सुप्रीम कोर्ट ने CEC,चुनाव आयुक्तो को पूर्ण कानूनी छूट देने के प्रावधान को चुनौती वाली याचिका पर केंद्र और ECI से जवाब मांगा

CJI सूर्य कांत तथा जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की पीठ ने कार्यकर्ता और वकील अरुण कुमार अग्रवाल द्वारा दायर एक याचिका पर नोटिस जारी किया।
Election Commission of India
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) से एक याचिका पर जवाब मांगा है। इस याचिका में एक ऐसे कानूनी प्रावधान को चुनौती दी गई है, जो मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य निर्वाचन आयुक्तों (EC) को उनके कर्तव्यों के पालन के दौरान किए गए किसी भी कार्य के लिए कानूनी कार्रवाई से सुरक्षा प्रदान करता है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा वी. मोहना की पीठ ने कार्यकर्ता और वकील अरुण कुमार अग्रवाल द्वारा दायर एक याचिका पर नोटिस जारी किया।

CJI Surya Kant, Justice Joymalya Bagchi, Justice V Mohana
CJI Surya Kant, Justice Joymalya Bagchi, Justice V Mohana

यह याचिका 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' की धारा 16 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देती है।

यह प्रावधान मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों (EC) को उनके आधिकारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए किए गए कार्यों के लिए दीवानी या आपराधिक कार्यवाही से आजीवन सुरक्षा प्रदान करता है।

याचिका में बताया गया है कि अन्य संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को उनके कर्तव्यों के पालन के दौरान किए गए कार्यों के लिए जो सुरक्षा मिलती है, वह आमतौर पर केवल 'सद्भावना' (good faith) से किए गए या किए जाने वाले कार्यों तक ही सीमित होती है।

याचिका में कहा गया है कि 2023 के अधिनियम के माध्यम से धारा 16 को शामिल किए जाने से पहले, चुनाव आयुक्तों के मामले में भी शुरुआत में ऐसा ही संतुलित दृष्टिकोण अपनाया गया था।

याचिका में आगे कहा गया है, "इस तरह की पूर्ण छूट (blanket immunity) न होने के बावजूद, भारत निर्वाचन आयोग ने कई दशकों तक सफलतापूर्वक चुनाव कराए हैं। इससे पता चलता है कि आयोग अपने सदस्यों को कानूनी कार्यवाही से पूरी छूट दिए बिना भी प्रभावी ढंग से काम कर सकता है।"

हालाँकि, धारा 16 के तहत, CEC और EC को बिना किसी अपवाद के पूर्ण छूट (blanket immunity) दे दी गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि ऐसा दृष्टिकोण असंवैधानिक और अनुचित है, जिसे रद्द किया जाना चाहिए।

याचिका में कहा गया है, "चुनाव आयुक्तों को परेशान करने वाली कार्यवाहियों से बचाने का उद्देश्य कम प्रतिबंधात्मक उपायों से भी हासिल किया जा सकता है, जैसे कि बेबुनियाद शिकायतों के खिलाफ सुरक्षा उपाय और न्यायिक जांच की व्यवस्था। इसलिए, पूर्ण छूट देना बहुत अधिक है और यह निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए आवश्यक सीमा से परे है। यह धारा CEC और EC के कार्यों के खिलाफ सभी दीवानी और आपराधिक कानूनी उपायों को खत्म कर देती है। उदाहरण के लिए, वह मतदाता जिसका नाम मतदाता सूची से गलत तरीके से हटा दिया गया हो, वह उम्मीदवार जिसे किसी दुर्भावनापूर्ण कार्य से नुकसान पहुँचा हो, या कोई ऐसा नागरिक जिसे आयोग के कामकाज में भ्रष्टाचार से परेशानी हुई हो - इन सभी के पास अब कोई कानूनी उपाय नहीं बचेगा।"

याचिका में यह भी बताया गया है कि 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) विधेयक' के मूल मसौदे में CEC और EC को ऐसी पूर्ण छूट देने का कोई प्रावधान नहीं था।

याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि बाद में इस विधेयक में एक संशोधन के जरिए CEC और EC को पूर्ण छूट देने का प्रावधान जोड़ा गया, लेकिन ऐसा करने के पीछे कोई कारण नहीं बताया गया।

याचिका में कहा गया है, "संसदीय बहस के दौरान मंत्री द्वारा दिए गए तर्क से यह साबित नहीं होता कि चुनाव आयुक्तों को स्वतंत्र रूप से और बिना किसी रुकावट के अपना काम करने देने के लिए यह प्रावधान जरूरी था। इस प्रावधान की कोई ठोस जरूरत नहीं दिखाई गई है—खासकर तब, जब यह दीवानी और आपराधिक मामलों की कार्रवाई से इतना व्यापक संरक्षण देता है। ऐसे में, इस बात पर गंभीर सवाल उठते हैं कि क्या इसकी जरूरत, इसके दायरे और इसके उचित अनुपात (proportionality) पर ठीक से विचार किया गया है या नहीं।"

याचिकाकर्ता ने आगे बताया कि विधेयक का जो अंतिम रूप संसद में पारित हुआ, उसमें CEC (मुख्य चुनाव आयुक्त) और ECs (चुनाव आयुक्तों) के लिए संरक्षण का प्रावधान शामिल था। यह विधेयक उस समय पारित किया गया जब संसद के बड़ी संख्या में सदस्य (विपक्षी सांसद) निलंबित थे।

याचिका में आगे कहा गया है कि यह मुद्दा तब और महत्वपूर्ण हो जाता है, जब मतदाता सूची के चल रहे 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) के दौरान कथित अनियमितताओं की खबरें सामने आई हैं।

इसमें 'इंडियन एक्सप्रेस' की उन रिपोर्टों का हवाला दिया गया है, जिनमें बताया गया है कि दो चुनाव आयुक्तों (ECs) ने SIR प्रक्रिया के कुछ पहलुओं पर आपत्ति जताई थी। साथ ही, SIR के लिए इस्तेमाल किए गए सॉफ्टवेयर की विश्वसनीयता को लेकर भी चिंताएं जताई गई थीं।

याचिका में कहा गया है, "मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त, ज्ञानेश कुमार के कामकाज पर भी गंभीर सवाल उठे हैं। ये सवाल केरल सरकार के लोक निर्माण विभाग (PWD) में सचिव के तौर पर उनके कार्यकाल के दौरान लगे कुछ आरोपों से जुड़े हैं।"

इस संदर्भ में, याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया है कि क्या कानून के तहत चुनाव आयुक्तों को ऐसी हरकतों के लिए भी पूरी छूट (immunity) मिलनी चाहिए, जो शायद 'नेक नीयत' से न की गई हों?

इसलिए, याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय से आग्रह किया है कि 2023 के अधिनियम की धारा 16 को असंवैधानिक घोषित किया जाए।

याचिकाकर्ता की ओर से वकील नेहा राठी पेश हुईं।

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Supreme Court seeks response from Centre, ECI on plea challenging blanket immunity for CEC, Election Commissioners