आपत्तिजनक: कानूनी जानकारी देने वाले पोर्टल्स द्वारा फैसलों के पैराग्राफ नंबर बदलने पर दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी

कोर्ट ने कहा, "हमने पाया कि SCC ऑनलाइन में पैराग्राफ की नंबरिंग अलग है, मनुपात्रा में पैराग्राफ की नंबरिंग अलग है, और ओरिजिनल पैराग्राफ नंबर तो बिल्कुल ही अलग है।"
Delhi High Court Judgment
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दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को मनुपात्रा और SCC ऑनलाइन जैसी कानूनी जानकारी वाली वेबसाइटों द्वारा कोर्ट के फैसलों के पैराग्राफ नंबर और व्याकरण से जुड़ी अन्य बातों को बदलने की प्रक्रिया पर नाराज़गी जताई।

जस्टिस सी. हरि शंकर और विनोद कुमार की डिवीज़न बेंच ने कहा कि ओरिजिनल ऑर्डर की कॉपी में बदलाव करने से कोर्ट जो बात कहना चाहता है, उसका मतलब बदल सकता है।

जस्टिस शंकर ने कहा, "आप कोर्ट द्वारा दिए गए पैराग्राफ नंबर नहीं बदल सकते। मनुपात्रा और SCC ऑनलाइन अपनी मर्ज़ी से पैराग्राफ नंबर दे देते हैं। मुझे यह बात गलत लगती है। कभी-कभी जिस तरह से आप विराम चिह्न (punctuation) लगाते हैं या पैराग्राफ को तोड़ते हैं, उससे कोर्ट की बात का गलत मतलब निकल सकता है। हमने देखा है कि SCC ऑनलाइन में पैराग्राफ नंबरिंग अलग है, मनुपात्रा में अलग है और ओरिजिनल पैराग्राफ नंबर बिल्कुल अलग है।"

Justice C Hari Shankar and Justice Vinod Kumar
Justice C Hari Shankar and Justice Vinod Kumar

कोर्ट ने यह टिप्पणी ऑनलाइन लीगल डेटाबेस 'इंडियन कानून' की उस अपील पर सुनवाई के दौरान की, जो 29 मई के सिंगल-जज के फैसले के खिलाफ दायर की गई थी। 29 मई के फैसले में कुछ मुक़दमेबाज़ों की प्राइवेसी और 'भूल जाने के अधिकार' (right to be forgotten) की सुरक्षा के लिए ऑनलाइन पोर्टल्स द्वारा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध फैसलों या आदेशों में पर्सनल जानकारी को छिपाने के तरीके पर गाइडलाइंस तय की गई थीं।

यह फैसला उन अलग-अलग लोगों की याचिकाओं पर सुनाया गया था जो अब बंद हो चुकी कानूनी कार्यवाही से सार्वजनिक रूप से नहीं जुड़ना चाहते थे। 'इंडियन कानून' को कोर्ट के सामने मौजूद पीड़ित पक्षों से जुड़े नाम-आधारित सर्च फ़ंक्शन को हटाने का निर्देश दिया गया था। सिंगल-जज ने निर्देश दिया कि उनसे जुड़े कोई भी आदेश या फैसले केवल केस नंबर, साइटेशन, कोर्ट की जानकारी और तारीख के ज़रिए ही देखे जा सकें।

अपनी अपील में, 'इंडियन कानून' ने कहा कि 29 मई के फैसले में कई लीगल डेटाबेस में से उसे ही गलत तरीके से निशाना बनाया गया।

बुधवार को, 'इंडियन कानून' का प्रतिनिधित्व कर रहे सीनियर एडवोकेट अरविंद दातार ने कहा कि "भूल जाने के अधिकार" की आड़ में कोर्ट के फैसलों को अपलोड करने के उनके अधिकार को रोका जा रहा है।

"मुझे बिना किसी रुकावट के अपना बिज़नेस चलाने का अधिकार है। मुझे सार्वजनिक डोमेन में फैसले डालने का अधिकार है। हम सभी फैसलों के लिए सिर्फ़ हेडनोट देते हैं, ज़्यादा से ज़्यादा हम पैराग्राफ नंबर दे सकते हैं अगर कोर्ट ने नहीं दिए हों।"

उन्होंने कहा कि 'इंडियन कानून' का मकसद सभी को मुफ़्त में कोर्ट के फैसलों तक पहुँच उपलब्ध कराना है।

उन्होंने कहा, "यही मेरा मकसद है। आप 'भूल जाने के अधिकार' के दायरे में मेरी वेबसाइट तक पहुँच और इंटरनेट पर सभी फैसले डालने के मेरे अधिकार को रोकने की कोशिश कर रहे हैं।"

दातार ने कहा कि जहाँ गूगल पर सर्च रिज़ल्ट में किसी मामले पर छपे न्यूज़ आर्टिकल ही दिख सकते हैं, वहीं 'इंडियन कानून' पूरा फैसला दिखाता है।

"गूगल विस्तार से फैसला नहीं देगा, गूगल सिर्फ़ अख़बार की रिपोर्ट देगा। मुझे दूसरों के बराबर रखना सही नहीं है क्योंकि मैं सिर्फ़ न्यायिक रिकॉर्ड उपलब्ध करा रहा हूँ और आप किसी भी कीमत पर फैसले तक पहुँच को नहीं रोक सकते।"

दातार ने आगे कहा कि अख़बार का झुकाव किसी एक राजनीतिक पक्ष की ओर हो सकता है, जबकि यह सिर्फ़ कोर्ट के आदेशों को आसानी से समझने लायक फ़ॉर्मेट में पेश करता है।

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Objectionable: Delhi High Court on legal resource portals changing para numbers of judgments

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