

शुक्रवार को एक सेशन कोर्ट ने इस बात पर आपत्ति जताई कि हाल ही में हुई मर्सिडीज कार दुर्घटना के 17 वर्षीय आरोपी की जमानत रद्द करने के लिए दायर याचिकाओं में, कानून का उल्लंघन करते हुए उस नाबालिग का नाम उजागर कर दिया गया था।
नाबालिग आरोपी को मिली जमानत रद्द करने की मांग करते हुए दो याचिकाएं दायर की गईं - एक राज्य सरकार की ओर से और दूसरी दुर्घटना के शिकार व्यक्ति के परिजनों की ओर से।
एर्नाकुलम की अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश कविता गंगाधरन ने गौर किया कि राज्य की जमानत रद्द करने की याचिका और मृतक स्कूटर सवार के परिवार द्वारा दायर याचिका, दोनों में ही नाबालिग आरोपी की पहचान से जुड़ी जानकारियां उजागर हो गई थीं।
परिवार ने इस कानूनी कार्यवाही में पक्षकार बनने (impleadment) के लिए याचिका दायर की थी।
परिवार की याचिका में हुई इस चूक पर ध्यान देते हुए न्यायाधीश ने कहा, "जब तक इसे सुधारा नहीं जाता, मैं इस मामले की सुनवाई नहीं कर सकती। यह 'जुवेनाइल जस्टिस एक्ट' (किशोर न्याय अधिनियम) का स्पष्ट उल्लंघन है। इसमें कानून के दायरे में आए बच्चे (Child in Conflict with Law) का पूरा नाम उजागर कर दिया गया है। क्या आप अदालत में इसी तरह याचिका दायर करते हैं? आपको 'कॉज़ टाइटल' (याचिका का शीर्षक/विवरण) को ठीक करना होगा। यह अदालत केवल पीड़ित की ही नहीं, बल्कि बच्चे की सुरक्षा के लिए भी है।"
अदालत ने यह भी पाया कि राज्य सरकार की ओर से दायर जमानत रद्द करने की याचिका में भी नाबालिग आरोपी की पहचान से जुड़ी जानकारियां सामने आ गई थीं।
अदालत ने निर्देश दिया कि इस चूक को सुधारने के लिए कदम उठाए जाएं, ताकि 'जुवेनाइल जस्टिस एक्ट' के प्रावधानों के अनुसार नाबालिग आरोपी की पहचान गोपनीय बनी रहे।
अदालत के आदेश में कहा गया, "धारा 101 के तहत दायर अपील ज्ञापन में कानून के दायरे में आए बच्चे का पूरा नाम और घर का पता उजागर कर दिया गया है। इसलिए, अभियोजन पक्ष को निर्देश दिया जाता है कि वे 'कॉज़ टाइटल' में सुधार के लिए एक नई याचिका दायर करें, जिसमें बच्चे के नाम की जगह कोई गुप्त पहचान (anonymised designation) दी जाए। दोनों पक्षों को निर्देश दिया जाता है कि वे जो भी दस्तावेज दायर करें, उनमें बच्चे की पहचान या पता उजागर न करें।"
इस मामले पर कल फिर सुनवाई होगी।
25 अक्टूबर की सुबह कोच्चि के चेरानाल्लूर में, एक जज के 17 वर्षीय नाबालिग बेटे ने मर्सिडीज-बेंज कार चलाते हुए एक दोपहिया वाहन को टक्कर मार दी, जिससे स्कूटर सवार जयबालकृष्णन की मौत हो गई।
शुरुआत में, इस किशोर पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 281 और 106(1) के तहत मामला दर्ज किया गया था, जो लापरवाही से गाड़ी चलाने और लापरवाही के कारण मौत का कारण बनने से संबंधित हैं। खबरों के अनुसार, उसे पहले पुलिस स्टेशन से ही जमानत (स्टेशन बेल) मिल गई थी।
पीड़ित परिवार और स्थानीय लोगों के लगातार विरोध के बाद, पुलिस ने इसमें और भी गंभीर धाराएं जोड़ दीं। इनमें भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 105 (गैर-इरादतन हत्या) के साथ-साथ मोटर वाहन अधिनियम, 1988 (MVA) की धारा 181, 183, 199A(1) और 199A(2) शामिल हैं।
अगले ही दिन, 26 अक्टूबर को किशोर न्याय बोर्ड (JJB) ने उसे जमानत दे दी।
सरकारी अभियोजन पक्ष और पीड़ित परिवार, दोनों ने ही उसकी जमानत रद्द करने के लिए आवेदन दायर किए।
आज सरकारी अभियोजक मनोज जी. कृष्णन ने राज्य की ओर से पक्ष रखा।
FIR में किशोर के पिता का भी नाम है, जो एक अतिरिक्त जिला जज हैं और वर्तमान में त्रिशूर जिले के इरिंजालकुडा में मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (MACT) में तैनात हैं।
MACT जज को FIR में आरोपी बनाया गया है, क्योंकि धारा 199A के तहत, यदि कोई नाबालिग मोटर वाहन से जुड़ा अपराध करता है, तो उसके अभिभावक या वाहन के मालिक को जिम्मेदार माना जाता है। ऐसे में, कुछ कानूनी अपवादों को छोड़कर, उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है और उन्हें सजा भी दी जा सकती है।
केरल उच्च न्यायालय ने गुरुवार को जज को गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा प्रदान कर दी।
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