वंदे मातरम मामला: सुप्रीम कोर्ट में 'नक्सली' टिप्पणी को लेकर जस्टिस एस. मुरलीधर और SG तुषार मेहता के बीच तीखी बहस

कोर्ट कर्नाटक संगीत गायक टी.एम. कृष्णा की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' को गाने से रोकने को अपमान मानने वाले नए संशोधन को चुनौती दी गई थी।
SG Tushar Mehta and Senior Advocate S Muralidhar
SG Tushar Mehta and Senior Advocate S Muralidhar
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मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता और ओडिशा हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस व सीनियर एडवोकेट एस. मुरलीधर के बीच "नक्सलवादी" शब्द के इस्तेमाल को लेकर तीखी बहस हुई।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच, कर्नाटक संगीत गायक टी.एम. कृष्णा की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में 'राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम' (Prevention of Insults to National Honour Act) में 2026 में किए गए संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी। इस संशोधन के तहत, जानबूझकर 'वंदे मातरम' गाने से रोकना या इसे गाते समय किसी सभा में बाधा डालना दंडनीय अपराध है, जिसके लिए तीन साल तक की जेल हो सकती है।

CJI Surya Kant, Justice Joymalya Bagchi, Justice V Mohana
CJI Surya Kant, Justice Joymalya Bagchi, Justice V Mohana

सुनवाई के दौरान, कृष्णा की ओर से पेश हुए मुरलीधर ने तर्क दिया कि यह संशोधन 'राष्ट्रीय गीत' को गाने से रोकने पर सज़ा का प्रावधान करता है, जबकि यह साफ़ नहीं किया गया है कि वह गीत असल में क्या है।

"जब तक सरकार यह साफ़ नहीं कर देती कि वे किसी कानून का मतलब समझाने या जेल और सज़ा जैसे नतीजों के लिए किसी 'ऑफिस मेमोरैंडम' (सरकारी आदेश) पर निर्भर नहीं रहेंगे, तब तक उन्हें यह साफ़ करना चाहिए। जबकि उन्होंने बिना सोचे-समझे इस संशोधन को लाने में बहुत जल्दबाजी की। और यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।"

इसके बाद कोर्ट ने कहा,

"अगर कोई इतिहास पढ़ने की ज़हमत उठाए, तो हर कोई जानता है कि राष्ट्रीय गीत क्या है।"

इस मौके पर SG मेहता ने कोर्ट से अपील की कि वे याचिका पर नोटिस जारी न करें, क्योंकि ऐसा करने से "सनसनी" फैल सकती है।

तब मुरलीधर ने तर्क दिया,

"...इतिहास संवैधानिक फ़ैसले लेने की प्रक्रिया को बाध्य नहीं करता...आदर्श रूप से, ये चीज़ें जनमत के आधार पर विकसित होनी चाहिए...इसीलिए, माई लॉर्ड, मैं कानून बनाने की प्रक्रिया के बड़े मुद्दे पर बात कर रहा हूँ।"

तब SG मेहता ने कहा,

"जिन्हें यह पसंद नहीं आया, उन्होंने संसद में इसका विरोध किया, अब वे इसे यहाँ ला रहे हैं...माई लॉर्ड, कानून बनाना नक्सलियों की सोच के हिसाब से नहीं हो सकता।"

मुरलीधर ने "नक्सली" शब्द के इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताई।

"मैं नहीं चाहता कि भारत के सॉलिसिटर जनरल का यह शब्द लाइव प्रसारण में जाए। माई लॉर्ड, मैं...मैं कड़ी आपत्ति जताता हूँ...सॉलिसिटर को याचिकाकर्ता के लिए इस्तेमाल किया गया शब्द दोहराने दें।"

तब SG मेहता ने कहा कि उन्होंने यह शब्द इसलिए इस्तेमाल किया क्योंकि मुरलीधर संविधान के अनुसार फ़ैसला लेने की प्रक्रिया को चुनौती दे रहे थे।

मुरलीधर ने पलटवार करते हुए कहा,

"माई लॉर्ड, यह एक कानून अधिकारी को शोभा नहीं देता...मैंने कभी किसी कानून अधिकारी को इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करते नहीं सुना।"

कोर्ट ने कहा कि वह इस शब्द के इस्तेमाल को रिकॉर्ड पर नहीं लेगी।

"हम केवल कानूनी मुद्दे, यानी विशुद्ध संवैधानिक व्याख्या तक ही सीमित हैं..."

