उच्चतम न्यायालय का अग्रिम जमानत के लिये गुजारा भत्ता देने की शर्त के खिलाफ याचिका पर विचार से इंकार

पटना उच्च न्यायालय ने अपीलकर्ता को अग्रिम जमानत देते हुये यह लगाई थी कि उसे अपनी पत्नी को 20,000 रूपए मासिक गुजारा भत्ता देना होगा।
उच्चतम न्यायालय का अग्रिम जमानत के लिये गुजारा भत्ता देने की शर्त के खिलाफ याचिका पर विचार से इंकार

उच्चतम न्यायालय ने अग्रिम जमानत के लिये अपनी पत्नी को गुजारा भत्ता देने की पटना उच्च न्यायालय के फैसले में लगाई गई शर्त को चुनौती देने वाली अपील पर शुक्रवार को विचार करने से इंकार कर दिया।

न्यायमूर्ति एनवी रमणा, न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति अनिरूद्ध बोस की पीठ ने अपीलकर्ता की अपील खारिज करते हुये कहा कि उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने की कोई वजह नजर नहीं आती।

‘‘रिकार्ड पर पेश सामग्री का ध्यानपूर्वक अवलोकन करने के बाद हमें उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश में हस्तक्षेप करने की कोई वजह नजर नहीं आती और अपीलकर्ता की विशेष अनुमति याचिका खारिज की जाती है।’’

इस मामले में अपीलकर्ता ने अपराध दंड प्रक्रिया की धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत मांगी थी। पटना उच्च न्यायालय ने यह देते हुये शर्त लगा दी थी कि वह अपनी पत्नी को हर महीने 20,000 रूपए देगा।

अपीलकर्ता ने जब इस आदेश में संशोधन का अनुरोध किया तो उच्च न्यायालय ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। इसके बाद अपीलकर्ता ने शीर्ष अदालत में विशेष अनुमति याचिका दायर की। इस याचिका में अपीलकर्ता ने क्या इस तरह की शर्त लगाना न्यायालय के अपराध दंड संहिता की धारा 438 में प्रदत्त शक्तियों ओर अधिकार क्षेत्र में है जैसे कई कानूनी सवाल उठाये थे।

याचिका में यह दलील दी गयी कि इस तरह की शर्त लगाना, जिसकी धारा 438 के अंतर्गत आवश्यक्ता नहीं है, अग्रिम जमानत के मकसद को ही निष्फल बनाता है। इस प्रावधान में अभियुक्त द्वारा जांच में सहयोग करने जैसी शर्ते शामिल हैं। याचिका में कहा गया है कि गुजारा भत्ता देने क शर्त अनुचित है और गुजारा भत्ते का सवाल सक्षम अधिकार क्षेत्र वाली अदालतों द्वारा फैसले के लिये छोड़ दिया जाना चाहिए था।

याचिका में कहा गया कि अग्रिम जमानत के मामले मं गुजारा भत्ते का भुगतान करने का आदेश त्रुटिपूर्ण, अनावश्यक और अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

याचिका में अपनी दलील के समर्थन में उच्चतम न्यायालय के फैसले उद्धृत किये गये जिनमें उच्च न्यायालय और सत्र अदालतों द्वारा धारा 438 के अंतर्गत अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुये ‘विचित्र किस्म की शर्ते’ लगाने के खिलाफ व्यवस्था दी गयी थी। याचिका में कहा गया,

‘‘दंड संहिता की धारा 438 के तहत अदालत में आने वाले आरोपी पर शर्त लगाते समय अदात को इन शर्तो के प्रति बहुत ही सावधानी बरतनी चाहिए और उन्हें अनावश्यक शर्ते लगाने के लिये अपने अधिकार क्षेत्र या अधिकारों के बाहर नहीं जाना चाहिए। इसमें संदेह नहीं किया जा सकता कि धारा 438 के अंतर्गत लगाई गई शर्ते कठोर , दुष्कर या ज्यादती वाली नहीं होनी चाहिए जिससे धारा 438 के अंतर्गत अग्रिम जमानत देने का उद्देश्य ही निष्फल हो जाये।’’

इसके अलावा, याचिका में यह भी दलील दी गयी थी कि उच्च न्यायालय में बहस करने वाले वकील ने गलती से मौखिक रूप से गुजारा भत्ते का यचिकाकर्ता द्वारा भुगतान करने की इच्छा व्यक्त की थी और उसे इस बारे में कोई निर्देश नहीं था। याचिका के अनुसार चूंकि अपीलकर्ता न्यायालय में उपस्थित नहीं था, गुजारा भत्ता देने के बारे में कथन पर उससे पुष्टि नहीं करायी जा सकी।

यही नहीं, याचिकाकर्ता ने इस बात को भी याचिका में रेखांकित किया कि उसकी पत्नी ने 2018 से ही गुजारा भत्ते के लिये कोई आवेदन दायर नही किया है। इस तथ्य के मद्देनजर याचिका में दलील दी गयी थी कि अग्रिम जमानत की कार्यवाही के दौरान पत्नी द्वारा गुजारा भत्ते के लिये तर्क को अनुमति नहीं दी जानी चाहिए थी।

उच्चतम न्यायालय को उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप की कोई वजह नजर नहीं आयी।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता वैभव चौधरी और एलजफीर अहमब बीएफ उपस्थित हुये।

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