

कर्नाटक हाईकोर्ट ने हाल ही में यह फैसला दिया कि धार्मिक संस्थाएँ सड़क दुर्घटना में अपने प्रमुख की मृत्यु होने पर मुआवज़े का दावा कर सकती हैं।
जस्टिस सूरज गोविंदराज और जस्टिस त्यागराज एन. इनावल्ली की बेंच ने कहा कि मोटर दुर्घटना मुआवज़ा कानून के तहत "निर्भरता" (dependency) सिर्फ़ जैविक परिवार के सदस्यों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वे संस्थाएँ भी शामिल हो सकती हैं जो मृतक पर निर्भर थीं।
इसलिए, कोर्ट ने सुत्रेश्वर शिवाचार्य स्वामीजी के नेतृत्व वाले मठ को मुआवज़े के तौर पर ₹5.94 लाख देने का आदेश दिया; स्वामीजी की एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी।
कोर्ट ने राय दी कि मठ का प्रमुख अपनी निजी हैसियत से काम नहीं करता, बल्कि संस्था के प्रतिनिधि के तौर पर काम करता है। कोर्ट ने आगे कहा कि संस्था को उनकी भूमिका और सेवाओं से फ़ायदा होता था, और उनकी मृत्यु से नेतृत्व, प्रशासन और कुल मिलाकर संस्था के कामकाज को नुक़सान पहुँचा है।
कोर्ट ने टिप्पणी की, "मठाधिपति का पद किसी ऐसे आम व्यक्ति का नहीं होता जो अपनी निजी गुज़र-बसर के लिए कमाता हो, बल्कि यह एक आध्यात्मिक प्रमुख का पद होता है, जिसकी भूमिका मठ के कामकाज, प्रशासन और निरंतरता से गहराई से जुड़ी होती है।"
यह मामला 2011 में हुई एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है। इस दुर्घटना में मठ के प्रमुख एक जीप में यात्रा कर रहे थे, तभी उनकी जीप की एक ट्रक से आमने-सामने टक्कर हो गई, जिसके कारण उनकी मृत्यु हो गई।
मठ के एक प्रतिनिधि (दावेदार) ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) के आदेश को चुनौती दी। MACT ने अपने आदेश में संपत्ति के नुकसान और अंतिम संस्कार के खर्चों के लिए ₹1.2 लाख का मुआवज़ा तो मंज़ूर किया था, लेकिन 'आश्रितता के नुकसान' (loss of dependency) मद के तहत मुआवज़ा देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि मृतक का कोई पारिवारिक आश्रित नहीं था।
हाईकोर्ट के समक्ष, दावेदार के वकील ने यह तर्क दिया कि चूंकि मृतक मठ की सेवा कर रहे थे, इसलिए संस्था को उनकी सेवाओं का नुकसान हुआ है और इस कारण वह 'आश्रितता के नुकसान' मद के तहत मुआवज़ा पाने की हकदार है।
दूसरी ओर, बीमा कंपनी ने यह दलील दी कि मठ के उत्तराधिकारी को आश्रित नहीं माना जा सकता, क्योंकि स्वामीजी एक स्वतंत्र और वैरागी जीवन व्यतीत करते थे।
हाईकोर्ट ने यह माना कि MACT ने आश्रितता की बहुत ही संकीर्ण व्याख्या की है, और इसे केवल पारिवारिक संबंधों तक ही सीमित रखा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि मुआवज़ा कानून का विकास इस तरह से हुआ है कि वह न केवल पारिवारिक, बल्कि आर्थिक और कार्यात्मक आश्रितता को भी मान्यता देता है।
कोर्ट ने आगे कहा, "अधिकरण की त्रुटि इस बात में है कि उसने आश्रितता को केवल पारिवारिक आश्रितता के बराबर मान लिया और संस्थागत आश्रितता की अनदेखी की।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि यह दृष्टिकोण सुप्रीम कोर्ट द्वारा 'Montford Brothers of St. Gabriel बनाम United India Insurance Co.' मामले में निर्धारित कानून के विपरीत है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह माना था कि मुआवज़ा कानून के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए "कानूनी प्रतिनिधि" (legal representative) शब्द की व्याख्या व्यापक रूप से की जानी चाहिए।
उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखते हुए, कोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया और MACT द्वारा दिए गए मुआवज़े की राशि में संशोधन किया। कोर्ट ने कहा कि मठ का प्रतिनिधि ₹4,74,330 की बढ़ी हुई मुआवज़ा राशि पाने का हकदार होगा, और उसे यह राशि याचिका दायर करने की तारीख से लेकर भुगतान होने की तारीख तक 6% ब्याज के साथ दी जाएगी।
बीमा कंपनी को यह निर्देश दिया गया कि वह चार सप्ताह के भीतर उक्त राशि जमा करे।
दावेदार की ओर से अधिवक्ता कृपा सागर पाटिल उपस्थित हुए।
बीमा कंपनी की ओर से अधिवक्ता प्रीति पाटिल मेलकुंडी उपस्थित हुईं।
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