

दिल्ली हाईकोर्ट में एक पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) पिटीशन फाइल की गई है, जिसमें चल रहे स्टूडेंट्स के प्रोटेस्ट की वजह से जंतर-मंतर के पास मोबाइल इंटरनेट सर्विस सस्पेंड करने के मिनिस्ट्री ऑफ़ होम अफेयर्स (MHA) के ऑर्डर को चैलेंज किया गया है।
सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्वेस ने जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की डिवीजन बेंच के सामने अर्जी देकर मामले को जल्दी लिस्ट करने की मांग की।
गोंसाल्वेस ने कहा, "कुछ फॉर्मेटिंग दिक्कतों की वजह से पिटीशन लिस्ट नहीं हो पा रही है।"
कोर्ट ने कहा, "प्लीज ऑब्जेक्शन हटा दें।"
सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर, जो एक लीगल सर्विस ऑर्गनाइजेशन है, ने यह PIL फाइल की है। इसमें 17 जुलाई से 23 जुलाई के बीच जारी किए गए छह सस्पेंशन ऑर्डर को रद्द करने की मांग की गई है। इसमें आरोप लगाया गया है कि वे गैर-संवैधानिक हैं और संविधान के आर्टिकल 14, 19 और 21 का उल्लंघन करते हैं। इसमें भविष्य के सभी इंटरनेट सस्पेंशन ऑर्डर को पब्लिश करने के लिए निर्देश देने की भी मांग की गई है।
याचिका के अनुसार, MHA ने टेलीकम्युनिकेशन एक्ट, 2023 के सेक्शन 20(2)(b) और टेलीकम्युनिकेशन (टेम्पररी सस्पेंशन ऑफ़ सर्विसेज़) रूल्स, 2024 का इस्तेमाल करके जंतर-मंतर के 1.5 किलोमीटर के दायरे में मोबाइल इंटरनेट सर्विस को सस्पेंड करने का आदेश दिया।
हालांकि, याचिका में कहा गया है कि इन आदेशों में सिर्फ़ कानूनी शब्दों "पब्लिक सेफ्टी" और "पब्लिक इमरजेंसी" का इस्तेमाल किया गया है, बिना किसी ऑब्जेक्टिव मटीरियल का खुलासा किए या यह बताए कि पूरी तरह से इंटरनेट शटडाउन क्यों ज़रूरी था।
याचिका में कहा गया है, "पिटीशनर ने कई ऐसे मामले देखे हैं जहां इंटरनेट शटडाउन की रिपोर्ट, सस्पेंशन ऑर्डर के पब्लिक में आने से पहले आई हैं, जिससे यह पक्का नहीं हो पा रहा है कि क्या ऑर्डर, माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुराधा भसीन मामले में मानी गई ट्रांसपेरेंसी की ज़रूरतों के हिसाब से उसी समय पब्लिश किए गए थे। हालांकि हर मामले में पब्लिकेशन की लीगैलिटी ज़रूरी तौर पर मौजूद सबूतों पर निर्भर करती है, लेकिन उसी समय पब्लिकेशन की ज़रूरत वाली कोई कानूनी ज़िम्मेदारी न होने से, उस समय के दौरान फंडामेंटल राइट्स पर पाबंदियों के लीगल बेसिस के बारे में पक्का नहीं हो पाता है, जब ऐसी पाबंदियां असल में लागू होती हैं।"
याचिका में आगे कहा गया है कि अथॉरिटीज़ ने आम पुलिसिंग, भीड़ को कंट्रोल करने के तरीके या टारगेटेड एनफोर्समेंट जैसे कम पाबंदी वाले ऑप्शन पर विचार नहीं किया। इसमें यह भी आरोप लगाया गया है कि सस्पेंशन नियमों के तहत तय काबिल अथॉरिटी के बजाय एक अंडर-सेक्रेटरी ने ऑर्डर जारी किए थे।
यह याचिका वकील जयंत मलिक और निशांत शौकीन के ज़रिए फाइल की गई थी।
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PIL before Delhi High Court challenges internet shutdown around Jantar Mantar