

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार, आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय (MOHUA) और ग्रामीण विकास मंत्रालय से एक याचिका पर जवाब मांगा है। इस याचिका में आवासीय इमारतों और हाउसिंग कॉम्प्लेक्स में दिव्यांग व्यक्तियों के लिए अनिवार्य पहुंच मानक (accessibility standards) लागू करने की मांग की गई है [प्रकाश नारायण अंधारे बनाम भारत संघ व अन्य]।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति अपारेश कुमार सिंह की एक पीठ, 82 वर्षीय व्हीलचेयर उपयोगकर्ता और सुगमता (एक्सेसिबिलिटी) कार्यकर्ता प्रकाश नारायण अंधारे द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रही थी।
अंधारे ने 'दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016' (RPwD एक्ट) के तहत सुगमता संबंधी आवश्यकताओं को लागू करने की मांग की है।
याचिका में तर्क दिया गया है कि इस अधिनियम की धारा 40 और 44 सुगमता को एक अनिवार्य आवश्यकता बनाती हैं। इसके अनुसार, जब तक निर्धारित सुगमता मानकों को पूरा नहीं किया जाता, तब तक किसी इमारत के लिए निर्माण अनुमति, पूर्णता प्रमाण पत्र (कंप्लीशन सर्टिफिकेट) या अधिभोग प्रमाण पत्र (ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट) नहीं दिया जा सकता।
याचिकाकर्ता के वकील ने आज अदालत में कहा, "यह अधिनियम बिल्कुल स्पष्ट है कि किसी भी प्रतिष्ठान को तब तक निर्माण प्रमाण पत्र या पूर्णता प्रमाण पत्र नहीं दिया जाना चाहिए, जब तक कि वह सुगमता के नियमों का पालन न करता हो।"
अदालत ने इस मामले में नोटिस जारी किया है, जिसका जवाब चार सप्ताह के भीतर देना होगा।
इस जनहित याचिका (PIL) में मांग की गई है कि देश भर में आवासीय निर्माण के लिए भवन नियमों और मंजूरी प्रक्रियाओं में 'एक्सेसिबिलिटी' (सुगम पहुंच) संबंधी जरूरतों को शामिल करने का निर्देश दिया जाए।
इसमें यह भी मांग की गई है कि जब तक एक्सेसिबिलिटी संबंधी जरूरतें पूरी न हो जाएं, तब तक किसी भी आवासीय इमारत के लिए 'भवन पूर्णता प्रमाण पत्र' (completion certificate) या उसमें रहने की अनुमति न दी जाए।
याचिका में कहा गया है कि देश भर में आवासीय इमारतों, अपार्टमेंट परिसरों और ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्ट्स का निर्माण और उनमें लोगों का रहना जारी है, जबकि इनमें एक्सेसिबिलिटी की उचित सुविधाएं नहीं हैं। याचिका के अनुसार, इस वजह से दिव्यांगजन (PwDs) अपने घरों का स्वतंत्र रूप से इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं।
इसमें कुछ ऐसी संरचनात्मक बाधाओं की ओर इशारा किया गया है, जैसे कि संकरे दरवाजे, ऐसे बाथरूम और शौचालय जहां तक पहुंचना मुश्किल हो, घर के अंदर फर्श के स्तर में अंतर, और चलने-फिरने के लिए अपर्याप्त जगह। इन बाधाओं के कारण व्हीलचेयर का इस्तेमाल करने वाले लोग अपने ही घरों में आसानी से आ-जा नहीं पाते हैं।
याचिका में कहा गया है, "ऐसी बाधाओं के कारण दिव्यांगजन नहाने, खाना पकाने, कमरों के बीच आने-जाने या अपने ही घर के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचने में असमर्थ हो जाते हैं। ये कोई मामूली असुविधाएं नहीं हैं; बल्कि ये इस बात का अंतर पैदा करती हैं कि कोई व्यक्ति अपने घर में रह सकता है या फिर वह अपने ही घर से बाहर रहने को मजबूर हो जाता है।"
इसमें आगे तर्क दिया गया है कि RPwD अधिनियम की धारा 2(x) के तहत, 'सार्वजनिक सुविधाओं और सेवाओं' की परिभाषा में स्पष्ट रूप से आवास (housing) को भी शामिल किया गया है।
याचिका में विभिन्न राज्यों के भवन नियमों में मौजूद अंतर को भी उजागर किया गया है। इसमें कहा गया है कि देश भर में आवासीय इमारतों के लिए एक्सेसिबिलिटी संबंधी नियम एक समान नहीं हैं।
याचिका में बताया गया है कि जहां केरल ने अपार्टमेंट इमारतों और आवासीय फ्लैटों के लिए भी एक्सेसिबिलिटी संबंधी नियमों को लागू किया है, वहीं महाराष्ट्र के 'यूनिफाइड डेवलपमेंट कंट्रोल एंड प्रमोशन रेगुलेशंस, 2020' में निजी और सार्वजनिक आवासों को एक्सेसिबिलिटी के दायरे से बाहर रखा गया है।
याचिका में कहा गया है, "दिव्यांगजनों के लिए आवास की सुलभता इस बात पर निर्भर हो गई है कि वे किस राज्य में रहते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि संसद द्वारा बनाए गए केंद्रीय कानून को अलग-अलग राज्यों में मनमाने और असंगत तरीके से लागू किया जा रहा है।"
याचिका में RPwD अधिनियम की धारा 37 की ओर भी ध्यान दिलाया गया है। इस धारा के तहत, विभिन्न आवास योजनाओं और विकास कार्यक्रमों के अंतर्गत दिव्यांगजनों के लिए 5 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है, जिसमें दिव्यांग महिलाओं को प्राथमिकता दी जाती है। यह 'प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी (PMAY-U) 2.0' के दिशा-निर्देशों पर आधारित है। इन दिशा-निर्देशों के अनुसार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आवास परियोजनाओं में रैंप और अन्य ऐसी सुविधाएं देनी होंगी, ताकि वहां बिना किसी रुकावट के पहुंचा जा सके।
याचिका में कहा गया है कि अगर आवंटित किए गए घरों तक पहुंचना ही संभव न हो, तो दिव्यांग व्यक्तियों के लिए आवास आरक्षित करने का कोई खास मतलब नहीं रह जाता।|
याचिका में कहा गया है, "आज भारत में, किसी व्हीलचेयर उपयोगकर्ता को ऐसा घर आवंटित किया जा सकता है, जिसमें वह बिना किसी की मदद के न तो प्रवेश कर सकता है, न ही अंदर आ-जा सकता है और न ही उसका इस्तेमाल कर सकता है। ऐसी स्थिति सरकारी आवास योजनाओं के तहत दिव्यांग व्यक्तियों के लिए पांच प्रतिशत आवास आरक्षित करने के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देती है।"
यह याचिका 'राजीव रतूड़ी बनाम भारत संघ' मामले में सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2024 के फैसले का भी हवाला देती है। इस फैसले में कोर्ट ने 'RPwD अधिनियम' के तहत अनिवार्य और सख्ती से लागू होने वाले 'एक्सेसिबिलिटी' (पहुंच-योग्यता) मानकों की आवश्यकता पर जोर दिया था।
याचिकाकर्ता की ओर से वकील आशुतोष सेंगर, राहुल बजाज और सारा पेश हुए।
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Plea before Supreme Court flags lack of accessible homes for disabled persons