नेहा बोरा मामला: कोर्ट ने स्थगन मांगा? वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि वह स्वयं इसकी जिम्मेदारी लेंगे

न्यायमूर्ति सुब्रमणियम प्रसाद ने कहा कि उन्हें फैसला लिखने के लिए समय चाहिए और उन्होंने मंगलवार तक "स्थगन" की मांग की।
Justice Subramonium Prasad
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गुरुवार को दिल्ली हाई कोर्ट में जस्टिस सुब्रमणियम प्रसाद और सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन के बीच एक दिलचस्प बातचीत हुई। यह बातचीत एक ऐसे विवादास्पद मुद्दे पर थी, जिसकी वजह से अक्सर अदालती व्यवस्था को काफी नकारात्मक प्रचार का सामना करना पड़ता है - और वह मुद्दा है वकीलों द्वारा सुनवाई टालने (एडजर्नमेंट लेने) का।

इस बार, एक जज ने ही आदेश पारित करने के लिए "स्थगन" (adjournment) मांगा।

यह घटना 'ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन' (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के दौरान हुई। नेहा बोरा ने दिल्ली के स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) द्वारा 'पीस बॉन्ड' (शांति बनाए रखने का मुचलका) पर हस्ताक्षर करने के लिए जारी नोटिस को चुनौती दी थी।

दोपहर के भोजन के बाद जब अदालत ने इस मामले पर सुनवाई शुरू की और बहस दो घंटे से अधिक समय तक चली, तो जस्टिस प्रसाद ने कहा कि उन्हें फैसला लिखने के लिए समय चाहिए।

उन्होंने दिल्ली पुलिस की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा से कहा कि वे (अदालत) फैसला लिखने के लिए मंगलवार (27 अक्टूबर) तक का समय (स्थगन) मांग रहे हैं। अदालत ने कहा कि तब तक पुलिस को कोई सख्त कार्रवाई नहीं करनी चाहिए।

अदालत ने कहा, "शर्मा सर, बस एक छोटी सी गुजारिश है। फैसला लिखने में थोड़ा और समय लगेगा। दुर्भाग्य से, शनिवार और रविवार को मैं स्टेशन (शहर) में नहीं रहूंगा। हम आज सुनवाई पूरी कर लेंगे। मैं फैसला लिखने के लिए मंगलवार तक का समय मांग रहा हूं। बस यही अनुरोध है कि मंगलवार तक, जब मैं फैसला सुनाऊंगा, तब तक आप कोई सख्त कदम न उठाएं।"

जस्टिस प्रसाद ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि SEM के समक्ष बोरा के मामले में अगली सुनवाई की तारीख शनिवार (24 अक्टूबर) है।

ASG Chetan Sharma
ASG Chetan Sharma

ASG शर्मा ने जवाब दिया कि एक छोटी सी समस्या है।

उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा, “वहां एक छोटी सी समस्या है। और मैं इसे अदालत पर छोड़ता हूँ। यह एक अहम मुद्दा है... कि आखिर बॉन्ड क्यों न भरा जाए, इस पर कारण बताओ (शो कॉज) नोटिस जारी हो। कृपया ध्यान दें कि इसमें हिरासत (डिटेंशन) जैसी कोई बात न हो...”

अदालत ने कहा कि उसे अपने फैसले में दिल्ली पुलिस और बोरा के वकील शंकरनारायणन की दलीलों पर विचार करना होगा।

अदालत ने टिप्पणी की, “बात यह है कि जब किसी जज को जल्दबाजी में काम करना पड़ता है, तो समस्या होती है।”

इस पर शंकरनारायणन ने कहा कि अदालत की ओर से सुनवाई टालने (एडजर्नमेंट) की मांग करना ठीक नहीं लगता। इसलिए, उन्होंने खुद ही यह जिम्मेदारी लेने का प्रस्ताव रखा।

उन्होंने कहा, “मैं खुद यह जिम्मेदारी ले लेता हूँ। मैं मंगलवार या बुधवार तक का समय (अकोमोडेशन) मांग रहा हूँ।”

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