

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार से 'राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम' में 2026 में किए गए संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर जवाब मांगा। इस संशोधन के तहत, 'वंदे मातरम' गाने से जानबूझकर रोकना या इसे गाते समय किसी सभा में बाधा डालना दंडनीय अपराध है, जिसके लिए तीन साल तक की जेल हो सकती है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने सरकार से कहा कि वह कर्नाटक संगीत गायक टी.एम. कृष्णा की याचिका पर दो हफ़्ते के अंदर जवाब दे।
खास बात यह है कि सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि 'बिजो इमैनुएल मामले' में सुप्रीम कोर्ट का पहले का फ़ैसला, जो राष्ट्रगान न गाने वालों को सुरक्षा देता है, अभी भी लागू है।
इसलिए, जज ने संकेत दिया कि जो व्यक्ति अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर 'वंदे मातरम' का कोई भी या सभी पद नहीं गाता है, उस पर आपराधिक मुक़दमा नहीं चलाया जाना चाहिए।
जज ने कहा, "हम उम्मीद करते हैं कि 'बिजो इमैनुएल मामले' में इस कोर्ट द्वारा तय किया गया देश का कानून ही इस मामले में लागू होगा। 'बिजो इमैनुएल मामले' में कानून के उस फ़ैसले पर अब तक कोई सवाल नहीं उठाया गया है।"
कृष्णा ने 'राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971' (राष्ट्रीय प्रतीकों की सुरक्षा करने वाला कानून) की धारा 3 को चुनौती देते हुए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। इस कानून में 2026 में संशोधन किया गया था।
उनकी याचिका में गृह मंत्रालय के उन निर्देशों को भी चुनौती दी गई, जिनमें कुछ खास सरकारी, औपचारिक और सांस्कृतिक मौकों पर 'वंदे मातरम' के सभी छह छंदों को गाने के लिए कहा गया था।
संशोधित कानून के तहत, जानबूझकर राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत गाने से रोकना, या ऐसे गायन में शामिल सभा में बाधा डालना दंडनीय अपराध है। इसके लिए तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
कृष्णा ने तर्क दिया कि केंद्र के निर्देश केवल प्रोटोकॉल तय करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह संशोधन नागरिकों को आखिरी चार छंद गाने में शामिल होने के लिए मजबूर करता है।
याचिका के अनुसार, इन छंदों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे हिंदू देवी-देवताओं का ज़िक्र है।
याचिका में कहा गया, "नतीजतन और असल में, राज्य की यह कार्रवाई केवल राष्ट्रीय प्रोटोकॉल को नियंत्रित नहीं करती या सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए आचरण का एक समान नियम तय नहीं करती। यह एक ऐसे प्रतीक के प्रति सहमति जताने के समारोह में शामिल होने के लिए मजबूर करती है, जिसके आखिरी चार छंद (छंद 3 से 6) स्पष्ट रूप से भक्तिपूर्ण, देवी-देवताओं का आह्वान करने वाले और धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं।"
याचिका के मुताबिक, ये उपाय अनुच्छेद 14 (समानता), 15(1) (भेदभाव से सुरक्षा), 19(1)(a) (भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) और 25(1) (अंतरात्मा और धर्म की स्वतंत्रता) के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के 1986 के 'बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य' मामले के फैसले का हवाला दिया गया। उस मामले में कोर्ट ने उन स्कूली बच्चों का बचाव किया था जो राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े तो हुए थे, लेकिन अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण उसे गाया नहीं था।
