

दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में कहा है कि ईमेल सेवाएँ देना एक कमर्शियल गतिविधि है और यह किसी सार्वजनिक काम को पूरा करने जैसा नहीं है, भले ही ऐसी सेवाओं का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता हो या वे किसी बिज़नेस के लिए ज़रूरी हों [जनता लाइव प्रेस नेटवर्क बनाम गूगल LLC]।
जस्टिस अमित महाजन ने एक मीडिया कंपनी की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। कंपनी ने अपना Gmail अकाउंट बहाल करने की मांग की थी, जिसे कथित तौर पर हैक कर लिया गया था और बाद में Google ने बंद कर दिया था।
कोर्ट ने कहा कि किसी प्राइवेट कंपनी द्वारा ईमेल सर्विस देना - जिसमें सुरक्षा कारणों से अकाउंट सस्पेंड करना भी शामिल है - आम तौर पर 'पब्लिक फंक्शन' (सार्वजनिक कार्य) नहीं माना जाता है, जिसके आधार पर उसके खिलाफ रिट याचिका दायर की जा सके।
कोर्ट ने कहा, "किसी यूजर के लिए किसी खास अकाउंट का महत्व या उसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने का मतलब यह नहीं है कि वह 'पब्लिक फंक्शन' बन जाता है। इसलिए, अहम बात यह है कि काम की प्रकृति क्या है, न कि संबंधित कंपनी का आकार या पहुंच कितनी है।"
यह विवाद तब शुरू हुआ जब 'जनता लाइव प्रेस नेटवर्क प्राइवेट लिमिटेड' - जो 'जनता लाइव न्यूज़' नाम से मीडिया का काम करती है और जिसका एक YouTube न्यूज़ चैनल भी है - का अपने Gmail अकाउंट का एक्सेस कथित तौर पर खत्म हो गया।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, 20 जुलाई, 2026 को तीसरे पक्ष (थर्ड पार्टी) ने बिना इजाजत के अकाउंट का एक्सेस हासिल कर लिया था। इसके बाद Google ने असामान्य गतिविधि का हवाला देते हुए अकाउंट बंद कर दिया।
कंपनी के डायरेक्टर ने अपने पर्सनल ईमेल एड्रेस से Google की सपोर्ट टीम से संपर्क किया, हालात बताए और एक्सेस बहाल करने का अनुरोध किया। हालांकि, उन्हें कथित तौर पर कोई जवाब नहीं मिला।
याचिकाकर्ताओं ने साइबर पुलिस स्टेशन में भी शिकायत दर्ज कराई। अकाउंट का एक्सेस न मिल पाने के कारण, उन्होंने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और Google को निर्देश देने की मांग की कि वह उनके ओरिजिनल रिकवरी क्रेडेंशियल्स की जांच करे और एक्सेस बहाल करे।
उन्होंने तर्क दिया कि भले ही Google एक प्राइवेट कंपनी है, लेकिन उसके खिलाफ रिट याचिका दायर की जा सकती है क्योंकि वह 'पब्लिक फंक्शन' करती है।
कोर्ट ने शिकायत की गंभीरता को माना, लेकिन यह स्पष्ट किया कि सवाल यह था कि क्या रिट कार्यवाही के जरिए राहत दी जा सकती है।
कोर्ट ने समझाया कि प्राइवेट कंपनियों के खिलाफ रिट याचिका तब दायर की जा सकती है जब वे राज्य की जिम्मेदारियों से जुड़े काम करती हैं या सार्वजनिक कर्तव्यों का पालन करती हैं।
हालांकि, सिर्फ डिजिटल सर्विस देना इस शर्त को पूरा नहीं करता है।
कोर्ट ने कहा, "ईमेल सर्विस देना प्राइवेट कंपनियों द्वारा किया जाने वाला एक कमर्शियल काम है। न तो ईमेल अकाउंट देना और न ही सुरक्षा कारणों से उसे सस्पेंड या बंद करना - अपने आप में - 'पब्लिक फंक्शन' या सार्वजनिक कर्तव्य का पालन माना जाता है।"
जस्टिस महाजन ने यह भी कहा कि कई स्वतंत्र प्रोवाइडर ईमेल सर्विस देते हैं और ऐसी सर्विस पर गूगल का एकाधिकार (monopoly) नहीं है।
इसके अनुसार, कोर्ट ने याचिका को सुनवाई के लायक न मानते हुए खारिज कर दिया, लेकिन याचिकाकर्ताओं को कानून के तहत उपलब्ध अन्य उपाय अपनाने की छूट दी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील आदिल शर्फ़ उद्दीन, दीपांशु झा और दिव्यांशु बिष्ट पेश हुए।
गूगल LLC की ओर से वकील ऐश्वर्या काने पेश हुईं।
दूसरे प्रतिवादी (respondent) की ओर से केंद्र सरकार के स्टैंडिंग काउंसेल नितिन्य चौधरी, वकील राहुल मौर्य और सरकारी वकील शुभम गोयल पेश हुए।
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Providing email services not a public function: Delhi High Court dismisses plea against Google