

झारखंड सरकार के एक पूर्व कर्मचारी पर ₹5,000 की रिश्वत मांगने का आरोप लगने के सोलह साल बाद और अपनी चार साल की जेल की सज़ा पूरी करने के काफी समय बाद, हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें भ्रष्टाचार के एक मामले में बरी कर दिया [अजीत कुमार बनाम झारखंड राज्य]।
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने अपील करने वाले अजीत कुमार की सज़ा को रद्द कर दिया। बेंच ने कहा कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग और उसे स्वीकार करने की बात साबित करने में नाकाम रहा।
खास बात यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने 24 जुलाई, 2026 को उनकी याचिका पर पहली बार सुनवाई की, तब तक कुमार अपनी चार साल की कठोर कैद की सज़ा पूरी कर चुके थे और उन पर लगाया गया ₹10,000 का जुर्माना भी भर चुके थे।
हालांकि, उनके वकील ने कोर्ट को बताया कि कुमार अपनी अपील को उसके तार्किक नतीजे तक ले जाना चाहते थे ताकि वे अपना नाम साफ़ कर सकें और भ्रष्टाचार के दोषी ठहराए जाने से जुड़े संस्थागत कलंक को हटा सकें।
यह मामला अप्रैल 2010 का है, जब स्कूल के एक कर्मचारी ने आरोप लगाया कि कुमार - जो उस समय सरायकेला में ज़िला शिक्षा कार्यालय में काम कर रहे थे - ने उसकी रुकी हुई सैलरी जारी करने के लिए पैसे की मांग की थी।
उन पर भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया गया। फरवरी 2021 में, चाईबासा में एंटी-करप्शन ब्यूरो के स्पेशल जज ने कुमार को दोषी ठहराया और सज़ा के तौर पर चार साल की जेल की सज़ा सुनाई। झारखंड हाईकोर्ट ने जुलाई 2022 में इस सज़ा को बरकरार रखा।
हाईकोर्ट द्वारा उनकी अपील खारिज किए जाने के बाद, कुमार ने अपनी चार साल की कठोर कैद की सज़ा पूरी की और जुर्माना भरा।
इसके बाद वे अपना नाम साफ़ करने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। 24 जुलाई को, जब सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका पर नोटिस जारी किया, तो उनके वकील ने साफ़ किया कि पूरी सज़ा काटने के बावजूद, कुमार दोषी ठहराए जाने के कलंक को मिटाने के लिए अपील को आगे बढ़ाना चाहते थे।
ट्रायल रिकॉर्ड की जांच करने पर, सुप्रीम कोर्ट को अभियोजन पक्ष के मामले में अहम कमियां मिलीं। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ट्रैप टीम के किसी भी सदस्य या किसी स्वतंत्र गवाह ने कुमार को पैसे की मांग करते या लेते हुए नहीं देखा था, क्योंकि कथित लेन-देन उनके घर के अंदर हुआ था और वहां कोई गवाह मौजूद नहीं था।
बेंच ने गौर किया कि दोषसिद्धि पूरी तरह से शिकायतकर्ता के बिना पुष्टि किए गए बयान पर आधारित थी, जबकि सरकारी गवाहों ने माना कि उन्होंने विजिलेंस अधिकारियों के कहने पर पहले से तैयार ज़ब्ती सूची (seizure lists) पर सिर्फ़ हस्ताक्षर किए थे।
वकील शंभो नंदी और दक्ष शर्मा ने कुमार का पक्ष रखा, जबकि वकील आनंदो मुखर्जी और श्वेतांक सिंह झारखंड राज्य की ओर से पेश हुए।
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