याचिका के अनुसार, आपराधिक सज़ा का प्रावधान इस मामले को राष्ट्रीय कार्यक्रमों से जुड़े सामान्य नियमों से बिल्कुल अलग बनाता है।
इसमें कहा गया, "सज़ा का डर दिखाकर सभी छह छंदों को गाने के लिए मजबूर करके, राज्य एक ऐसे ऐतिहासिक प्रतीक को, जिस पर विवाद रहा है, एक अनिवार्य परंपरा में बदल देता है।"
याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि शुरुआती दो छंद मूल रूप से एक अलग देशभक्ति गीत के तौर पर लिखे गए थे, जबकि बाकी चार छंद तब जोड़े गए जब इस गीत को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल किया गया।
याचिका के अनुसार, बाद के छंद धार्मिक और संगीतमय, दोनों ही तरह से शुरुआती दो छंदों से अलग हैं।
याचिका में कांग्रेस वर्किंग कमेटी के 1937 के उस फ़ैसले का भी ज़िक्र किया गया, जिसमें मुस्लिम सदस्यों की आपत्तियों के बाद राष्ट्रीय कार्यक्रमों में केवल शुरुआती दो छंदों को गाने तक सीमित रखने का निर्णय लिया गया था।
याचिका के अनुसार,
"यह कदम (2026 के निर्देश) औपचारिक रूप से तो निष्पक्ष है, लेकिन असल में इसमें एक खास संदेश छिपा है: यह बहुसंख्यक धार्मिक झुकाव का संकेत देता है और आस्था रखने वाले मुसलमानों और ज़मीर की आवाज़ पर विरोध करने वालों को हीनता का एहसास कराता है।"
कृष्णा की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट एस. मुरलीधर ने तर्क दिया कि कानून में 'राष्ट्रगीत' (national song) की कोई परिभाषा नहीं दी गई है, जिससे इसके दुरुपयोग की गुंजाइश बनी रहती है।
उन्होंने कहा, "इस कानून में राष्ट्रगीत की परिभाषा नहीं दी गई है। यह कानून में एक गंभीर कमी है और इसका दुरुपयोग हो सकता है। एक ऑफिस मेमोरेंडम जारी किया गया, जिसे सरकारी गजट में भी प्रकाशित नहीं किया गया। मुझे समझ नहीं आता कि किस प्रावधान के तहत ऐसा किया गया। वे किसी प्रावधान का हवाला नहीं देते। वे बस एक ऑफिस मेमोरेंडम जारी कर देते हैं।"
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि सज़ा का प्रावधान करने वाला कानून अस्पष्ट नहीं हो सकता।
मुरलीधर ने कहा, "यह सज़ा का प्रावधान करने वाला कानून है। और ऐसा कानून अस्पष्ट नहीं हो सकता। आप कानून में राष्ट्रगीत की परिभाषा तक नहीं देते, और फिर इसे सज़ा-योग्य अपराध बना देते हैं।"
जस्टिस बागची ने जवाब दिया, "संविधान के अनुच्छेद 51A में भी राष्ट्रगीत का ज़िक्र नहीं है। परंपरा और चलन के अनुसार, राष्ट्रगीत का ज़िक्र हमेशा 'वंदे मातरम' के तौर पर किया गया है और इसे दो छंदों वाले गीत के रूप में ही समझा गया है।"
उन्होंने कहा कि सरकार किसी कानूनी प्रावधान के तहत सज़ा लागू करने के लिए केवल 'ऑफिस मेमोरैंडम' (आधिकारिक आदेश) पर निर्भर नहीं रह सकती।
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट से अनुरोध किया कि सरकार को औपचारिक नोटिस जारी न किया जाए और मामले को सनसनीखेज़ न बनाया जाए।
मेहता ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता नैतिक संरक्षक (moral guardian) की भूमिका नहीं निभा सकता।
मेहता ने कहा कि याचिकाकर्ता लोगों का ध्यान खींचने की कोशिश कर रहा है और संसद द्वारा बनाया गया कानून संवैधानिक तरीका दिखाता है।
हालांकि, एसजी (SG) ने अपनी 'नक्सली' वाली टिप्पणी वापस लेने से इनकार कर दिया। कृष्ण ने संशोधित धारा 3 को रद्द करने और यह घोषित करने के लिए निर्देश मांगे हैं कि 'वंदे मातरम' के छह छंदों में से केवल पहले दो छंद ही 'राष्ट्रीय गीत' हैं।
इसके अलावा, उन्होंने अपनी याचिका पर अंतिम निर्णय होने तक, जिन प्रावधानों को चुनौती दी गई है, उनके लागू होने से अंतरिम सुरक्षा की भी मांग की है।
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