मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्रो मे कुपोषण से होने वाली मौतो पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा“बेहद गंभीर मामला”

CJI सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने वकील की ओर से यह बताए जाने के बाद नोटिस जारी किया कि गंभीर कुपोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण आदिवासी बच्चे रोज़ाना मर रहे हैं।
Forest Dwellers (Representative Image)
Forest Dwellers (Representative Image)
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार और संबंधित राज्यों को एक जनहित याचिका (PIL) पर नोटिस जारी किया। इस याचिका में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल इलाकों में बच्चों में गंभीर कुपोषण और रोकी जा सकने वाली बीमारियों के फैलने को लेकर चिंता जताई गई है [अजब लाल लिलहारे बनाम भारत संघ और अन्य]।

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने गंभीर कुपोषण और प्रशासनिक दखल की कमी के कारण आदिवासी बच्चों की रोज़ाना हो रही मौतों से जुड़ी दलीलें सुनने के बाद इस मामले को "बहुत गंभीर" बताया।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील वरुण ठाकुर ने बेंच के सामने कहा कि बुरी तरह प्रभावित ब्लॉक में रोज़ाना मौतें हो रही हैं, जहाँ आदिवासी आबादी के बीच कुपोषण बड़े पैमाने पर फैला हुआ है।

वकील ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अधिकारियों और चुने हुए प्रतिनिधियों को पहले ही जानकारी देने के बावजूद प्रशासन उदासीन बना रहा, जबकि खसरा-रूबेला और गंभीर तीव्र कुपोषण (SAM) के घातक मेल ने विशेष रूप से कमज़ोर आदिवासी समूहों (PVTGs) के दर्जनों बच्चों की जान ले ली।

CJI Surya Kant, Justice Joymalya Bagchi, Justice V Mohana
CJI Surya Kant, Justice Joymalya Bagchi, Justice V Mohana

ठाकुर ने पब्लिक हेल्थ सिस्टम में आई कमियों की ओर इशारा किया, जिनमें मेडिकल अधिकारियों की भारी कमी, टीकाकरण अभियान जो सिर्फ़ कागज़ों पर ही चल रहे थे, और आंगनवाड़ी केंद्रों से घर ले जाने वाले राशन और पोषण संबंधी सामान की सप्लाई पूरी तरह बंद होना शामिल है।

उन्होंने बेंच से डिस्ट्रिक्ट मिनरल फ़ाउंडेशन (DMF) फ़ंड के गलत इस्तेमाल और उसके इस्तेमाल न होने की जांच करने का भी आग्रह किया। ये फ़ंड कानूनी तौर पर माइनिंग से प्रभावित आदिवासी इलाकों में हेल्थकेयर, पीने के पानी और पोषण की कमी को दूर करने के लिए तय किए गए हैं।

बालाघाट के रहने वाले अजब लाल लिलहारे की याचिका में कहा गया है कि बच्चों की मौत का मौजूदा संकट आर्टिकल 14 और 21 के तहत मिली बुनियादी गारंटियों के साथ-साथ आर्टिकल 39(f) और 47 में दिए गए नीति-निर्देशों का उल्लंघन करता है।

याचिका में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि प्राइमरी हेल्थ सेंटर से दर्जनों किलोमीटर दूर बसे इलाके इमरजेंसी रेफरल सर्विस और मोबाइल हेल्थकेयर यूनिट से पूरी तरह कटे हुए हैं, जिससे हाशिए पर रहने वाले समुदायों को बिना क्वालिफिकेशन वाले डॉक्टरों के पास जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

याचिकाकर्ता ने मांग की है कि बुरी तरह प्रभावित इलाकों को 'एपिडेमिक डिज़ीज़ेज़ एक्ट, 1897' के तहत महामारी-संभावित क्षेत्र घोषित किया जाए, पीने के पानी और इमरजेंसी पोषण सहित तुरंत राहत सामग्री की सप्लाई पक्की की जाए, और 'धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान' जैसी आदिवासी कल्याण योजनाओं को पूरी तरह लागू करने का आदेश दिया जाए।

याचिका में मारे गए आदिवासी बच्चों के परिवारों के लिए जवाबदेही तय करने के स्वतंत्र उपाय और कानूनी मुआवज़े की भी मांग की गई है।

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Very serious: Supreme Court on malnutrition deaths in tribal areas of MP, Chhattisgarh, Maharashtra

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