हालाँकि, SG मेहता ने जवाब दिया,

"मैं वही दोहराऊँगा जो मैंने कहा था...फ़ैसला संसद लेती है और मैंने कहा कि यही संवैधानिक तरीका है, न कि वह जो नक्सली चाहते हैं। और मुझे इसका कोई अफ़सोस नहीं है।"

इसके बाद मुरलीधर ने बेंच से कहा,

"वह फिर से वही बात दोहरा रहे हैं। अब मैं इसका कड़ा विरोध दर्ज कराने जा रहा हूँ... यह सिर्फ़ लोगों का ध्यान खींचने की कोशिश है।"

इसके बाद SG ने कहा,

"नहीं, नहीं, मैं किसी व्यक्ति विशेष पर कोई लेबल नहीं लगा रहा हूँ। माय लॉर्ड, मैं विचारधारा की बात कर रहा हूँ।"

तब सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े ने अपनी बात जोड़ी,

"सोचने का मतलब नक्सलवादी होना नहीं है।"

कृष्णा की याचिका में 'राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971' (राष्ट्रीय प्रतीकों की सुरक्षा करने वाला कानून) की धारा 3 पर सवाल उठाया गया है, जिसमें 2026 में संशोधन किया गया था। इसमें गृह मंत्रालय के उन निर्देशों को भी चुनौती दी गई है, जिनके तहत कुछ खास सरकारी, औपचारिक और सांस्कृतिक मौकों पर 'वंदे मातरम' के सभी छह छंदों को गाना ज़रूरी कर दिया गया है।

संशोधित कानून के तहत, जानबूझकर राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत गाने से रोकना, या ऐसे गायन में लगे समूह में बाधा डालना दंडनीय अपराध है, जिसके लिए 3 साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।

याचिका में तर्क दिया गया है कि केंद्र के निर्देश प्रोटोकॉल को नियंत्रित करने की सीमा से आगे जाते हैं। उनका कहना है कि संशोधन नागरिकों को आखिरी चार छंद गाने में भाग लेने के लिए मजबूर करता है; याचिका के अनुसार, इन छंदों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती सहित हिंदू देवी-देवताओं का ज़िक्र है।

याचिका में कहा गया है, "नतीजतन और असल में, राज्य की यह कार्रवाई न तो केवल राष्ट्रीय प्रोटोकॉल को नियंत्रित करती है और न ही सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए आचरण का कोई एक समान नियम तय करती है। यह एक ऐसे प्रतीक के प्रति सहमति जताने वाले समारोह में शामिल होने के लिए मजबूर करती है, जिसके आखिरी चार छंद (छंद 3 से 6) स्पष्ट रूप से भक्तिपूर्ण, देवी-देवताओं का आह्वान करने वाले और गैर-धर्मनिरपेक्ष हैं।"

याचिका में अनुच्छेद 14 (समानता), 15(1) (भेदभाव से सुरक्षा), 19(1)(a) (भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) और 25(1) (अंतरात्मा और धर्म की स्वतंत्रता) के तहत इन उपायों को चुनौती दी गई है।

यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के 1986 के 'बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य' मामले के फैसले पर आधारित है, जिसमें कोर्ट ने उन स्कूली बच्चों का बचाव किया था जो राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े तो होते थे, लेकिन अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण उसे गाते नहीं थे।

कृष्णा का तर्क है कि आपराधिक सज़ा का प्रावधान इस मुद्दे को राष्ट्रीय कार्यक्रमों से जुड़े सामान्य प्रोटोकॉल से मौलिक रूप से अलग बनाता है।

याचिका में कहा गया है, "सज़ा के प्रावधान के साथ सभी छह छंदों को गाना अनिवार्य करके, राज्य एक ऐसे प्रतीक को - जो निस्संदेह एक विवादास्पद ऐतिहासिक प्रतीक है - एक अनिवार्य रूढ़िवादी परंपरा में बदल देता है।"

याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि शुरुआती दो पद मूल रूप से एक अलग देशभक्ति गीत के तौर पर लिखे गए थे, जबकि बाकी चार पद तब जोड़े गए जब इस गीत को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल किया गया।

याचिका के अनुसार, बाद के पद धार्मिक और संगीतमय, दोनों ही तरह से शुरुआती दो पदों से अलग हैं।

याचिका में कांग्रेस वर्किंग कमेटी के 1937 के उस फैसले का भी ज़िक्र किया गया है, जिसमें मुस्लिम सदस्यों की आपत्तियों के बाद राष्ट्रीय सभाओं में गीत के केवल शुरुआती दो पदों को ही गाने तक सीमित कर दिया गया था।

याचिका में तर्क दिया गया है, "यह कदम (2026 के निर्देश) औपचारिक रूप से तो निष्पक्ष है, लेकिन असल में इसमें एक खास संदेश छिपा है: यह बहुसंख्यक धार्मिक झुकाव का संकेत देता है और आस्था रखने वाले मुसलमानों तथा ज़मीर की आवाज़ पर विरोध करने वाले अन्य लोगों को हीनता का एहसास कराता है।"

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Vande Mataram case: Heated exchange between S Muralidhar, SG Tushar Mehta in Supreme Court over 'Naxalite' remark

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