

पटना हाई कोर्ट ने हाल ही में पुलिस की आलोचना की है। कोर्ट ने कहा कि जब कोडीन युक्त कफ सिरप जब्त किए जाते हैं, तो पुलिस अक्सर नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) एक्ट के तहत मामले दर्ज कर देती है, जबकि ये दवाएं केंद्र सरकार द्वारा तय की गई स्वीकार्य मात्रा की सीमा के भीतर ही होती हैं [भारत कुमार बनाम बिहार राज्य]।
न्यायमूर्ति अशोक कुमार पांडे ने ऐसे मामलों में सख्त NDPS एक्ट लागू करने को अजीब बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों को केवल 'ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट' के तहत ही देखा जाना चाहिए।
अदालत ने कहा, "कोडीन युक्त कफ सिरप केवल 'शेड्यूल H' की दवा है। इसके लिए दुकानदार को एक रजिस्टर रखना होता है और उसके पास लाइसेंस होना जरूरी है। ऐसे मामलों को 'ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट' के तहत दर्ज किया जाना चाहिए। यह केवल 'ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट' का उल्लंघन है, जबकि पुलिस लगातार इस प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल कर रही है।"
अदालत ने यह टिप्पणी भरत कुमार की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान की। कुमार को मई 2026 में NDPS मामले में गिरफ्तार किया गया था। बिहार के खगड़िया जिले में एक पिक-अप वैन से 484 लीटर कोडीन-युक्त कफ सिरप बरामद हुआ था।
कुमार का कहना था कि वह केवल गाड़ी के पास खड़ा था और उसका उस गाड़ी या जब्त किए गए कफ सिरप से कोई लेना-देना नहीं था।
उनके वकील ने आगे तर्क दिया कि उनके पास से कोई प्रतिबंधित सामग्री बरामद नहीं हुई है, उनका कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, और इसी तरह के मामले में एक अन्य सह-आरोपी को पहले ही जमानत मिल चुकी है।
उनके वकील ने 14 नवंबर 1985 की केंद्र सरकार की एक अधिसूचना का भी हवाला दिया, जिसके तहत कोडीन वाले कुछ उत्पादों को NDPS अधिनियम के तहत 'निर्मित नशीले पदार्थों' (manufactured drugs) की परिभाषा से बाहर रखा गया है।
यह छूट उन उत्पादों पर लागू होती है जिनमें प्रति खुराक इकाई 100 मिलीग्राम से अधिक कोडीन न हो और सांद्रता (concentration) 2.5 प्रतिशत से अधिक न हो, बशर्ते अन्य निर्धारित शर्तें—जैसे कि उनका स्थापित चिकित्सीय उपयोग—पूरी होती हों।
वहीं, राज्य सरकार ने जमानत याचिका का विरोध किया। उन्होंने 'हीरा सिंह बनाम भारत संघ' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि नशीले पदार्थ वाले मिश्रण का कुल वजन यह तय करने के लिए माना जाना चाहिए कि जब्त की गई मात्रा 'व्यावसायिक मात्रा' (commercial quantity) की श्रेणी में आती है या नहीं।
NDPS अधिनियम की धारा 37 के तहत, यदि जब्त की गई सामग्री व्यावसायिक मात्रा में है, तो जमानत तब तक नहीं दी जा सकती जब तक कि अदालत को यह विश्वास न हो जाए कि आरोपी अपराध का दोषी नहीं है और जमानत पर रहने के दौरान उसके द्वारा कोई और अपराध करने की संभावना नहीं है।
हालांकि, अदालत ने कहा कि यदि कोई उत्पाद खुद ही 'नशीले पदार्थ' की श्रेणी में नहीं आता है, तो यह सवाल ही नहीं उठता कि जब्त की गई सामग्री व्यावसायिक मात्रा में है या नहीं।
इस संबंध में, अदालत ने जमानत याचिकाकर्ता के इस तर्क पर भी ध्यान दिया कि इस मामले में जब्त किए गए कफ सिरप में 2.5 प्रतिशत से कम कोडीन था। इसका मतलब यह है कि इस मामले पर केवल 'ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट' लागू होता है, न कि NDPS अधिनियम।
इसके बाद अदालत ने कुमार को जमानत दे दी।
अदालत ने अपने 1 अक्टूबर के आदेश में आगे कहा, "यह बहुत अजीब बात है कि जिन मामलों में कोडीन युक्त कफ सिरप बरामद होते हैं, उनमें पुलिस हमेशा NDPS एक्ट के तहत मामला दर्ज कर रही है। जबकि केंद्र सरकार की अधिसूचना (ऊपर उल्लिखित) के अनुसार, यदि कोडीन की मात्रा 2.5% से कम है, तो वह प्रतिबंधित सामग्री (कॉन्ट्राबैंड) के दायरे में नहीं आती है।"
जमानत आवेदक की ओर से वकील विजय किशोर भारती पेश हुए।
राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक सुरेंद्र प्रसाद सिंह पेश हुए।
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Police misusing NDPS Act in cases involving codeine cough syrup: Patna High Court