

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को फैसला सुनाया कि पुलिस आम तौर पर 'प्री-कन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक्स (प्रोहिबिशन ऑफ़ सेक्स सिलेक्शन) एक्ट, 1994' (PCPNDT एक्ट) के तहत भ्रूण के लिंग का पता लगाने से जुड़े अपराधों की जांच नहीं कर सकती [उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य बनाम बृज पाल सिंह और अन्य]।
जस्टिस संजय करोल और एनके सिंह की बेंच ने यह फ़ैसला सुनाया।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि जब भी ऐसे मामलों में शिकायत दर्ज करने के लिए एक्ट के तहत अधिकृत 'उचित प्राधिकरण' (AA) को ज़रूरत हो, तो पुलिस की भूमिका सीमित और सहायक हो सकती है।
कोर्ट ने कहा, "इस एक्ट के तहत पुलिस को जांचकर्ता की भूमिका नहीं निभानी है। जहां तक हो सके, पुलिस की मदद लेने से बचना चाहिए। नियमों के अनुसार, AA (उचित प्राधिकरण) की ज़रूरत पड़ने पर ही पुलिस सहायक भूमिका निभाएगी।"
इसलिए, कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की इस राय से सहमति जताई कि पुलिस PCPNDT एक्ट के तहत उल्लंघनों की जांच नहीं कर सकती और न ही FIR दर्ज कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह एक्ट ऐसे तकनीकी मामलों से जुड़ा है जिनमें मेडिकल जानकारी और संवेदनशीलता की ज़रूरत हो सकती है। कोर्ट ने माना कि इससे पता चलता है कि एक्ट में बताए गए अपराधों की मुख्य जांच करने का काम पुलिस का नहीं है।
कोर्ट ने आगे कहा, "यह बात इस तथ्य से और भी साफ़ हो जाती है कि एक बार FIR दर्ज होने (पुलिस कार्रवाई) के बाद, इस एक्ट की प्रक्रियाओं के अनुसार उसे तार्किक निष्कर्ष तक नहीं पहुँचाया जा सकता। यह रोक केवल इस एक्ट के तहत अपराधों पर लागू होती है और मुख्य आपराधिक कानून में बताए गए स्वतंत्र अपराधों की जांच करने या उन पर मुकदमा चलाने की पुलिस की शक्ति को सीमित नहीं करती है।"
कोर्ट ने यह भी देखा कि सेक्शन 17(4) के तहत AA (उचित प्राधिकरण) के कार्यों में स्पष्ट रूप से एक्ट के तहत अपराधों के संबंध में शिकायत दर्ज करने और उनकी जांच करने की ज़िम्मेदारी शामिल है।
कोर्ट ने आगे पाया कि संबंधित नियमों में भी पुलिस की कार्रवाई से जहाँ तक संभव हो बचने की बात कही गई है। इसलिए, पुलिस मुख्य जांच प्राधिकरण नहीं हो सकती और केवल तभी सहायक भूमिका निभा सकती है जब AA को इसके प्रावधानों के तहत इसकी आवश्यकता हो।
इसके अलावा, कोर्ट ने देखा कि एक्ट का सेक्शन 28 मजिस्ट्रेटों को PCPNDT एक्ट के अपराधों का संज्ञान लेने से रोकता है, जब तक कि AA या किसी "व्यक्ति" (जिसमें कोई सामाजिक संगठन भी शामिल हो सकता है) द्वारा शिकायत न की जाए। ऐसे मामलों में FIR दर्ज करने के लिए पुलिस को अधिकृत करने का कोई ज़िक्र नहीं है। इससे भी कोर्ट इस नतीजे पर पहुँचा कि इस एक्ट के तहत अपराधों की जांच पुलिस से अपेक्षित नहीं है।
कोर्ट ने कहा, "एक्ट का सेक्शन 28 संज्ञान लेने पर पूरी तरह से कानूनी रोक लगाता है, सिवाय उन स्थितियों और मामलों के जो इसमें बताए गए हैं। इसका जवाब स्पष्ट होना चाहिए - एक सक्षम मजिस्ट्रेट अंतिम चार्जशीट के आधार पर संज्ञान नहीं ले सकेगा। और संदर्भ का उत्तर इसी के अनुसार दिया जाता है।"
यह मामला इस सवाल से जुड़ा था कि क्या PCPNDT एक्ट के तहत अपराधों के लिए पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज करना जायज़ है, सिर्फ़ इसलिए कि इन अपराधों को संज्ञेय (cognizable) और गैर-ज़मानती (non-bailable) माना गया है। यह सवाल तब उठा जब एक डॉक्टर ने 2017 में उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
उन पर PCPNDT एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था। आरोप था कि वे गैर-कानूनी तरीके से भ्रूण के लिंग की पहचान कर रहे थे ताकि जोड़े लड़कियों के जन्म को रोक सकें।
डॉक्टर के वकील ने तर्क दिया कि PCPNDT एक्ट के उल्लंघन के लिए उनके खिलाफ कोई FIR दर्ज नहीं की जा सकती थी, क्योंकि ऐसे मामलों में केवल PCPNDT एक्ट की धारा 28 के तहत 'उचित प्राधिकरण' (AA) ही शिकायत दर्ज करा सकता है, न कि FIR। इस मामले में, डॉक्टर ने तर्क दिया कि FIR तहसीलदार ने दर्ज कराई थी, जिन्हें 'उचित प्राधिकरण' नहीं माना जा सकता।
दूसरी ओर, राज्य ने तर्क दिया कि PCPNDT एक्ट के तहत अपराधों के लिए FIR दर्ज करने और पुलिस द्वारा जांच करने पर कोई रोक नहीं है। राज्य का कहना था कि ज़िला मजिस्ट्रेट ने तहसीलदार को शिकायत दर्ज करने के लिए अधिकृत किया था, जो PCPNDT एक्ट की धारा 28 का पूरी तरह से पालन था।
2024 में, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि PCPNDT एक्ट एक विशेष कानून है और यह अपने आप में एक पूरा कोड है जिसमें जांच, तलाशी और ज़ब्ती तथा शिकायत दर्ज करने से संबंधित सभी ज़रूरी प्रावधान शामिल हैं, और ये काम केवल एक्ट के तहत "उचित अधिकारी" (appropriate authority) द्वारा ही किए जा सकते हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों की तकनीकी प्रकृति को देखते हुए, इस एक्ट और इसके नियमों के तहत पुलिस की भागीदारी को सही नहीं माना जाता है।
हाईकोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि कोई भी मजिस्ट्रेट पुलिस रिपोर्ट के आधार पर PCPNDT एक्ट के तहत अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता है और ऐसा केवल तभी किया जा सकता है जब किसी अधिकृत व्यक्ति द्वारा शिकायत की जाए। इसलिए, कोर्ट ने आरोपी डॉक्टर के खिलाफ पुलिस द्वारा शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने आज हाईकोर्ट के इस विचार से सहमति जताई कि पुलिस PCPNDT एक्ट के तहत अपराधों की जांच नहीं कर सकती है।
हालांकि, कोर्ट ने कुछ पहलुओं पर नए सिरे से निर्णय लेने के लिए मामले को वापस हाई कोर्ट भेज दिया है।
फैसले की विस्तृत प्रति का इंतज़ार है।
और अधिक पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें
Police cannot investigate sex determination offences under PCPNDT Act: Supreme Court