13 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में PIL दायर की गई

MEITY, META, X, Alphabet और Snapchat को इस PIL में पक्षकार बनाया गया है, जिसमें कहा गया है कि युवाओं में सोशल मीडिया की लत एक बड़ी चिंता का विषय है।
Delhi High Court, Social Media
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दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस तेजस करिया ने बुधवार को 13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल को सीमित करने के वास्ते देशव्यापी फ्रेमवर्क बनाने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया।

यह मामला चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस करिया की डिवीज़न बेंच के सामने सुनवाई के लिए आया।

कोर्ट ने कहा कि इस मामले की सुनवाई 5 अगस्त को एक ऐसी बेंच करेगी जिसमें जस्टिस करिया शामिल नहीं होंगे।

Chief Justice Devendra Kumar Upadhyaya and Justice Tejas Karia
Chief Justice Devendra Kumar Upadhyaya and Justice Tejas Karia

यह याचिका तीन साल के बच्चे की माँ कीर्ति दुआ और पीडियाट्रिशियन (बच्चों के डॉक्टर) डॉ. शरद गुप्ता ने दायर की है।

PIL के अनुसार, सोशल मीडिया पर गलत और सेक्स से जुड़े कंटेंट का बिना रोक-टोक दिखना संविधान के आर्टिकल 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत आज़ादी के अधिकार का उल्लंघन है, साथ ही यह आर्टिकल 39(f) के तहत बच्चों को शोषण से बचाने की राज्य की ज़िम्मेदारी का भी उल्लंघन है।

इसमें सरकार के 2025-2026 के इकोनॉमिक सर्वे का ज़िक्र किया गया है, जिसमें युवाओं में सोशल मीडिया की लत और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताओं के बढ़ने की बात कही गई थी।

याचिका में कहा गया है, "भले ही उन्होंने [इकोनॉमिक सर्वे] डिजिटल लत के इस खतरनाक चक्र को रोकने के लिए कुछ उपाय बताए हैं, फिर भी ये स्वैच्छिक (अपनी मर्ज़ी से अपनाने वाले) हैं और हमें इस गंभीर मुद्दे के लिए एक अनिवार्य कानून की ज़रूरत है।"

याचिका में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MEITY), महिला और बाल विकास मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को प्रतिवादी (respondents) बनाया गया है।

मेटा, अल्फाबेट (गूगल और यूट्यूब की पैरेंट कंपनी), टेलीग्राम, स्नैप इंक (स्नैपचैट की पैरेंट कंपनी) और X को भी याचिका में पक्षकार बनाया गया है।

PIL में 13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक, 13 से 16 साल के बच्चों के लिए कंटेंट रेगुलेशन, टीनएज यूज़र्स के लिए रात में इस्तेमाल पर रोक (curfew), भारत के 'डिजी यात्रा' फ्रेमवर्क की तर्ज पर अनिवार्य उम्र-सत्यापन सिस्टम और IT एक्ट, डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट और POCSO एक्ट जैसे मौजूदा कानूनों को सख्ती से लागू करने की मांग की गई है।

याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट से सोशल प्लेटफॉर्म को कंटेंट फ़िल्टर करने और बच्चों के यौन शोषण से जुड़ा कंटेंट दिखाने वाले URL को ब्लॉक करने का निर्देश देने को कहा है।

खास बात यह है कि याचिका में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, फ्रांस, इंडोनेशिया, यूनाइटेड किंगडम, डेनमार्क, ग्रीस और इटली के कानूनी मॉडलों का ज़िक्र किया गया है। इसमें तर्क दिया गया है कि इन देशों ने हाल ही में ऑनलाइन बच्चों की सुरक्षा पर कानून बनाए हैं या उनके ड्राफ्ट तैयार किए हैं, जिनसे भारत को अपना अनिवार्य कानून बनाते समय मदद लेनी चाहिए।

याचिका में सरकार के उस इकोनॉमिक सर्वे का ज़िक्र है जिसमें युवाओं में सोशल मीडिया की लत और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताओं के बढ़ने की बात कही गई थी। इसमें समस्या के पैमाने को साबित करने के लिए हाल के विदेशी अदालती फैसलों का हवाला दिया गया है - जिसमें न्यू मैक्सिको में मेटा की जवाबदेही से जुड़ा फैसला और लॉस एंजिल्स की जूरी का मेटा और गूगल के खिलाफ 'एडिक्टिव डिज़ाइन' (लत लगाने वाले डिज़ाइन) को लेकर आया फैसला शामिल है।

यह PIL, ANG पार्टनर्स एडवोकेट्स एंड सॉलिसिटर्स के वकील अंशुल गुप्ता के ज़रिए दायर की गई है। आज उनकी तरफ़ से सीनियर एडवोकेट पिंकी आनंद पेश हुईं।

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PIL filed in Delhi High Court to restrict children under 13 from accessing social media

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