सुप्रीम कोर्ट ने स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी के मरीज़ों के इलाज के लिए एक अलग फंड बनाने का सुझाव दिया

CJI सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने CSR योगदान और सरकारी अनुदान के ज़रिए योगदान की संभावनाओं पर विचार करने का सुझाव दिया।
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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को 'स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी' (SMA) से पीड़ित मरीज़ों को आर्थिक मदद और व्यवस्थित इलाज मुहैया कराने के मकसद से एक खास कॉर्पस फंड बनाने का व्यापक प्रस्ताव मांगा। SMA एक दुर्लभ और गंभीर आनुवंशिक बीमारी है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि व्यक्तिगत दान और सरकार से मिलने वाली कभी-कभार की ग्रांट (ad-hoc grants) काफ़ी नहीं हैं। जीवन बचाने वाले इलाज के लिए फ़ंडिंग का एक स्थायी और नियमित ज़रिया होना बहुत ज़रूरी है।

CJI ने कहा, "हालात के हिसाब से कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) के तहत योगदान मिल सकता है या सरकार ग्रांट दे सकती है। लेकिन हमें एक नियमित ज़रिया, एक स्थायी सिस्टम चाहिए। ऐसा तरीका होना चाहिए जिससे अपने-आप योगदान हो और एक नियमित फ़ंड बना रहे।"

कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि ऐसे किसी भी सिस्टम में संसाधनों का सही इस्तेमाल हो और यह पूरी तरह से बिना मुनाफ़े (non-profit) के आधार पर हो, ताकि मरीज़ों को सीधे मदद मिल सके।

सुप्रीम कोर्ट SMA मरीज़ों के लिए पर्याप्त, व्यवस्थित और सस्ती हेल्थकेयर सुविधा की कमी से जुड़े मामले पर स्वतः संज्ञान (suo motu) लेकर सुनवाई कर रहा था। इन मरीज़ों के इलाज में अक्सर करोड़ों रुपये का खर्च आता है।

Justice Joymalya Bagchi, CJI Surya Kant and Justice V Mohana
Justice Joymalya Bagchi, CJI Surya Kant and Justice V Mohana

सुनवाई के दौरान, बेंच ने सीनियर एडवोकेट और एमिकस क्यूरी अपराजिता सिंह से एक विस्तृत प्रस्ताव पेश करने को कहा। इस प्रस्ताव में कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) पहल, संस्थागत दानदाताओं और केंद्र सरकार के योगदान सहित फंड (कॉर्पस) बनाने और उसे बनाए रखने के तरीकों पर विचार किया जाना था।

जब सिंह ने बताया कि एक हलफनामा पहले ही दाखिल किया जा चुका है और उसे रिकॉर्ड पर रखा जाएगा, तो CJI कांत ने इस बात पर ज़ोर दिया कि मुख्य मकसद कभी-कभार मिलने वाले व्यक्तिगत दान या सरकार से मिलने वाली अस्थायी ग्रांट पर निर्भर रहने के बजाय, फंडिंग का एक स्थायी और नियमित ज़रिया बनाना होना चाहिए।

कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि पहली प्राथमिकता फंड जुटाना होनी चाहिए और उसके बाद उसका सबसे अच्छा और बिना मुनाफ़े वाला इस्तेमाल सिर्फ़ मरीज़ों की भलाई के लिए किया जाना चाहिए। चीफ जस्टिस ने एमिकस से एक ऑटोमेटेड और खुद से चलने वाला (सेल्फ-सस्टेनिंग) फाइनेंशियल फ़्रेमवर्क तैयार करने को कहा, जिस पर सिंह ने बताया कि प्रस्ताव पर तेज़ी से काम चल रहा है।

आदेश लिखाते समय बेंच ने कहा:

"ये याचिकाएँ स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी से पीड़ित लोगों को आर्थिक मदद और सहायता देने के लिए एक खास फंड (कॉर्पस अकाउंट) बनाने के मुद्दे से जुड़ी हैं। हम एमिकस क्यूरी अपराजिता सिंह से अनुरोध करते हैं कि वे ऐसा फंड बनाने के बारे में एक प्रस्ताव पेश करें।"

एमिकस क्यूरी के यह बताने के बाद कि एडवोकेट प्रज्ञा बरसाइयन ने कार्यवाही में अहम योगदान दिया है, कोर्ट ने बरसाइयन को इस मामले में को-एमिकस नियुक्त किया और दोनों को चार हफ़्ते के भीतर प्रस्ताव रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने 'क्योर SMA फ़ाउंडेशन' की ओर से दायर एक इंटरवेंशन एप्लीकेशन (हस्तक्षेप याचिका) को भी मंज़ूरी दे दी।

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Supreme Court moots dedicated corpus to fund treatment for Spinal Muscular Atrophy patients

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