केरल HC ने कहा बाइक चलाने वाले की लापरवाही का हवाला देकर पीछे बैठने वाले को मोटर दुर्घटना मुआवज़ा से इनकार नही किया जा सकता

कोर्ट ने कहा कि गाड़ी के ड्राइवर की लापरवाही के लिए पीछे बैठे बेकसूर सवारी या यात्रियों को परोक्ष रूप से ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
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केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा है कि सड़क दुर्घटना में घायल मोटरसाइकिल के पीछे बैठे व्यक्ति (पिलियन राइडर) को इस आधार पर मुआवज़ा देने से मना नहीं किया जा सकता कि मोटरसाइकिल चलाने वाला व्यक्ति लापरवाह था [संतोष बनाम ईए सैनाबा और अन्य]।

जस्टिस अनिल के. नरेंद्रन ने कहा कि मोटरसाइकिल चलाने वाले की लापरवाही के लिए पीछे बैठे बेकसूर यात्री को ज़िम्मेदार या दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

कोर्ट ने यह बात संतोष नाम के व्यक्ति की अपील को मंज़ूरी देते हुए कही। वह बाइक पर पीछे बैठकर जा रहा था और बाइक के बस से टकराने पर वह घायल हो गया था।

कोर्ट ने 'यशवंत कृष्ण कुंबर बनाम डिविज़नल मैनेजर, यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का ज़िक्र करते हुए समझाया कि गाड़ी चलाने वाले की लापरवाही के लिए पीछे बैठे सवारी या यात्री को 'विकैरियसली लायबल' (दूसरे की गलती के लिए ज़िम्मेदार) नहीं ठहराया जा सकता।

कोर्ट ने कहा, "अपीलकर्ता-दावेदार, जो दोपहिया वाहन पर पीछे बैठा यात्री (थर्ड-पार्टी) था, उसे दुर्घटना के लिए ज़िम्मेदार या दुर्घटना में योगदान देने वाला नहीं माना जा सकता। ऐसी स्थिति में, अपीलकर्ता-दावेदार किसी भी दोषी पक्ष (टॉर्टफीज़र) से पूरा मुआवज़ा पाने का हकदार है, और स्टेज कैरिज (बस) के ड्राइवर और दोपहिया वाहन चलाने वाले के बीच लापरवाही के बंटवारे के आधार पर मुआवज़े की राशि कम करने का कोई कानूनी आधार नहीं है।"

Justice Anil K Narendran
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यह मामला 28 जून, 2004 को हुए एक सड़क हादसे से जुड़ा है।

संतोष मोटरसाइकिल पर पीछे बैठकर जा रहे थे, तभी एक बस ने उनकी मोटरसाइकिल को टक्कर मार दी। उन्हें कई चोटें आईं, जिसमें उनकी दाहिनी जांघ की हड्डी का टूटना भी शामिल था।

एर्नाकुलम के मोटर एक्सीडेंट्स क्लेम्स ट्रिब्यूनल (MACT) ने ₹57,922 का मुआवज़ा तय किया था, लेकिन इसमें से 50 प्रतिशत राशि यह कहते हुए काट ली कि मोटरसाइकिल चलाने वाला व्यक्ति भी लापरवाह था और हादसे में उसकी भी भूमिका थी। इस तरह संतोष को मुआवज़े के तौर पर सिर्फ़ ₹28,961 मिले।

हाईकोर्ट में संतोष ने दलील दी कि ट्रिब्यूनल ने मुआवज़े की राशि गलत तरीके से कम की थी, क्योंकि वह तो बस पीछे बैठे यात्री (पिलियन राइडर) थे। इसलिए, उन्होंने उन्हें मिले मुआवज़े की राशि बढ़ाने की मांग की।

कोर्ट ने पाया कि टक्कर के बाद दर्ज आपराधिक मामले की FIR और चार्ज-शीट से पता चलता है कि पहली नज़र में बस ड्राइवर की लापरवाही थी।

कोर्ट ने देखा कि मोटरसाइकिल चलाने वाले के खिलाफ़ कोई चार्ज-शीट दाखिल नहीं की गई थी और उसकी लापरवाही साबित करने के लिए कोई मौखिक सबूत भी पेश नहीं किया गया था। इसलिए, कोर्ट ने माना कि MACT ने 'सीन महाज़र' (घटनास्थल का ब्यौरा) और निरीक्षण रिपोर्ट के आधार पर उसकी 'योगदान वाली लापरवाही' (contributory negligence) का निष्कर्ष निकालकर गंभीर गलती की थी।

कोर्ट ने यह भी पाया कि ट्रिब्यूनल ने क्लेम करने वाले (अपीलकर्ता) की मासिक आय उचित आंकड़े से कम तय की थी। इसलिए, कोर्ट ने 'रामचंद्रप्पा बनाम मैनेजर, रॉयल सुंदरम एलायंस इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ध्यान में रखते हुए इसे ₹3,500 से बढ़ाकर ₹4,500 कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले में 2004 में हुए हादसों के लिए अनुमानित मासिक आय तय की थी।

हाईकोर्ट ने क्लेम करने वाले की चोटों (हड्डी टूटने और 11 दिन अस्पताल में भर्ती रहने सहित) को ध्यान में रखते हुए कमाई के नुकसान, इलाज के खर्च, अतिरिक्त पोषण और कपड़ों के नुकसान के लिए दिए जाने वाले मुआवज़े की राशि भी बढ़ाई।

हालांकि, हादसे के कारण किसी स्थायी विकलांगता को साबित करने वाले सबूत न होने के कारण, कोर्ट ने दर्द, तकलीफ़ और सुविधाओं के नुकसान के लिए मुआवज़ा बढ़ाने से इनकार कर दिया।

इसके बाद कोर्ट ने ट्रिब्यूनल द्वारा कम की गई मुआवज़े की राशि को बहाल कर दिया। इसके अनुसार, कोर्ट ने बीमा कंपनी 'न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड' को निर्देश दिया कि वह अपीलकर्ता को अतिरिक्त ₹45,389 का भुगतान करे। इस राशि पर दुर्घटना की तारीख (2004) से लेकर MACT के फैसले (2010) की तारीख तक 8% सालाना की दर से ब्याज भी देना होगा। कोर्ट ने कहा कि यह भुगतान फैसले की तारीख से दो महीने के भीतर किया जाना चाहिए।

दावा करने वाले/अपीलकर्ता की ओर से वकील चेरियन सेबेस्टियन और एम जेम्स एंटनी पेश हुए।

बीमा कंपनी का प्रतिनिधित्व स्टैंडिंग काउंसिल एनएस नजीब ने किया।

[फैसला पढ़ें]

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Pillion rider can't be denied motor accident compensation citing bike rider's negligence: Kerala HC

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