

मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में वैवाहिक विवाद की सुनवाई करते हुए कहा कि किसी पत्नी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अपने पति के पीछे-पीछे वैसे ही जाए, जैसे वोडाफोन के विज्ञापन में पग (कुत्ते की एक नस्ल) जाता है।
कोर्ट ने कहा कि इसी तरह, जब किसी पति को नौकरी के लिए दूसरी जगह जाना पड़ता है, तो वह हमेशा अपनी पत्नी को साथ नहीं ले जा सकता।
जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और एमडी सुमति की डिवीज़न बेंच ने यह टिप्पणी तब की जब उन्होंने फैमिली कोर्ट के उस नज़रिए को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि पति ने अपनी पत्नी को साथ लिए बिना काम के सिलसिले में दूसरे शहर जाकर वैवाहिक दायित्वों का उल्लंघन किया है।
कोर्ट ने कहा, "पत्नी को साथ ले जाना हमेशा मुमकिन नहीं हो सकता। मान लीजिए पति सैनिक है, तो आर्मी बैरक में वैवाहिक घर बसाना संभव नहीं है। पत्नी नौकरी कर सकती है। उससे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह वोडाफोन के उस यादगार विज्ञापन वाले कुत्ते की तरह व्यवहार करे।"
कोर्ट ने यह टिप्पणी शिवगंगा फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द करते हुए की, जिसमें पति की तलाक की अर्जी खारिज कर दी गई थी।
पति ने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी का किसी और के साथ संबंध है। हालांकि, फैमिली कोर्ट ने माना कि पति हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 23(1)(a) के तहत अपनी ही गलती का फ़ायदा उठा रहा था, क्योंकि वह अपनी पत्नी को साथ लिए बिना नौकरी के लिए शिवगंगा से मुंबई चला गया था।
फैमिली कोर्ट ने तर्क दिया कि किसी के लिए भी यौन इच्छा पर काबू पाना "बहुत मुश्किल" है और पति का यह अहम फ़र्ज़ है कि वह अपनी पत्नी को अपने साथ ले जाए।
इसलिए, कोर्ट ने पति की तलाक़ की अर्ज़ी खारिज कर दी।
इस जोड़े की शादी सितंबर 1992 में हुई थी और उनके चार बच्चे थे। जब अपील पर सुनवाई हुई, तब पति 67 साल का था और दोनों 16 साल से अलग रह रहे थे।
हाईकोर्ट ने इस तर्क को सही नहीं माना।
"हो सकता है कि कट्टर नारीवादी ट्रायल कोर्ट के इस क्रांतिकारी नज़रिए की तारीफ़ करें। लेकिन अफ़सोस के साथ हमें कहना पड़ रहा है कि हम इसे मंज़ूरी नहीं दे सकते।"
बेंच ने कहा कि पति-पत्नी का हमेशा एक साथ रहना मुमकिन नहीं हो सकता। मिसाल के तौर पर, एक सैनिक आर्मी बैरक में अपना घर नहीं बसा सकता, क्योंकि हो सकता है कि उसकी पत्नी भी कहीं नौकरी कर रही हो।
हाईकोर्ट ने यह भी बताया कि सेक्शन 23(1)(a) के तहत "गलत" व्यवहार का मतलब है गंभीर दुर्व्यवहार, या ऐसा व्यवहार जो सही और न्याय के खिलाफ हो।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पति द्वारा लगाए गए व्यभिचार (adultery) के आरोप को भी नहीं माना।
कोर्ट ने गौर किया कि जिस व्यक्ति पर व्यभिचार का आरोप था, उसे कार्यवाही में पक्षकार नहीं बनाया गया था। मद्रास हाईकोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए, बेंच ने कहा कि जब व्यभिचार का आरोप लगाया जाता है, तो आरोपी व्यक्ति को भी पक्षकार बनाना ज़रूरी है और ऐसा न करने पर आरोप खारिज हो सकता है।
कोर्ट ने देखा कि पत्नी ने अपने पति के साथ फिर से रहने के लिए कोई कदम नहीं उठाया था, यहाँ तक कि कोई औपचारिक पत्र या नोटिस भी नहीं भेजा था।
"हम पूरी तरह संतुष्ट हैं कि दोनों पक्षों के बीच रिश्ते इस हद तक टूट चुके हैं कि उन्हें सुधारा नहीं जा सकता।"
राकेश रमन बनाम कविता मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए, बेंच ने कहा कि लंबे समय तक अलग रहना, साथ न रहना और सार्थक वैवाहिक संबंधों का पूरी तरह टूट जाना हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता माना जा सकता है।
जजों ने आपसी सहमति से समझौता कराने के लिए दोनों पक्षों से बातचीत भी की, लेकिन यह कोशिश नाकाम रही।
यह पाते हुए कि दोनों के बीच "बहुत कड़वाहट" थी और फिर से साथ रहने की कोई संभावना नहीं थी, हाईकोर्ट ने शादी खत्म कर दी।
कोर्ट ने पति को पत्नी को गुजारा-भत्ता (alimony) के तौर पर ₹7 लाख देने का निर्देश दिया। तलाक का आदेश तभी लागू होगा जब यह रकम फैमिली कोर्ट में जमा कर दी जाएगी।
पति की ओर से वकील एस. श्रीनिवासा राघवन पेश हुए।
पत्नी का प्रतिनिधित्व वकील सी. सुरेश कन्नन ने किया।
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