

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को नई दिल्ली के खान मार्केट के पास सुजान सिंह पार्क फ्लैट्स से सरकारी अधिकारियों को बेदखल करने के आदेश को रद्द कर दिया [यूनियन ऑफ इंडिया बनाम श्री शोभा सिंह एंड संस]।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस पी.के. मिश्रा की बेंच ने केंद्र सरकार की 2022 में दायर उस अपील को मंज़ूरी दे दी, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के बेदखली की अनुमति देने वाले फ़ैसले को चुनौती दी गई थी।
दिल्ली हाईकोर्ट ने जनवरी 2020 में एडिशनल रेंट कंट्रोल ट्रिब्यूनल के उस फ़ैसले को सही ठहराया था, जिसमें केंद्र सरकार को निर्देश दिया गया था कि वह प्रतिवादियों - सर सोभा सिंह एंड संस प्राइवेट लिमिटेड - को बकाया किराया चुकाए।
आज, सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट इस मामले पर लागू नहीं होता है, और इसलिए रेंट कंट्रोलर किराए के बकाए के भुगतान से जुड़े मामले पर सुनवाई नहीं कर सकता था।
कोर्ट ने यह भी कहा कि गवर्नमेंट ग्रांट्स एक्ट, जो इस मामले पर लागू होता है, किराए का भुगतान न करने पर बेदखली का प्रावधान नहीं करता है।
जब 2022 में पहली बार यह मामला सुनवाई के लिए लिस्ट हुआ, तो केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया था कि सरकारी अधिकारियों को प्रॉपर्टी से निकालने के लिए बाउंसरों का इस्तेमाल किया गया था।
हाईकोर्ट के आदेश पर अप्रैल 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी।
सुजान सिंह पार्क के उत्तरी और दक्षिणी हिस्से में बने रिहायशी फ्लैट्स को 1944 में ही, एक 'परपेचुअल लीज़' (हमेशा के लिए पट्टे) के तहत, रियायती दरों पर सरकार को किराए पर दे दिया गया था।
कंपनी द्वारा बनाए गए कुल 84 फ्लैट्स में से, 13 फ्लैट्स, 41 सर्वेंट क्वार्टर और 26 गैराज केंद्र सरकार के कब्ज़े में थे।
केंद्र सरकार के मुताबिक, सरकार ने 1989 तक किराया चुकाया था, लेकिन उसके बाद, प्रतिवादी (respondent) द्वारा कई नियमों का उल्लंघन किए जाने के कारण, मुकदमों की एक लंबी सिलसिला शुरू हो गया।
1998 में, प्रतिवादी ने 'एडिशनल रेंट कंट्रोलर' के सामने बेदखली की अर्ज़ी दायर की, जिन्होंने प्रतिवादी के पक्ष में फैसला सुनाया। दिल्ली हाईकोर्ट तक की सभी अपीलें भी सरकार के खिलाफ ही तय हुईं, जिसके बाद यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट में अपील के तौर पर आया है।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने यह दलील दी कि 'ग्रांट्स एक्ट' (Grants Act) की धारा 3 के अनुसार, कोई भी सरकारी प्रॉपर्टी जिसे 'ग्रांट्स एक्ट' के प्रावधानों के तहत किसी व्यक्ति के पक्ष में 'ग्रांट' (अनुदान) के रूप में दिया गया हो, वह किसी भी अन्य कानून के दायरे से बाहर मानी जाएगी।
याचिका में कहा गया, "इसलिए, कोई भी ऐसा कानून जो 'सरकारी ग्रांट' की शर्तों के विपरीत हो, वह किसी खास व्यक्ति के पक्ष में दी गई सरकारी प्रॉपर्टी पर लागू नहीं होगा। अतः यह दलील दी जाती है कि 'ग्रांट्स एक्ट' के प्रावधान, किसी भी अन्य मौजूदा कानून पर, जो इसके विपरीत हो, भारी पड़ेंगे (यानी उन्हें प्राथमिकता मिलेगी)।"
इसलिए, यह दलील दी गई कि इस मौजूदा मामले में 'दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट' और 'संपत्ति अंतरण अधिनियम' (Transfer of Property Act) के प्रावधान लागू नहीं होंगे।
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