

छात्रों के विरोध-प्रदर्शन के बीच जंतर-मंतर के पास मोबाइल इंटरनेट सेवाएँ बंद करने के आदेशों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) को दिल्ली हाईकोर्ट से वापस ले लिया गया है।
यह घटनाक्रम भारत की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर हो रहे उन विरोध प्रदर्शनों के कुछ दिनों बाद हुआ है, जिन्हें तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद 25 जुलाई, शनिवार को खत्म कर दिया गया था।
सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर (SFLC) की ओर से दायर याचिका पर आज चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच के सामने सुनवाई होनी थी।
याचिका में केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा 17 जुलाई से 23 जुलाई के बीच जारी किए गए छह सस्पेंशन ऑर्डर (सेवाएं रोकने के आदेश) को रद्द करने की मांग की गई थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि ये आदेश असंवैधानिक हैं और संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन करते हैं। साथ ही, भविष्य में इंटरनेट सेवा रोकने के सभी आदेशों को सार्वजनिक करने का निर्देश देने की भी मांग की गई थी।
याचिका के अनुसार, MHA ने टेलीकम्युनिकेशंस एक्ट, 2023 की धारा 20(2)(b) और टेलीकम्युनिकेशंस (सेवाओं का अस्थायी निलंबन) नियम, 2024 के तहत जंतर-मंतर के 1.5 किलोमीटर के दायरे में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं रोकने का आदेश दिया था।
हालांकि, याचिका में कहा गया कि इन आदेशों में केवल "जन सुरक्षा" और "सार्वजनिक आपातकाल" जैसे कानूनी शब्दों का इस्तेमाल किया गया था, लेकिन इसके पीछे के ठोस कारण या यह नहीं बताया गया था कि इंटरनेट पूरी तरह बंद करना क्यों ज़रूरी था।
याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि अधिकारियों ने कम सख्ती वाले विकल्पों, जैसे सामान्य पुलिसिंग, भीड़ को नियंत्रित करने के उपाय या लक्षित कार्रवाई पर विचार नहीं किया। इसमें यह भी आरोप लगाया गया कि ये आदेश सस्पेंशन नियमों के तहत तय सक्षम अधिकारी के बजाय एक अंडर-सेक्रेटरी द्वारा जारी किए गए थे।
हालांकि, अब इस मामले को वापस ले लिया गया है।
याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्वेस पेश हुए थे। यह याचिका एडवोकेट जयंत मलिक और निशांत शोकीन के माध्यम से दायर की गई थी।
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PIL challenging internet shutdown around Jantar Mantar withdrawn from Delhi High Court