक्षक (guardian) के रूप में काम करता है जो अपने हितों की रक्षा करने में असमर्थ होते हैं। इसलिए, कोर्ट ने विदेश मंत्रालय को निर्देश दिया कि वह मॉस्को में भारतीय दूतावास से कहे कि वे तुरंत विक्टोरिया और बच्चे से संपर्क करें।
माँ और बच्चे का पता लगाने के लिए कोर्ट के प्रयास आने वाले महीनों में भी जारी रहे। 26 सितंबर 2025 को यह जानकारी दी गई कि इंटरपोल ने विक्टोरिया के खिलाफ 'ब्लू कॉर्नर नोटिस' और बच्चे के नाम पर 'येलो कॉर्नर नोटिस' जारी किया है।
अदालत ने दिल्ली पुलिस को यह भी निर्देश दिया कि वे नेपाल के अधिकारियों और भारत में रूसी दूतावास के साथ इस मामले पर बात करें। साथ ही, कथित अपराध और अदालत की अवमानना में शामिल होने के संदेह वाले लोगों की कस्टडी (हिरासत) मांगी जाए। अदालत ने बताया कि मॉस्को में भारतीय दूतावास ने 18 और 22 सितंबर को रूस के अभियोजक जनरल (प्रॉसिक्यूटर जनरल) को पत्र लिखकर जांच में मदद मांगी थी, लेकिन उस समय तक कोई जवाब नहीं मिला था।
2026 में भी राजनयिक प्रयास जारी रहे। मामले की जटिलता को देखते हुए, बेंच ने सुझाव दिया कि एक अंतरिम उपाय के तौर पर, बच्चे और उसकी माँ को वीडियो कॉल के जरिए पिता से जोड़ा जा सकता है। इसमें उनकी पहचान गुप्त रखी जाएगी और उन्हें वापस भारत लाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। अदालत ने मॉस्को में भारतीय दूतावास से कहा कि वे रूसी अधिकारियों के सामने यह प्रस्ताव रखें। विदेश मंत्रालय को निर्देश दिया गया कि वे प्रश्नावली (सवाल-जवाब की सूची) और बातचीत के नतीजों को रिकॉर्ड पर लाएं।
इस बीच, साकेत अदालत में चल रही एक अलग आपराधिक कार्यवाही के दौरान, दिल्ली पुलिस ने 23 अक्टूबर को अदालत को बताया कि विक्टोरिया के खिलाफ 'रेड कॉर्नर नोटिस' जारी किया गया है। साथ ही, गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और मॉस्को में भारतीय दूतावास के जरिए उसे वापस लाने (प्रत्यर्पण) का औपचारिक अनुरोध भी भेजा गया है। यह पुलिस जांच का हिस्सा था, न कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया कोई निर्देश।
बाद में यह मामला जस्टिस दत्ता और जस्टिस नागू की बेंच के सामने आया, जिन्होंने बच्चे को वापस भारत लाने पर जोर दिया।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि माँ का इस तरह भाग जाना न्यायिक कार्यवाही का सीधा अपमान है।
और अधिक पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें