क्या जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल से डी-नोटिफाई करने के लिए हमारे आदेश का हवाला दिया गया? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा

दिल्ली पुलिस ने 13 अक्टूबर को दिल्ली उच्च न्यायालय को बताया कि यह फैसला 9 अक्टूबर के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के आधार पर लिया गया था; आज केंद्र सरकार ने इससे इनकार कर दिया।
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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार से उस याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा दिल्ली के जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन स्थल के रूप में दी गई मान्यता वापस लेने के फैसले को चुनौती दी गई है।

गौरतलब है कि 13 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने दिल्ली हाई कोर्ट को बताया था कि यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर के आदेश के आधार पर लिया गया था। हालांकि, केंद्र सरकार ने आज इस बात से इनकार कर दिया।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने केंद्र से सवाल किया,

"क्या इसे (जगह को) कोर्ट की कुछ मौखिक टिप्पणियों की वजह से डी-नोटिफाई किया गया, या फिर इस जगह और एक साझा विरोध स्थल के रूप में इसके उपयुक्त होने को लेकर कोई सोच-विचार किया गया था?"

CJI Surya Kant and Justice Joymalya Bagchi
CJI Surya Kant and Justice Joymalya Bagchi

केंद्र की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जवाब दिया,

"अदालत का फैसला इस निर्णय का आधार नहीं है। समिति का गठन बहुत पहले ही कर दिया गया था। समिति ने एक विस्तृत रिपोर्ट दी है।"

SG Tushar Mehta
SG Tushar Mehta

याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा,

"...हम आज ही यह मांग कर रहे हैं कि जंतर-मंतर को फिर से अधिसूचित (नोटिफाई) किया जाए। इसे कथित तौर पर अदालत के निर्देश पर ही डीनोटिफाई (अधिसूचना रद्द) किया गया है। ऐसा लगता है कि 9 अक्टूबर को एक निर्देश दिया गया था कि जंतर-मंतर को डीनोटिफाई कर दिया जाए।"

अदालत ने जवाब दिया,

"आपने इस डीनोटिफिकेशन को चुनौती दी है। हम नोटिस जारी कर रहे हैं। उन्हें आने दीजिए और अपना जवाब दाखिल करने दीजिए। हम देखेंगे कि इसके पीछे क्या कारण हैं।"

Gopal Sankaranarayanan, Senior Advocate
Gopal Sankaranarayanan, Senior Advocate

इसके बाद वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता ने हस्तक्षेप करते हुए कहा,

"नागरिकों के विरोध प्रदर्शन करने के मौलिक अधिकार को दबाया नहीं जा सकता, क्योंकि यह अदालत 'मजदूर किसान शक्ति संगठन' मामले में पहले ही फैसला दे चुकी है कि विरोध प्रदर्शन की जगह ऐसी होनी चाहिए जहाँ प्रदर्शनकारियों की आवाज़ सुनी जा सके। नई दिल्ली सिर्फ कुछ चुनिंदा लोगों के लिए नहीं है।"

जस्टिस बागची ने जवाब दिया,

"हम नोटिस जारी कर रहे हैं। हम उनसे जवाब मांग रहे हैं। जवाब मिलने के बाद, अगर हम संतुष्ट नहीं हुए, तो कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई होगी। आपने अपना पक्ष रख दिया है। पहला, आपने 'मजदूर किसान शक्ति संगठन' मामले के फैसले का हवाला दिया है। दूसरा, आपने बताया है कि जंतर-मंतर देश चलाने वाले प्रशासनिक केंद्रों के करीब है, इसलिए इसे यहाँ से हटाया नहीं जाना चाहिए। हम राज्य से इस पर जवाब मांग रहे हैं।"

सीजेआई कांत ने आगे कहा,

"हम आपसे दलीलें इसलिए सुन रहे हैं क्योंकि हमने अपना होमवर्क कर लिया है। हमें सारे बिंदु पता हैं। इस पर विचार करने की ज़रूरत है। इसीलिए हम नोटिस जारी कर रहे हैं।"

हालाँकि राज्य सार्वजनिक व्यवस्था के हित में इन अधिकारों को विनियमित कर सकता है, लेकिन याचिका में कहा गया है कि इस तरह का विनियमन किसी प्रतिबंध की तरह काम नहीं कर सकता, और न ही यह इन अधिकारों के इस्तेमाल को अर्थहीन बना सकता है।

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